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Modi@76: मेक इन इंडिया से ‘मेड फॉर द वर्ल्ड’ तक, भारत के मैन्युफैक्चरिंग के अगले अध्याय की कमान संभालेंगे MSMEs

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन के इस विशेष अवसर पर, पिछले एक दशक में भारत की अर्थव्यवस्था और औद्योगिक परिदृश्य में आए बदलावों को देखना जरूरी है.

गौरव भगत 1 month ago

आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन के इस विशेष अवसर पर, पिछले एक दशक में भारत की अर्थव्यवस्था और औद्योगिक परिदृश्य में आए बदलावों को देखना जरूरी है. इस बदलाव को केवल नारों या पहलों के संदर्भ में नहीं, बल्कि उन आंकड़ों के आधार पर समझने की आवश्यकता है जो भारत के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर और MSMEs की बदलती भूमिका को दर्शाते हैं.

‘मेक इन इंडिया’ की सफलता का आकलन केवल इस बात से नहीं होना चाहिए कि भारत कितना उत्पादन करता है, बल्कि इससे भी होना चाहिए कि वह वैल्यू चेन में कितनी तेजी से ऊपर बढ़ रहा है, कितने उत्पादक रोजगार पैदा कर रहा है और वैश्विक बाजार में एक प्रतिस्पर्धी सप्लायर के रूप में अपनी जगह कितनी मजबूत कर रहा है.

भारत की अर्थव्यवस्था के विस्तार के बीच यह सवाल और अधिक महत्वपूर्ण हो गया है. वित्त वर्ष 2025-26 में भारत की वास्तविक GDP वृद्धि 7.7% रहने का अनुमान है और स्थिर कीमतों पर यह ₹323.12 लाख करोड़ तक पहुंचने की उम्मीद है. इसी अवधि में मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में भी गतिविधियों में मजबूती दिखाई दी है. वित्त वर्ष 2025-26 की पहली तिमाही में मैन्युफैक्चरिंग GVA में 7.72% और दूसरी तिमाही में 9.13% की वृद्धि दर्ज की गई, जबकि दिसंबर 2025 में मैन्युफैक्चरिंग आउटपुट 8.1% बढ़ा.

मेक इन इंडिया अब केवल असेंबली तक सीमित नहीं

सितंबर 2014 में जब ‘मेक इन इंडिया’ की शुरुआत हुई थी, तब लक्ष्य भारत को मैन्युफैक्चरिंग, डिजाइन और इनोवेशन का हब बनाना था. एक दशक बाद अधिक महत्वपूर्ण कहानी अलग-अलग उद्योगों के इर्द-गिर्द विकसित हुए मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम की है. इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल्स, फार्मास्यूटिकल्स, रिन्यूएबल एनर्जी, डिफेंस, टेक्सटाइल्स और फूड प्रोसेसिंग जैसे क्षेत्रों में इसकी स्पष्ट झलक दिखाई देती है.

इस बदलाव का एक महत्वपूर्ण प्रमाण Production Linked Incentive (PLI) योजनाएं हैं. दिसंबर 2025 तक इन योजनाओं ने 14 सेक्टर्स में ₹2.16 लाख करोड़ से अधिक के निवेश को सुगम बनाया और ₹20.41 लाख करोड़ से अधिक के अतिरिक्त उत्पादन एवं बिक्री में योगदान दिया. इन योजनाओं के माध्यम से 14.39 लाख से अधिक प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार भी पैदा हुए हैं.

इलेक्ट्रॉनिक्स में दिखी मैन्युफैक्चरिंग की बढ़ती क्षमता

इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर इस मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम की प्रगति का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है. इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं का उत्पादन 2014-15 में लगभग ₹1.9 लाख करोड़ से बढ़कर 2024-25 में ₹11.3 लाख करोड़ हो गया. इसी अवधि में इनके निर्यात ₹38,000 करोड़ से बढ़कर ₹3.3 लाख करोड़ हो गए. वहीं, मोबाइल फोन का उत्पादन ₹18,000 करोड़ से बढ़कर ₹5.5 लाख करोड़ तक पहुंच गया.

