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स्कैनर का सवाल: अस्पतालों में बेहतर फैसलों के लिए क्यों जरूरी है वित्तीय समझ और चिकित्सकीय ज्ञान का तालमेल
वित्त टीम की शुरुआत लाभ-हानि विवरण से होती है. इससे पता चलता है कि परामर्श, प्रक्रियाओं, डायग्नोस्टिक्स और फार्मेसी से होने वाली आय अस्पताल चलाने की लागत को पूरा करती है या नहीं.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 hour ago
डॉ. पूर्णिमा एएस
तिमाही के आखिरी शुक्रवार को एक मध्यम आकार के अस्पताल की कल्पना कीजिए. रेडियोलॉजी विभाग के प्रमुख ने नए एमआरआई स्कैनर की मांग की है. पुरानी मशीन खराब होने लगी है, मरीजों को जांच के लिए अधिक इंतजार करना पड़ रहा है और मरीजों को रेफर करने वाले डॉक्टर उन्हें दूसरे अस्पतालों में भेजने लगे हैं. इस मशीन को खरीदने के पक्ष में चिकित्सकीय तर्क मजबूत है.
इसके बाद मुख्य वित्त अधिकारी (सीएफओ) एक ऐसा सवाल पूछते हैं, जिसका जवाब देने के लिए रेडियोलॉजिस्ट को प्रशिक्षित नहीं किया गया है: “इससे हमारे वित्तीय आंकड़ों पर क्या असर पड़ेगा?” इसके बाद होने वाली बातचीत किसी न किसी रूप में हर जगह अस्पतालों में होती है. यह दिखाती है कि चिकित्सकीय निर्णय और वित्तीय समझ का एक-दूसरे से जुड़ना क्यों जरूरी है.
कहानी की शुरुआत: लाभ-हानि विवरण
गैर-लाभकारी संस्थान में इसके समकक्ष को आय-व्यय खाता कहा जाता है. यहां सवाल यह होता है कि क्या अस्पताल में दोबारा निवेश करने के लिए पर्याप्त और टिकाऊ अधिशेष उपलब्ध है. विभागवार इस विवरण को पढ़ने से पता चलता है कि कौन-सी सेवाएं संस्थान को आर्थिक रूप से सहारा दे रही हैं और किन पर दबाव है.
पता चलता है कि रेडियोलॉजी विभाग उन विभागों में से एक है, जो अस्पताल की आय में अधिक योगदान देते हैं. लेकिन टीम यह जानना चाहती है कि अस्पताल के मुख्य संचालन का प्रदर्शन उसकी वित्तपोषण व्यवस्था से अलग कैसा है. इसके लिए वे ईबीआईटी (ब्याज और कर से पहले की आय) का सहारा लेते हैं. कई अस्पताल इमारतों और उपकरणों के लिए कर्ज लेते हैं और उन पर लगने वाला ब्याज इस बात को छिपा सकता है कि अस्पताल का चिकित्सकीय कारोबार वास्तव में कितना अच्छा प्रदर्शन कर रहा है. ईबीआईटी इस प्रभाव को अलग कर देता है, जिससे अलग-अलग वर्षों और समान संस्थानों के बीच आंकड़ों की तुलना की जा सकती है.
बड़ा फैसला: पूंजीगत बजट निर्धारण
अस्पताल की वित्तीय स्थिति मशीन खरीदने पर विचार करने के लिए पर्याप्त है, यह जानना केवल पहला कदम है. अगला सवाल यह है कि क्या यह विशेष निवेश करना सही रहेगा.
यहीं पूंजीगत बजट निर्धारण की भूमिका आती है. यह वह प्रक्रिया है, जिसमें बड़ी और लंबी अवधि के खर्चों का पैसा लगाने से पहले मूल्यांकन किया जाता है. वित्त टीम अनुमान लगाती है कि नई मशीन हर महीने कितने स्कैन करेगी, प्रत्येक स्कैन से कितनी आय होगी, मशीन को चलाने और उसका रखरखाव करने में कितना खर्च आएगा और वह कितने वर्षों तक उपयोगी रहेगी. पेबैक अवधि, शुद्ध वर्तमान मूल्य और आंतरिक प्रतिफल दर जैसी विधियां इन अनुमानों को ऐसे आंकड़ों में बदल देती हैं, जिनकी तुलना बोर्ड उन्हीं फंड से जुड़ी अन्य जरूरतों के साथ कर सकता है.
रेडियोलॉजिस्ट समझते हैं कि चिकित्सकीय आधार पर मजबूत तर्क और वित्तीय आधार पर मजबूत तर्क अलग-अलग होते हैं और सबसे प्रभावी प्रस्तावों में दोनों शामिल होते हैं.
फैसले के बाद: परिसंपत्ति आवंटन
मान लीजिए कि बोर्ड मशीन खरीदने की मंजूरी दे देता है. इसके लिए पैसा फिर भी कहीं से जुटाना होगा और अस्पताल की दूसरी जरूरतें भी बनी रहेंगी. अस्पताल को वेतन देना है, फार्मेसी के लिए दवाओं का स्टॉक रखना है और इमारत का रखरखाव भी करना है.
