होम / BW HealthCare / भारत में बढ़ रहा अल्जाइमर का खतरा, 2036 तक दोगुने हो सकते हैं डिमेंशिया के मरीज
भारत में बढ़ रहा अल्जाइमर का खतरा, 2036 तक दोगुने हो सकते हैं डिमेंशिया के मरीज
शुरुआती लक्षणों को उम्र बढ़ने का सामान्य हिस्सा मानकर नजरअंदाज करना पड़ सकता है भारी, विशेषज्ञों ने समय पर जांच और डॉक्टर से सलाह लेने की दी सलाह
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 50 minutes ago
भारत में बुजुर्गों की आबादी बढ़ने के साथ डिमेंशिया और अल्जाइमर जैसी बीमारियों का खतरा भी बढ़ रहा है. देश में 60 वर्ष और उससे अधिक उम्र के करीब 88 लाख लोग डिमेंशिया के साथ जीवन जी रहे हैं. इनमें अल्जाइमर रोग डिमेंशिया का सबसे आम कारण है. एक अध्ययन के मुताबिक भारत में डिमेंशिया के मामलों की संख्या 2036 तक बढ़कर करीब 1.69 करोड़ हो सकती है. ऐसे में विशेषज्ञों का कहना है कि बीमारी के शुरुआती संकेतों को पहचानना और समय पर चिकित्सकीय सलाह लेना बेहद महत्वपूर्ण है.
विश्व अल्जाइमर दिवस के मौके पर एली लिली एंड कंपनी (इंडिया) और फोर्टिस हेल्थकेयर ने लोगों से दिमागी सेहत और याददाश्त में होने वाले बदलावों को लेकर जागरूक रहने की अपील की. इस जागरूकता अभियान में पूर्व मिस यूनिवर्स और अभिनेत्री लारा दत्ता भी शामिल हुईं और उन्होंने अल्जाइमर से प्रभावित परिवारों के अनुभवों पर बात की.
अल्जाइमर सिर्फ भूलने की बीमारी नहीं
अल्जाइमर को आमतौर पर भूलने की बीमारी के तौर पर देखा जाता है, लेकिन इसका असर केवल याददाश्त तक सीमित नहीं रहता. यह धीरे-धीरे बढ़ने वाली न्यूरोलॉजिकल बीमारी है, जो व्यक्ति की सोचने-समझने की क्षमता, बातचीत, निर्णय लेने और रोजमर्रा के काम खुद करने की क्षमता को प्रभावित कर सकती है. बीमारी बढ़ने के साथ मरीज की आत्मनिर्भरता कम हो सकती है और देखभाल की जरूरत बढ़ सकती है.
इसका असर मरीज के साथ-साथ परिवार और देखभाल करने वालों पर भी पड़ता है. विशेषज्ञों के मुताबिक कई बार परिवार शुरुआती बदलावों को सामान्य उम्र बढ़ने की प्रक्रिया समझकर नजरअंदाज कर देते हैं. इससे डॉक्टर तक पहुंचने और बीमारी की पहचान में देरी हो सकती है.
शुरुआती पहचान क्यों जरूरी
अल्जाइमर के बदलाव बीमारी के स्पष्ट लक्षण सामने आने से कई साल पहले शुरू हो सकते हैं. शोध के अनुसार बीमारी के शुरुआती चरणों में दिमाग में एमाइलॉयड जैसे प्रोटीन के असामान्य जमाव से जुड़े बदलाव देखे जा सकते हैं. हालांकि, हर व्यक्ति में बीमारी की शुरुआत और बढ़ने की गति एक जैसी नहीं होती.
इसी वजह से याददाश्त, सोचने-समझने या रोजमर्रा के कामकाज में लगातार बदलाव दिखाई देने पर इसे केवल उम्र का असर मानकर छोड़ना उचित नहीं है. समय पर चिकित्सकीय जांच से डॉक्टर इन बदलावों के संभावित कारणों को समझ सकते हैं और आगे की देखभाल की योजना तैयार कर सकते हैं.
