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भारतीय दीवार पर किसका होगा कब्जा?
जैसे-जैसे बिरला ओपस, जेएसडब्ल्यू ड्यूलक्स और पिडिलाइट की हैशा स्थापित दिग्गजों को चुनौती दे रही हैं, त्योहारी सीजन यह दिखाएगा कि क्या वितरण क्षमता, डीलर अर्थशास्त्र और पेंटर का प्रभाव लंबे समय से चली आ रही उपभोक्ता आदतों को बदल सकता है.
डॉ. अनुराग बत्रा 1 hour ago
दशकों से भारत का डेकोरेटिव पेंट्स बाजार लगभग पूर्वानुमानित दिखाई देता था. एशियन पेंट्स निर्विवाद रूप से अग्रणी था, बर्जर पेंट्स मुख्य चुनौती देने वाला था, जबकि कंसाई नेरोलैक और ड्यूलक्स ने अपनी स्थापित स्थिति बनाए रखी थी. उपभोक्ता ब्रांडों को जानते थे, डीलर जानते थे कि शेल्फ से क्या तेजी से बिकता है और पेंटर्स के पास अपने पसंदीदा उत्पाद थे.
यह ऐसा बाजार था जहां संबंध और वितरण विज्ञापन जितने ही महत्वपूर्ण थे. अब यह समीकरण तेजी से बदल रहा है.
बिरला ओपस के आक्रामक तरीके से अपनी क्षमता बढ़ाने, जेएसडब्ल्यू के ड्यूलक्स के जरिए अपने पेंट्स कारोबार को मजबूत करने और पिडिलाइट के डेकोरेटिव पेंट्स में प्रवेश करने के साथ भारतीय बाजार अब केवल स्थापित कंपनियों के बीच की लड़ाई नहीं रह गया है. यह भारतीय कंज्यूमर मार्केटिंग में सबसे दिलचस्प प्रतिस्पर्धी मुकाबलों में से एक बनता जा रहा है.
सवाल अब यह नहीं है कि नए खिलाड़ी बाजार में प्रवेश कर सकते हैं या नहीं. वे प्रवेश कर चुके हैं. असली सवाल यह है कि वे मौजूदा कंपनियों से कितनी बाजार हिस्सेदारी छीन सकते हैं.
पुरानी व्यवस्था को मिल रही है चुनौती
इस बदलाव को अलग बनाने वाली बात नए प्रवेश करने वाले खिलाड़ियों की प्रोफाइल है. ये छोटे ब्रांड नहीं हैं जो बाजार में अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहे हैं. इनके पीछे भारत के कुछ सबसे बड़े कारोबारी समूह हैं, जिनके पास मैन्युफैक्चरिंग, वितरण, डीलर नेटवर्क, तकनीक, मार्केटिंग और उपभोक्ता अधिग्रहण में निवेश करने की वित्तीय ताकत है.
बिरला ओपस ने बड़े पैमाने और वितरण नेटवर्क बनाने के लिए आक्रामक रुख अपनाया है. जेएसडब्ल्यू ने ड्यूलक्स कारोबार के जरिए अपनी स्थिति मजबूत की है. वहीं पिडिलाइट अपने साथ विशाल वितरण अनुभव और कंस्ट्रक्शन तथा होम-इंप्रूवमेंट इकोसिस्टम में लंबे समय से चले आ रहे संबंध लेकर आया है, इसलिए सवाल अब यह नहीं है कि बाजार में प्रवेश की बाधाओं को पार किया जा सकता है या नहीं. बड़ी चुनौती निवेश और उपलब्धता को उपभोक्ता की पसंद में बदलना है.
त्योहारी सीजन ने बढ़ाई चुनौती
समय इससे ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं हो सकता. त्योहारी सीजन पारंपरिक रूप से घरों की मरम्मत और दोबारा पेंट कराने के लिए महत्वपूर्ण अवधि रहा है, जिससे दिवाली के आसपास के महीने पेंट ब्रांडों के लिए स्वाभाविक युद्ध का मैदान बन जाते हैं. जिन उपभोक्ताओं ने अपने घरों की पेंटिंग टाल रखी है, वे फैसले लेना शुरू करते हैं, जबकि डीलर बढ़ती मांग के लिए तैयारी करते हैं.
लेकिन उपभोक्ता खाली स्लेट के साथ शुरुआत नहीं कर रहे हैं. ज्यादातर के पास पहले से ही एक ऐसा ब्रांड है जिसे वे जानते हैं, एक ऐसा पेंटर है जिस पर वे भरोसा करते हैं और एक ऐसा डीलर है जहां वे नियमित रूप से जाते हैं, इसलिए चुनौती देने वाले ब्रांडों के लिए केवल जागरूकता पर्याप्त नहीं है. उन्हें एक पूरे इकोसिस्टम को अपनी आदतें बदलने के लिए राजी करना होगा.
