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हीराबेन के हीरा पुत्र नरेंद्र मोदी: नारी शक्ति को सम्मान, अधिकार और नेतृत्व देने की पहल

प्रोफेसर पायल मागो कहती हैं, नरेंद्र मोदी के भाषणों और जमीनी कार्यों में शिक्षा और महिला सशक्तीकरण को राष्ट्र के विकास की केंद्रीय शर्त के रूप में प्रस्तुत किया गया है.

प्रोफेसर पायल मागो 1 month ago

माननीय नरेंद्र मोदी के भारत के प्रधानमंत्री बनने के साथ ही मातृ शक्ति को महत्व मिलने का नया दौर आरंभ हुआ. भारतीय स्त्रियों को समर्पित ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ और ‘सुकन्या समृद्धि’ जैसी योजनाएं हों या ‘Women-Led Development’, ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ जैसे देश को आंदोलित कर देने वाले विचार हों, लगभग प्रत्येक नीति में मातृ शक्ति के लिए चिंता और चिंतन की अनुगूंज सुनाई देती है.

ये विचार अनायास नहीं आते. कोई भी विचार हवा में पैदा नहीं होता. संघर्षशील मां हीराबेन के सुपुत्र नरेंद्र मोदी के युवावस्था के दौर में स्त्रियों के प्रति उनके विचार कैसे थे, इसका पता उनकी एक पुस्तक से चलता है.

‘प्रेमतीर्थ’ में दिखाई देती युवा नरेंद्र मोदी की संवेदना

भारत का प्रधानमंत्री बनने से पहले नरेंद्र मोदी की कहानियों की एक पुस्तक प्रकाशित हुई थी, जिसका नाम था ‘प्रेमतीर्थ’. इन कहानियों के बारे में उपलब्ध विवरण के अनुसार, आपातकाल के दौर में भूमिगत रहते हुए युवा नरेंद्र मोदी ने इन्हें लिखा था.

इस पुस्तक के समर्पण में उन्होंने लिखा था: “दिव्य पुंज रूप समस्त मातृशक्ति के श्री चरणों में”

इस संग्रह की कहानियां मातृत्व प्रेम के विभिन्न पहलुओं पर लिखी गई हैं. इसकी काव्यमय भूमिका में नरेंद्र मोदी ने लिखा कि “मातृशक्ति की निर्मल प्रेमधारा, लुप्त सरस्वती की तरह अविरत बह रही है. इसका दर्शन नहीं सिर्फ अनुभूति ही होगी.”

बाद में जब उन्हें देश का नेतृत्व करने का अवसर मिला तो उस स्वप्न और अनुभूति को जमीन पर उतारने के लिए उन्होंने अथक प्रयास किए.

महिला सशक्तीकरण को विकास की केंद्रीय शर्त मानने की सोच

नरेंद्र मोदी के भाषणों और जमीनी कार्यों में शिक्षा और महिला सशक्तीकरण को राष्ट्र के विकास की केंद्रीय शर्त के रूप में प्रस्तुत किया गया है. महिलाओं के संदर्भ में उनका विमर्श केवल कल्याणकारी योजनाओं तक सीमित नहीं रहता, बल्कि राष्ट्र के विकास में स्त्रियों की सक्रिय सहभागिता और उनकी नेतृत्वकारी भूमिका पर भी जोर देता है. इस दृष्टिकोण के अनेक उदाहरण मिलते हैं.

नारी शक्ति वंदन अधिनियम से राजनीतिक भागीदारी पर जोर

106वां संवैधानिक संशोधन अधिनियम, 2023, जिसे लोकप्रिय रूप से नारी शक्ति वंदन अधिनियम या महिला आरक्षण अधिनियम कहा जाता है, लोकसभा, राज्य विधानसभाओं और दिल्ली की विधानसभा में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटों के आरक्षण का प्रावधान करता है. इसमें अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटों में भी महिलाओं के लिए आरक्षण का प्रावधान शामिल है. 

यह कानून राजनीति और नीति निर्माण में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रावधान के रूप में सामने आया.

‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ से शिक्षा को सशक्तीकरण से जोड़ने की कोशिश

महिलाओं को जागरूक और आत्मनिर्भर बनाने के लिए उनका शिक्षित होना जरूरी है. इसी सोच के तहत नरेंद्र मोदी ने ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ को केवल एक नारे के रूप में नहीं, बल्कि बेटी के जीवन और शिक्षा को एक साझा सामाजिक लक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किया.