फोर्टिस एस्कॉर्ट्स फरीदाबाद के न्यूरोलॉजी विभाग के डायरेक्टर और एचओडी डॉ. विनीत बंगा ने कहा कि अल्जाइमर केवल याददाश्त खोने तक सीमित नहीं है. यह सोचने-समझने की क्षमता में बदलाव के साथ व्यक्ति की बातचीत, निर्णय लेने और स्वतंत्र रूप से काम करने की क्षमता को भी प्रभावित कर सकता है. उनके मुताबिक मरीज के संज्ञानात्मक बदलावों के साथ रोजमर्रा के कामकाज में आए बदलावों को भी समझना जरूरी है, ताकि सही जांच और आगे की देखभाल तय की जा सके.
गुरुग्राम स्थित फोर्टिस मेमोरियल रिसर्च इंस्टीट्यूट में न्यूरोलॉजी विभाग के एडिशनल डायरेक्टर,डॉ. साहिल कोहली ने कहा कि शुरुआती लक्षणों की पहचान और समय पर डॉक्टर से बातचीत मरीज और परिवार को बीमारी को समझने तथा आगे की देखभाल की योजना बनाने में मदद करती है. इससे मरीज की जरूरतों और उसकी पसंद को लेकर परिवार समय रहते बातचीत कर सकता है.
भारत के लिए बढ़ती स्वास्थ्य चुनौती
भारत में डिमेंशिया के बढ़ते मामलों का संबंध मुख्य रूप से बढ़ती उम्र की आबादी से है. इसके अलावा बीमारी को लेकर जागरूकता की कमी और चिकित्सकीय सलाह लेने में देरी भी एक चुनौती है. आने वाले वर्षों में बुजुर्ग आबादी बढ़ने के साथ डिमेंशिया से जुड़ी स्वास्थ्य सेवाओं, देखभाल और परिवारों पर पड़ने वाला दबाव भी बढ़ सकता है.
एली लिली एंड कंपनी (इंडिया) के मेडिकल सीनियर डायरेक्टर डॉ. राहुल कपूर ने कहा कि अल्जाइमर का असर मरीजों और उनके परिवारों के साथ स्वास्थ्य व्यवस्था पर भी पड़ता है. उन्होंने बीमारी को लेकर जागरूकता बढ़ाने, समय पर डॉक्टर से सलाह लेने और स्वास्थ्य व्यवस्था के विभिन्न हिस्सों के बीच बेहतर सहयोग की जरूरत पर जोर दिया.
लारा दत्ता ने भी अल्जाइमर को लेकर सामाजिक जागरूकता बढ़ाने की जरूरत बताई. उन्होंने कहा कि बीमारी से प्रभावित परिवारों के अनुभव यह दिखाते हैं कि याददाश्त और दिमागी सेहत में बदलाव को बढ़ती उम्र का सामान्य हिस्सा मानकर नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए. उनके मुताबिक इस विषय पर खुलकर बातचीत होने से परिवार शुरुआती संकेतों को पहचानने और समय पर चिकित्सकीय सलाह लेने के लिए प्रोत्साहित हो सकते हैं.
क्या ध्यान रखें
विशेषज्ञों के मुताबिक लगातार भूलने की समस्या, परिचित कामों को करने में परेशानी, बातचीत या निर्णय लेने की क्षमता में बदलाव और रोजमर्रा की गतिविधियों में असामान्य कठिनाई जैसे संकेतों पर ध्यान देना चाहिए. हालांकि, ऐसे लक्षण कई अन्य स्वास्थ्य समस्याओं के कारण भी हो सकते हैं. इसलिए खुद से अल्जाइमर का निष्कर्ष निकालने के बजाय योग्य डॉक्टर से जांच और सलाह लेना जरूरी है.
डिमेंशिया के मामलों में संभावित बढ़ोतरी को देखते हुए शुरुआती पहचान, सही चिकित्सकीय मूल्यांकन और मरीज के साथ परिवार को समय पर सहायता उपलब्ध कराना आने वाले वर्षों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है.
टैग्स Alzheimer’s Awareness