डीलर और पेंटर के स्तर पर जीती जाएगी लड़ाई
यह शायद पेंट्स और कई अन्य कंज्यूमर कैटेगरी के बीच सबसे बड़ा अंतर है. विज्ञापन आकांक्षा पैदा कर सकता है, लेकिन अंतिम खरीद को अक्सर डीलर और पेंटर प्रभावित करते हैं. उपभोक्ता के मन में कोई रंग या फिनिश हो सकता है, लेकिन इस्तेमाल किए जाने वाले उत्पाद को पेंटर प्रभावित कर सकता है और आखिर में क्या खरीदा जाए, इसे डीलर प्रभावित कर सकता है, इसीलिए केवल वितरण के आंकड़े पूरी कहानी नहीं बताते.
किसी डीलर को उत्पाद स्टॉक करने के लिए तैयार करना एक उपलब्धि है. डीलर को उस उत्पाद की सिफारिश करने के लिए तैयार करना दूसरी बात है. किसी पेंटर को एक बार उत्पाद आजमाने के लिए तैयार करना और उसे बार-बार इस्तेमाल करने के लिए उसका पसंदीदा ब्रांड बनाना दो बिल्कुल अलग बातें हैं.
इसलिए पेंट की लड़ाई केवल टेलीविजन, डिजिटल प्लेटफॉर्म या आउटडोर मीडिया पर नहीं लड़ी जा रही है. यह हजारों डीलर काउंटरों पर और पेंटर्स तथा घर के मालिकों के बीच होने वाली बातचीत में लड़ी जा रही है.
एशियन पेंट्स को अलग लड़ाई लड़नी है
एशियन पेंट्स के लिए रणनीति केवल डिस्काउंट के जरिए हर चुनौती देने वाले का जवाब देने की नहीं हो सकती. उसका सबसे बड़ा प्रतिस्पर्धी लाभ दशकों में जमा हुआ भरोसा, पहचान और मजबूत वितरण नेटवर्क है.
घर की पेंटिंग कभी-कभार होने वाली खरीदारी है. इसमें पैसा, मेहनत, समय और काफी असुविधा शामिल होती है. इसलिए उपभोक्ता चुनाव करते समय रूढ़िवादी हो सकते हैं. ऐसे में एशियन पेंट्स के पास भावनात्मक और वितरण का बहुत बड़ा सुरक्षा कवच है. उसकी चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि यह बढ़त आत्मसंतुष्टि में न बदल जाए.
प्रतिस्पर्धियों के ध्यान और वितरण हासिल करने के लिए आक्रामक तरीके से खर्च करने के बीच इनोवेशन, प्रीमियमाइजेशन, सर्विस, कलर एक्सपर्टाइज और युवा घर मालिकों के लिए प्रासंगिक बने रहना तेजी से महत्वपूर्ण होगा. बाजार के नेता को केवल बाजार हिस्सेदारी का बचाव नहीं करना है. उसे उपभोक्ताओं को ब्रांड बदलने से रोकने के लिए लगातार कारण देने होंगे.
बर्जर अब खुद चुनौती झेलने वाला चुनौतीकर्ता
बर्जर खुद को एक दिलचस्प स्थिति में पाता है. वर्षों तक वह बाजार के नेता को चुनौती देने वाला खिलाड़ी रहा. आज उसे कई दिशाओं से चुनौती देने वाले खिलाड़ी मिल रहे हैं. उसकी प्रतिक्रिया में अपने मुख्य बाजारों की रक्षा करने के साथ-साथ उन क्षेत्रों और सेगमेंट में ज्यादा आक्रामकता शामिल करनी होगी, जहां नए खिलाड़ी अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहे हैं.
वितरण, डीलर संबंध और पेंटर की वफादारी महत्वपूर्ण होगी. बर्जर की विरासत एक संपत्ति है, लेकिन केवल विरासत पर्याप्त नहीं होगी. उसे अपने मौजूदा संबंधों को ज्यादा प्रभावी बनाना होगा और साथ ही यह सुनिश्चित करना होगा कि नए प्रवेश करने वाले खिलाड़ी उसके ग्राहकों के आसपास धीरे-धीरे अपना इकोसिस्टम न बना लें.
बिरला ओपस ने चुनी है रफ्तार
बिरला ओपस ने शायद सबसे आक्रामक रास्ता अपनाया है. वर्षों तक धीरे-धीरे अपनी मौजूदगी बनाने के बजाय उसने मैन्युफैक्चरिंग क्षमता, वितरण और व्यापक उत्पाद पोर्टफोलियो के जरिए तेजी से बड़े पैमाने पर पहुंच बनाने की कोशिश की है.