नरेंद्र मोदी महिला सशक्तीकरण का एक ऐसा रोडमैप सामने रखते हैं, जिसमें व्यक्ति की क्षमता विकसित करने का सबसे बड़ा माध्यम शिक्षा है. अर्थात बालिकाओं की शिक्षा महिला सशक्तीकरण की बुनियादी शर्त है.

आर्थिक और कानूनी अधिकार महिलाओं को संसाधनों और अवसरों तक पहुंच प्रदान करने के माध्यम हैं, जबकि राजनीतिक आरक्षण संस्थागत निर्णय-निर्माण में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने का संवैधानिक उपाय है.

प्रयागराज सम्मेलन में ‘नारी शक्ति’ पर जोर

21 दिसंबर 2021 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रयागराज में एक महिला सशक्तीकरण सम्मेलन को संबोधित किया. अपने भाषण में उन्होंने महिलाओं की सुरक्षा, सम्मान और विकास से जुड़े प्रयासों का उल्लेख किया और ‘नारी शक्ति’ के विकास को लेकर विभिन्न घोषणाएं कीं.

इस कार्यक्रम में उन्होंने ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ अभियान को सामाजिक चेतना से जोड़ते हुए कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ जागरूकता और बेटियों की शिक्षा सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर जोर दिया. उन्होंने बालिकाओं के लिए विद्यालयों में शौचालय, छात्राओं की शिक्षा जारी रखने और सुकन्या समृद्धि योजना जैसी पहलों का भी उल्लेख किया.

राष्ट्रीय शिक्षा नीति में बालिका शिक्षा को प्राथमिकता

स्त्री शिक्षा और नारी सशक्तीकरण के प्रति नरेंद्र मोदी की दृष्टि का एक महत्वपूर्ण उदाहरण राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 के प्रावधानों में भी देखा जा सकता है. नीति में लैंगिक समानता, मानवाधिकार, सम्मान, विविधता और समावेशन को शिक्षा व्यवस्था का हिस्सा बनाने पर जोर दिया गया है.

राष्ट्रीय शिक्षा नीति में महिलाओं और बालिकाओं की शिक्षा को विशेष महत्व दिया गया है. महिलाओं को सामाजिक और आर्थिक रूप से वंचित समूहों यानी Socio-Economically Disadvantaged Groups (SEDGs) के महत्वपूर्ण घटक के रूप में देखा गया है. साथ ही लैंगिक समानता को शिक्षा व्यवस्था की प्राथमिकता के रूप में रेखांकित किया गया है.

Gender Inclusion Fund से समान शैक्षणिक अवसर का लक्ष्य

राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत लड़कियों और अन्य वंचित समूहों के लिए Gender Inclusion Fund का प्रावधान किया गया है. इसका उद्देश्य बालिकाओं और ट्रांसजेंडर विद्यार्थियों के लिए गुणवत्तापूर्ण और समान शिक्षा तक पहुंच को बढ़ावा देना है. 

नीति में सामाजिक और आर्थिक रूप से वंचित पृष्ठभूमि की बालिकाओं की शिक्षा के लिए Kasturba Gandhi Balika Vidyalayas (KGBVs) को मजबूत करने और लड़कियों की गुणवत्तापूर्ण शिक्षा में भागीदारी बढ़ाने पर भी जोर दिया गया है. 

बालिका शिक्षा को केवल नामांकन तक सीमित नहीं मानना

हम जानते हैं कि गरीबी, अशिक्षा और भौगोलिक बाधाओं की सबसे बड़ी कीमत लड़कियों को चुकानी पड़ती है. राष्ट्रीय शिक्षा नीति में इस चुनौती पर विशेष बल दिया गया है. इसका उद्देश्य विद्यालय तक लड़कियों की पहुंच में मौजूद भौगोलिक, आर्थिक और सामाजिक बाधाओं को कम करना है.

दूरस्थ क्षेत्रों में विद्यालय, सुरक्षित परिवहन और छात्रावास जैसी सुविधाओं को विशेष महत्व दिया गया है. लड़कियों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए आवासीय सुविधाओं के विकास का भी उल्लेख है.

राष्ट्रीय शिक्षा नीति बालिका शिक्षा की समस्या को केवल ‘नामांकन’ की समस्या नहीं मानती, बल्कि access, participation, retention और quality जैसे सभी आयामों से जोड़ती है. इसी सोच के तहत KGBVs को मजबूत करने, उनका विस्तार करने और digital gender divide को कम करने जैसी पहलों पर जोर दिया गया है.

