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गुणवत्ता जांच में फेल दवाओं के मैन्युफैक्चरिंग लाइसेंस तुरंत होंगे सस्पेंड, केंद्र सरकार का प्रस्ताव
दवाओं की गुणवत्ता में गंभीर खामी मिलने पर बिना लंबी प्रक्रिया के होगी कार्रवाई, लाइसेंस बहाली के लिए निर्माता को सुधारात्मक कदम उठाने होंगे.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 12 hours ago
केंद्र सरकार दवाओं की गुणवत्ता और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए नियमों में बड़ा बदलाव करने की तैयारी कर रही है. केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने प्रस्ताव दिया है कि गुणवत्ता जांच में गंभीर खामी पाए जाने पर दवा निर्माताओं के मैन्युफैक्चरिंग लाइसेंस तत्काल प्रभाव से निलंबित किए जा सकेंगे. इसका उद्देश्य घटिया गुणवत्ता वाली दवाओं को बाजार में बिकने से रोकना और आम लोगों की सेहत को संभावित नुकसान से बचाना है.
मंत्रालय ने इस संबंध में ड्रग्स रूल्स, 1945 (Drugs Rules, 1945) में संशोधन का मसौदा जारी किया है. इस पर संबंधित पक्षों से 30 दिनों के भीतर सुझाव और आपत्तियां मांगी गई हैं.
गुणवत्ता जांच में फेल होने पर तुरंत होगी कार्रवाई
प्रस्तावित संशोधनों के तहत, यदि सरकार से मान्यता प्राप्त प्रयोगशाला किसी दवा को 'नॉट ऑफ स्टैंडर्ड क्वालिटी' (NSQ) यानी निर्धारित गुणवत्ता मानकों के अनुरूप नहीं पाती है, तो निर्माता का लाइसेंस तत्काल निलंबित किया जा सकेगा. इसके लिए मौजूदा नियामकीय प्रक्रिया पूरी होने या कारण बताओ नोटिस की प्रक्रिया का इंतजार नहीं करना होगा.
यह व्यवस्था दवाओं के महत्वपूर्ण गुणवत्ता मानकों में खामी पाए जाने पर लागू होगी. इनमें दवा में सक्रिय तत्वों की निर्धारित मात्रा (Assay), शरीर में दवा के घुलने की क्षमता (Dissolution), संबंधित पदार्थों की मात्रा, अशुद्धियां (Impurities) और स्टेरिलिटी यानी संक्रमणमुक्त होने से जुड़े मानक शामिल हैं.
फिलहाल, दवा की गुणवत्ता में कमी सामने आने के बाद निर्माता का लाइसेंस निलंबित या रद्द करने के लिए निर्धारित नियामकीय प्रक्रिया का पालन करना पड़ता है. इसमें कारण बताओ नोटिस जारी करना भी शामिल है. इस प्रक्रिया के कारण गुणवत्ता संबंधी खामी सामने आने और निर्माता के खिलाफ कार्रवाई होने के बीच समय का अंतर रह सकता है. इस दौरान संबंधित दवा बाजार में उपलब्ध रह सकती है.
स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, इस देरी से सार्वजनिक स्वास्थ्य को खतरा हो सकता है और बाजार से प्रभावित दवाओं को वापस मंगाने (Recall) की प्रक्रिया भी मुश्किल हो सकती है.
लाइसेंस बहाली के लिए सुधारात्मक कदम जरूरी
मसौदे में यह भी प्रस्ताव है कि निलंबित लाइसेंस तभी बहाल किया जाएगा, जब दवा निर्माता गुणवत्ता में खामी के मूल कारणों की प्रभावी जांच पूरी करेगा और सुधारात्मक एवं निवारक कार्रवाई (CAPA) लागू करेगा.
मंत्रालय के मुताबिक, निर्माता को गुणवत्ता संबंधी गड़बड़ी के मूल कारणों की जांच करनी होगी और ऐसी सुधारात्मक व्यवस्था लागू करनी होगी, जिससे भविष्य में इस तरह की खामियां दोबारा न हों. इसके बाद लाइसेंसिंग अथॉरिटी इन उपायों की प्रभावशीलता की जांच करेगी. नियामक की संतुष्टि के बाद ही लाइसेंस बहाल किया जा सकेगा.
DCGI और राज्य नियामकों को भी भेजी जाएगी रिपोर्ट
मंत्रालय ने फॉर्म 13 (Form 13) में भी बदलाव का प्रस्ताव दिया है. इस फॉर्म में सरकारी विश्लेषक (Government Analyst) की ओर से दवा के नमूने की जांच के बाद तैयार की गई रिपोर्ट दर्ज होती है.
प्रस्तावित व्यवस्था के तहत, सरकारी विश्लेषक की रिपोर्ट ड्रग्स कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया (DCGI), संबंधित राज्य की लाइसेंसिंग अथॉरिटी और दवा के निर्माता एवं मार्केटर को भेजी जाएगी.
मंत्रालय का कहना है कि इससे दवाओं के गुणवत्ता मानकों पर खरा नहीं उतरने से जुड़ी जानकारी संबंधित नियामकों और कंपनियों तक समय पर पहुंचेगी. इससे नियामकीय कार्रवाई में समन्वय बढ़ेगा और दवा के निर्माण से लेकर मार्केटिंग तक की पूरी प्रक्रिया में जवाबदेही तय करने में मदद मिलेगी.
2024 और 2025 की बैठकों में हुई थी चर्चा
ये प्रस्ताव 20 दिसंबर 2024 को ड्रग्स कंसल्टेटिव कमेटी (DCC) की 65वीं बैठक में हुई चर्चा और 24 अप्रैल 2025 को ड्रग्स टेक्निकल एडवाइजरी बोर्ड (DTAB) की 92वीं बैठक में की गई सिफारिशों के बाद लाए गए हैं.
दरअसल, भारत में निर्मित घटिया गुणवत्ता वाली दवाओं को लेकर पहले भी कई बार सवाल उठ चुके हैं. 2022 और 2023 में गाम्बिया और उज्बेकिस्तान में बच्चों की मौतों को दूषित कफ सिरप से जोड़े जाने के बाद भारतीय दवा उद्योग की गुणवत्ता निगरानी व्यवस्था अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जांच के दायरे में आई थी.
इसके अलावा, पिछले साल मध्य प्रदेश और राजस्थान में भारत में निर्मित दूषित कफ सिरप को कम से कम 22 बच्चों की मौत से जोड़ा गया था. इन घटनाओं के बाद दवाओं की गुणवत्ता जांच और नियामकीय निगरानी को मजबूत करने की मांग तेज हुई थी.
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