अब अगला लक्ष्य केवल उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि भारत में कंपोनेंट्स, मशीनरी, इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी और हाई-वैल्यू प्रोडक्ट्स के निर्माण के जरिए वास्तविक वैल्यू क्रिएशन करना होना चाहिए.

असली इंजन: विकास और फॉर्मलाइजेशन के केंद्र में MSMEs

भारत में एक समावेशी मैन्युफैक्चरिंग इकोनॉमी का निर्माण केवल बड़ी कंपनियों के माध्यम से नहीं हो सकता. हर बड़ी कंपनी की सप्लाई चेन के पीछे छोटे और मध्यम व्यवसायों का एक विशाल नेटवर्क काम करता है. Economic Survey 2025-26 के अनुसार, MSMEs भारत की GDP में 31.1%, मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में 35.4% और निर्यात में 48.58% का योगदान देते हैं.

ये आंकड़े ‘मेक इन इंडिया’ की हमारी समझ को एक नया आयाम देते हैं. MSMEs मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के हाशिये पर मौजूद केवल एक श्रेणी नहीं हैं; वे इसके संचालन और विकास की बुनियादी परत हैं.

फॉर्मलाइजेशन के साथ बढ़ रहा MSME बेस

MSME सेक्टर का फॉर्मलाइजेशन भी तेजी से आगे बढ़ रहा है. MSME मंत्रालय के डैशबोर्ड के अनुसार, 17 सितंबर 2026 तक 9.6 करोड़ से अधिक Udyam और Udyam Assist Platform रजिस्ट्रेशन हो चुके हैं, जबकि रजिस्टर्ड इकाइयों से जुड़ा रोजगार 42.5 करोड़ से अधिक है. ये आंकड़े MSME बेस की विविधता को भी दर्शाते हैं, जिसमें मैन्युफैक्चरिंग, सर्विस और ट्रेडिंग से जुड़ी इकाइयां शामिल हैं.

अब हमारे सामने अगला बड़ा सवाल यह है कि इनमें से कितने व्यवसाय स्थानीय सप्लायर की भूमिका से आगे बढ़कर वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने वाले उद्यम बन पाएंगे.

क्षमता का विस्तार: लोकल वेंडर्स से ग्लोबल पार्टनर्स तक

भारत के MSMEs के अगले दशक की चुनौती केवल घरेलू बाजार में टिके रहने की नहीं होगी. असली चुनौती एडवांस्ड ग्लोबल सप्लाई चेन का हिस्सा बनने की होगी.

दुनिया की कंपनियां अपने प्रोडक्शन और सोर्सिंग नेटवर्क में विविधता लाने की कोशिश कर रही हैं. लेकिन इस अवसर का लाभ उठाने के लिए केवल उत्पादन क्षमता पर्याप्त नहीं होगी. क्वालिटी, डिलीवरी, टेक्नोलॉजी, सर्टिफिकेशन, फाइनेंसिंग और स्केल, इन सभी मोर्चों पर निरंतरता जरूरी होगी.

यहीं से भारत की MSME पॉलिसी आर्किटेक्चर को केवल फॉर्मलाइजेशन से आगे बढ़ाकर कैपेसिटी बिल्डिंग की ओर ले जाने की आवश्यकता दिखाई देती है.

क्रेडिट के साथ टेक्नोलॉजी और क्वालिटी पर भी जोर जरूरी

क्रेडिट तक पहुंच आज भी महत्वपूर्ण है. MSME डैशबोर्ड के अनुसार, जुलाई 2026 तक Credit Guarantee Fund Trust for Micro and Small Enterprises के तहत कुल ₹15.12 लाख करोड़ की क्रेडिट गारंटी दी जा चुकी है.