G20 में ‘Women-Led Development’ को वैश्विक विमर्श बनाना

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत की G20 अध्यक्षता के दौरान ‘Women-Led Development’ को वैश्विक विमर्श में प्रमुखता मिली. इस दृष्टिकोण में महिलाओं के केवल विकास की बात नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण और निर्णय लेने की प्रक्रिया में उनकी अग्रणी भूमिका पर जोर दिया गया.

इस दौरान महिलाओं को अर्थव्यवस्था, कारोबार और नेतृत्व के पदों पर अवसर देने तथा राजनीति और प्रशासन के शीर्ष स्तर पर महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की आवश्यकता पर चर्चा हुई. सरकार ने भी महिला विकास से आगे बढ़कर ‘Women-Led Development’ की अवधारणा को अपनी नीतिगत भाषा का हिस्सा बनाया है. 

तीन तलाक के खिलाफ कानून और मुस्लिम महिलाओं के अधिकार

महिला अधिकारों के संदर्भ में नरेंद्र मोदी सरकार के कार्यकाल में तीन तलाक से संबंधित कानून भी एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में सामने आया. सरकार ने इसे मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों और कानूनी संरक्षण से जोड़कर प्रस्तुत किया.

इस कानून को लेकर राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर अलग-अलग मत रहे हैं, लेकिन महिला अधिकारों से जुड़े विमर्श में तीन तलाक का मुद्दा नरेंद्र मोदी सरकार के प्रमुख विधायी कदमों में शामिल रहा है.

शिक्षा, अधिकार और प्रतिनिधित्व का आपस में संबंध

इस प्रकार हम पाते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शिक्षा, भाषा, महिला अधिकार और राजनीतिक प्रतिनिधित्व को आपस में अंतर्संबंधित माना है. उनके महिला सशक्तीकरण संबंधी विमर्श में शिक्षा को आधार, आर्थिक और कानूनी अधिकारों को अवसर का माध्यम तथा राजनीतिक प्रतिनिधित्व को निर्णय लेने की प्रक्रिया में भागीदारी के साधन के रूप में देखा जा सकता है. इन सभी मोर्चों पर एक साथ काम करने की आवश्यकता को उनकी नीतिगत सोच में प्रमुखता मिलती है.

एक मां की सीख से राष्ट्र निर्माण की सोच तक

एक स्त्री के रूप में मुझे ऐसा लगता है कि हमारी जो आवाज दशकों तक नहीं सुनी गई थी, उसे नरेंद्र मोदी के रूप में एक मंच मिला है.

हीराबेन के संस्कारों से निकली मातृ शक्ति की वह अनुभूति, जिसे युवा नरेंद्र मोदी ने ‘प्रेमतीर्थ’ की कहानियों में शब्द दिए थे, आज महिला शिक्षा, अधिकार, सुरक्षा, आर्थिक भागीदारी और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के विमर्श तक पहुंचती दिखाई देती है. यही यात्रा ‘हीराबेन के हीरा पुत्र नरेंद्र मोदी’ की उस सोच को रेखांकित करती है, जिसमें मातृ शक्ति केवल सम्मान की पात्र नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की सक्रिय भागीदार भी है.

अतिथि लेखिका: प्रोफेसर पायल मागो

(प्रोफेसर पायल मागो दिल्ली विश्वविद्यालय के कैंपस ऑफ ओपन लर्निंग (COL) की निदेशक और वह शहीद राजगुरु कॉलेज ऑफ एप्लाइड साइंसेज फॉर विमेन, दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रिंसिपल हैं. वे फैकल्टी ऑफ ओपन लर्निंग की डीन और डिपार्टमेंट ऑफ डिस्टेंस एंड कंटिन्यूइंग एजुकेशन की प्रमुख भी हैं. उनकी विशेषज्ञता वनस्पति विज्ञान (Botany) के क्षेत्र में है, जिसमें माइकोराइजा (Mycorrhizae), जैव-उपचार (Bioremediation) और विदेशी पौधों का आक्रमण (Exotic Plant Invasion) जैसे विषय शामिल हैं. उन्होंने बीएससी (ऑनर्स), एमएससी, एमफिल और पीएचडी  की पढ़ाई दिल्ली विश्वविद्यालय से की है. उनके नाम से कई शोध पत्र प्रकाशित हुए हैं, जिनमें पर्यावरण संरक्षण, फाइटोरेमेडिएशन (Phytoremediation), मशरूम और जैव विविधता (Biodiversity) जैसे विषय शामिल हैं.)
 


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