यह उस कैटेगरी में तार्किक है, जहां वितरण ऐतिहासिक रूप से प्रवेश की सबसे बड़ी बाधाओं में से एक रहा है. लेकिन किसी डीलर को उत्पाद स्टॉक करने के लिए तैयार करने और उसे उत्पाद की सिफारिश करने के लिए तैयार करने में महत्वपूर्ण अंतर है. पेंटर को उत्पाद आजमाने के लिए तैयार करने और उसे उसका पसंदीदा ब्रांड बनाने के बीच इससे भी बड़ा अंतर है. अब बिरला ओपस को उपलब्धता को ट्रायल में, ट्रायल को पसंद में और पसंद को वफादारी में बदलना होगा.
जेएसडब्ल्यू ड्यूलक्स के पास अलग बढ़त
जेएसडब्ल्यू की स्थिति अलग है क्योंकि ड्यूलक्स उसे एक स्थापित प्रीमियम ब्रांड देता है, बजाय इसके कि उसे सब कुछ शून्य से बनाना पड़े. इससे जेएसडब्ल्यू को अलग-अलग उपभोक्ता सेगमेंट में विस्तार करने का अवसर मिलता है.
ड्यूलक्स अपने साथ काफी ब्रांड इक्विटी और प्रीमियम पोजिशनिंग लेकर आता है, जबकि जेएसडब्ल्यू पूंजी, महत्वाकांक्षा और एक मौजूदा पेंट्स कारोबार लेकर आता है.
रणनीतिक चुनौती यह होगी कि पोर्टफोलियो को इस तरह से एक साथ काम कराया जाए कि उपभोक्ता भ्रमित न हों या कंपनी के भीतर अनावश्यक प्रतिस्पर्धा न पैदा हो. अगर इसे अच्छी तरह संभाला गया, तो यह संयोजन जेएसडब्ल्यू को स्थापित व्यवस्था को चुनौती देने के लिए एक मजबूत मंच देता है.
पिडिलाइट अपना अलग रास्ता अपना सकता है
पिडिलाइट के प्रवेश से बाजार में एक और आयाम जुड़ता है. कंपनी ने एडहेसिव, वॉटरप्रूफिंग, रिपेयर और संबंधित कैटेगरी में दशकों तक ब्रांड बनाने के जरिए भारतीय रिटेल, कॉन्ट्रैक्टर और होम-इंप्रूवमेंट इकोसिस्टम को पहले से समझा है, इसलिए उसका अवसर केवल पारंपरिक पेंट कंपनी के मॉडल की नकल करने में नहीं हो सकता. पिडिलाइट कंस्ट्रक्शन और होम इम्प्रूवमेंट की अपनी समझ का इस्तेमाल घर के आसपास एक व्यापक प्रस्ताव बनाने के लिए कर सकता है.
आखिरकार इससे उसकी पेंट रणनीति केवल पेंट की एक और टिन बेचने के बारे में न होकर घर के बड़े होम-इंप्रूवमेंट सफर में शामिल होने के बारे में हो सकती है.
क्या यह कीमतों की जंग बनेगी?
सबसे स्पष्ट खतरा यह है कि यह मुकाबला कीमतों की जंग बन जाए. नए खिलाड़ियों को बाजार हिस्सेदारी चाहिए. मौजूदा कंपनियों को वॉल्यूम बचाना है. डीलर स्वाभाविक रूप से मार्जिन और इंसेंटिव पर प्रतिक्रिया देते हैं, लेकिन पेंट ऐसी कैटेगरी नहीं है, जिसमें केवल कीमत विजेता तय करती है.
उपभोक्ता केवल पेंट के लिए भुगतान नहीं कर रहा है, बल्कि मजदूरी, सतह की तैयारी और दोबारा पेंट कराने की असुविधा के लिए भी भुगतान कर रहा है. इसलिए क्वालिटी, फिनिश, टिकाऊपन, रंगों की रेंज, वारंटी और सर्विस मूल्य के समीकरण का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं.
समझदार ब्रांड केवल सबसे सस्ता होने के बजाय वैल्यू पर प्रतिस्पर्धा करेंगे. असली सवाल यह है कि कोई ब्रांड उपभोक्ता को स्विच करने के लिए कौन सा अतिरिक्त कारण दे सकता है?
पेंटर बन सकता है सबसे ताकतवर इन्फ्लुएंसर
पेंटर का महत्व और बढ़ने की संभावना है. पेंटर समझते हैं कि कौन से उत्पाद लगाना आसान हैं, कौन बेहतर फिनिश देते हैं और किन उत्पादों से बाद में समस्याएं पैदा होने की संभावना है.