यह परिसंपत्ति आवंटन का सवाल है. इसका अर्थ है कि अस्पताल अपने फंड को उपकरणों, इमारतों, तकनीक और कार्यशील पूंजी के बीच कैसे बांटता है और जहां उसके पास अधिशेष या कोष की राशि होती है, वहां उसे किस तरह निवेश किया जाता है. उपकरणों में बहुत अधिक पैसा फंस जाने से अस्पताल के पास रोजमर्रा के खर्चों के लिए नकदी की कमी हो सकती है. वहीं, बहुत अधिक पैसा रोककर रखने से मरीजों की जरूरत के मुताबिक क्षमता और गुणवत्ता में निवेश धीमा पड़ सकता है. सही संतुलन बनाए रखना एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है.
इसके पीछे की शांत व्यवस्था
वित्त से जुड़े कम दिखाई देने वाले पहलुओं के बिना यह सब संभव नहीं है. बजट प्रत्येक विभाग के लिए अपेक्षाएं तय करते हैं, ताकि वास्तविक खर्च और निर्धारित बजट के बीच अंतर का समय रहते पता लगाया जा सके. आंतरिक नियंत्रण संसाधनों की सुरक्षा करते हैं और प्रक्रियाओं को जवाबदेह बनाए रखते हैं. वैधानिक अनुपालन यह सुनिश्चित करता है कि संस्थान अपने कानूनी दायित्वों का पालन करे. एमआईएस रिपोर्ट कच्चे आंकड़ों को ऐसी जानकारी में बदलती हैं, जिसका उपयोग प्रशासक और चिकित्सक कर सकते हैं. हालांकि, यह तभी संभव है, जब रिपोर्ट समय पर और आसानी से समझ आने वाले प्रारूप में उपलब्ध हों.
इन सभी कड़ियों के बीच एक चक्र चलता है. पूंजीगत बजट का फैसला परिसंपत्ति आवंटन को प्रभावित करता है, परिसंपत्ति आवंटन भविष्य के ईबीआईटी को प्रभावित करता है और इसका परिणाम अगले लाभ-हानि विवरण में दिखाई देता है. वित्तीय प्रक्रियाओं में निरंतरता गुणवत्ता संबंधी पहलों को भी समर्थन देती है, क्योंकि मान्यता और गुणवत्ता कार्यक्रम दस्तावेजीकृत तथा दोहराई जा सकने वाली प्रक्रियाओं पर निर्भर करते हैं.
साझा भाषा विकसित करना
यह कहानी उदाहरण के तौर पर दी गई है, लेकिन इसमें बताई गई समस्या वास्तविक है. चिकित्सकों को आमतौर पर वित्त का प्रशिक्षण नहीं दिया जाता और स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में आने वाले वित्तीय पेशेवरों को भी अक्सर काम करते हुए अस्पताल की कार्यप्रणाली सीखनी पड़ती है.
श्री रामचंद्र फैकल्टी ऑफ मैनेजमेंट साइंसेज ने इस अंतर को दूर करने के लिए द इंस्टीट्यूट ऑफ कॉस्ट अकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया के सहयोग से हेल्थकेयर फाइनेंस में सर्टिफिकेट कोर्स शुरू किया है. 50 घंटे के इस कार्यक्रम में चार मॉड्यूल के माध्यम से इन अवधारणाओं को शामिल किया गया है:
1. स्वास्थ्य सेवा और अस्पताल प्रबंधन का परिचय
2. वित्त विभाग की भूमिका और कार्य
3. वित्तीय कार्यों में प्रबंधन और आंतरिक नियंत्रण
4. स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में बजट निर्धारण और रिपोर्टिंग
इसमें कक्षा में व्याख्यान और प्रत्येक अवधारणा को लागू करने वाले छोटे अभ्यास शामिल हैं. यह कोर्स कक्षा या ऑनलाइन माध्यम से किया जा सकता है. इसका उद्देश्य अस्पताल प्रशासकों, चिकित्सा पेशेवरों और सलाहकारों, सीएमए सदस्यों और विद्यार्थियों, वित्त पेशेवरों (सीए, सीएस, सीएफए, एमबीए) तथा स्वास्थ्य सेवा वित्त में रुचि रखने वाले स्नातक और स्नातकोत्तर विद्यार्थियों को लाभ पहुंचाना है.
इस कोर्स के लिए न्यूनतम 50 प्रतिशत अंकों के साथ किसी भी विषय में डिग्री होना जरूरी है. स्नातक और स्नातकोत्तर के अंतिम सेमेस्टर के विद्यार्थी भी आवेदन कर सकते हैं. इसका चौथा बैच 28 नवंबर, 2026 से शुरू होगा. पंजीकरण शुल्क 7,500 रुपये और उस पर 18 प्रतिशत जीएसटी (कुल 8,850 रुपये) है. परीक्षा शुल्क 1,000 रुपये और उस पर 18 प्रतिशत जीएसटी (कुल 1,180 रुपये) है.
अतिथि लेखिका: डॉ. पूर्णिमा एएस, फैकल्टी ऑफ मैनेजमेंट साइंसेज, श्री रामचंद्र इंस्टीट्यूट ऑफ हायर एजुकेशन एंड रिसर्च (SRIHER), चेन्नई
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