पूंजी तक पहुंच किसी व्यवसाय को उपकरण खरीदने में सक्षम बनाती है, लेकिन आज प्रतिस्पर्धा इस बात से तय होगी कि उन उपकरणों से क्या बनाया जाता है, कितनी दक्षता से बनाया जाता है और वह अंतरराष्ट्रीय मानकों पर कितना खरा उतरता है. इसलिए टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल, ऑपरेशनल एफिशिएंसी, डिजिटल पेमेंट्स, सर्टिफिकेशन, एक्सपोर्ट की तैयारी और मैनेजमेंट क्षमता, इन सभी को MSME नीति में क्रेडिट तक पहुंच जितना ही महत्व मिलना चाहिए.

अगला मेक इन इंडिया अधिक टेक्नोलॉजी-इंटेंसिव होना चाहिए

भारत के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की संरचना में टेक्नोलॉजी-आधारित मैन्युफैक्चरिंग की ओर बड़ा बदलाव आया है. आज मीडियम और हाई-टेक्नोलॉजी इंडस्ट्रीज मिलकर मैन्युफैक्चरिंग वैल्यू एडेड का 46.3% हिस्सा बनाती हैं.

भविष्य की नौकरियां अब केवल पारंपरिक असेंबली लाइनों पर निर्भर नहीं रहेंगी. रोबोटिक्स, सेमीकंडक्टर्स, इलेक्ट्रिक व्हीकल मोबिलिटी, एयरोस्पेस और एडवांस्ड मैटेरियल्स जैसे क्षेत्र आने वाले रोजगार और औद्योगिक विकास को आकार देंगे.

₹40,000 करोड़ के बजट आवंटन के साथ विस्तारित Electronics Components Manufacturing Scheme जैसे महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट इसी दिशा में संकेत देते हैं. ऐसे में MSMEs के लिए आगे बढ़ने का रास्ता हाई-टेक सप्लाई चेन में सक्रिय भागीदारी से होकर जाता है.

इस बदलाव को संभव बनाने के लिए केवल क्रेडिट सुविधाओं पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं होगा. रिसर्च एंड डेवलपमेंट के लिए को-फंडिंग, क्वालिटी सर्टिफिकेशन को वैश्विक स्तर तक ले जाने और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर को बढ़ावा देने जैसे कदम भी आवश्यक होंगे.

विकसित भारत@2047: वैश्विक स्तर की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता का निर्माण

अगर पहला चरण भारत की आंतरिक क्षमताओं को विकसित करने का था, तो अगली चुनौती वैश्विक प्रतिस्पर्धा की है. भारत के MSMEs को केवल आयात का विकल्प बनने तक सीमित नहीं रहना चाहिए. उन्हें ऐसे उत्पाद बनाने का लक्ष्य रखना होगा जो दुनिया के सर्वश्रेष्ठ उत्पादों को भी कड़ी प्रतिस्पर्धा दे सकें.

आखिरकार, सफलता का आकलन उत्पादकता, तकनीकी क्षमता और निर्यात क्षमता के आधार पर होगा.

बेहतर स्किल डेवलपमेंट, पूंजी और बाजार तक पहुंच के साथ भारत अपने छोटे व्यवसायों को बहुराष्ट्रीय कंपनियों के महत्वपूर्ण ग्लोबल पार्टनर्स में बदल सकता है. यही वह बदलाव है जो भारत की मैन्युफैक्चरिंग कहानी के अगले अध्याय को परिभाषित करेगा, ‘भारत में मैन्युफैक्चरिंग’ से आगे बढ़कर ‘भारत का मैन्युफैक्चरिंग’ बनाने की दिशा में.

अतिथि लेखक: गौरव भगत, उद्यमी

(गौरव भगत, कंसोर्टियम गिफ्ट्स और गौरव भगत अकादमी के फाउंडर हैं.)


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