उनकी सिफारिश काफी प्रभावशाली होती है, खासकर प्रीमियम शहरी उपभोक्ता सेगमेंट के बाहर. इसलिए पेंटर एजुकेशन, लॉयल्टी प्रोग्राम, इंसेंटिव और सीधे जुड़ाव रणनीतिक हथियार बन जाते हैं.
कई मामलों में उपभोक्ता के लिए लड़ाई वास्तव में उपभोक्ता के पेंट की दुकान तक पहुंचने से पहले ही जीत ली जाती है. जो ब्रांड पेंटर का भरोसा जीत लेता है, वह घर जीतने की दिशा में एक कदम आगे बढ़ चुका होता है.
असली लड़ाई ब्रांड बदलने की है
यहीं नए खिलाड़ियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती है. बड़े विज्ञापन बजट के साथ जागरूकता पैदा करना अपेक्षाकृत आसान है. व्यवहार बदलना कहीं ज्यादा मुश्किल है.
एक ऐसा घर मालिक जिसने 20 वर्षों से एशियन पेंट्स का इस्तेमाल किया है, अचानक किसी दूसरे ब्रांड को क्यों आजमाएगा? बर्जर का आदी पेंटर अपनी सिफारिश क्यों बदलेगा? कोई डीलर किसी नए प्रवेश करने वाले ब्रांड को अपनी कीमती शेल्फ स्पेस और सिफारिश क्यों देगा?
ये केवल कम्युनिकेशन से जुड़े सवाल नहीं हैं. ये भरोसे, अर्थशास्त्र, प्रदर्शन और आदत से जुड़े सवाल हैं. इसलिए चुनौती देने वाले खिलाड़ियों को इकोसिस्टम में हर भागीदार को स्विच करने के लिए एक मजबूत कारण देना होगा.
भारतीय दीवार पर किसका होगा कब्जा?
भारतीय पेंट बाजार अब पूरी तरह अलग दौर में प्रवेश कर रहा है. एशियन पेंट्स को एक विशाल ब्रांड और वितरण सुरक्षा कवच की रक्षा करनी है. बर्जर को अपनी स्थिति बचाते हुए चुनौती देने वाले खिलाड़ी की तरह व्यवहार जारी रखना है. कंसाई नेरोलैक को डेकोरेटिव पेंट्स में अपनी प्रासंगिकता मजबूत करनी है. बिरला ओपस को अपने पैमाने और निवेश को लगातार उपभोक्ता पसंद में बदलना है. जेएसडब्ल्यू को ड्यूलक्स और अपने व्यापक पेंट्स पोर्टफोलियो को एक साथ प्रभावी ढंग से काम कराना है. पिडिलाइट को यह पता लगाना है कि क्या उसका होम-इंप्रूवमेंट इकोसिस्टम उसे पेंट्स में एक अलग रास्ता दे सकता है.
त्योहारी सीजन यह महत्वपूर्ण संकेत देगा कि ये रणनीतियां उपभोक्ता व्यवहार में कैसे बदल रही हैं. लेकिन यह केवल त्योहारी बिक्री की लड़ाई नहीं है.
यह वितरण, डीलर इकनॉमिक्स, पेंटर के प्रभाव, उपभोक्ता के भरोसे और अंततः ब्रांड पसंद की लड़ाई है. वर्षों तक भारतीय पेंट उद्योग मुख्य रूप से बाजार हिस्सेदारी बचाने के बारे में था.
अब हर प्रमुख खिलाड़ी को इसे हासिल करने के लिए लड़ना होगा. और सबसे बड़ा इनाम पेंट का डिब्बा नहीं है. यह भारतीय घर के अंदर की दीवार है.
डॉ. अनुराग बत्रा, BW रिपोर्टर्स
(डॉ. अनुराग बत्रा BW Businessworld के चेयरमैन और एडिटर-इन-चीफ तथा exchange4media Group के संस्थापक हैं. पहली पीढ़ी के उद्यमी और मीडिया लीडर होने के साथ-साथ वह एंजल इन्वेस्टर, लेखक, टेलीविजन होस्ट और उद्यमियों तथा मीडिया प्रोफेशनल्स के मेंटर भी हैं. वह कई कॉरपोरेट और संस्थागत बोर्डों में काम करते हैं और मैनेजमेंट एजुकेशन से लंबे समय से जुड़े हुए हैं. वह MDI गुरुग्राम के पूर्व छात्र हैं और इसके बोर्ड ऑफ गवर्नर्स में काम कर चुके हैं तथा MDI Alumni Association के अध्यक्ष रह चुके हैं. वह International Academy of Television Arts & Sciences के सदस्य भी हैं. एक उत्साही पाठक डॉ. बत्रा का मानना है कि जब जुनून किसी का पेशा बन जाता है, तो काम को उद्देश्य की गहरी भावना मिलती है.)
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