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टाटा के नेतृत्व से प्रतिभा निर्माण तक: चंद्रशेखरन से भारत क्या सीख सकता है
जैसे ही एन. चंद्रशेखरन टाटा संस के चेयरमैन के रूप में अपना कार्यकाल पूरा करने की तैयारी कर रहे हैं, भारत को विचार करना चाहिए कि तकनीक, नेतृत्व और क्रियान्वयन में उनका अनुभव कौशल, शिक्षा और उद्यमिता को कैसे मजबूत कर सकता है
डॉ. अनुराग बत्रा 2 hours ago
एन. चंद्रशेखरन के टाटा संस के चेयरमैन के रूप में अपना कार्यकाल पूरा करने के बाद वह क्या करेंगे, इस सवाल में काफी दिलचस्पी होने की संभावना है. लेकिन शायद इससे भी महत्वपूर्ण सवाल यह नहीं है कि उनकी अगली जिम्मेदारी क्या होगी. सवाल यह है कि भारत लगभग चार दशकों में तकनीक, कारोबार, नेतृत्व और संस्थान निर्माण के क्षेत्र में उनके द्वारा अर्जित विशाल अनुभव का किस तरह उपयोग कर सकता है.
चंद्रा फरवरी 2027 में टाटा संस के चेयरमैन के रूप में अपना कार्यकाल पूरा करने की तैयारी कर रहे हैं. उनका अनुभव केवल कॉरपोरेट जगत तक सीमित रहने की जरूरत नहीं है. यहां एक बड़ा राष्ट्रीय अवसर मौजूद है. भारत ऐसे दौर में है, जहां उसकी महत्वाकांक्षाएं तेजी से बढ़ रही हैं, लेकिन इन महत्वाकांक्षाओं को कितना आगे ले जाया जा सकता है, यह उसके मानव संसाधन की गुणवत्ता तय करेगी. इसलिए कौशल, शिक्षा, उद्यमिता और मानव संसाधन विकास अलग-अलग विषय नहीं हैं. ये सभी एक बड़ी चुनौती का हिस्सा हैं: भारतीयों को भविष्य की अर्थव्यवस्था के लिए तैयार करना.
भारत जिस अनुभव का इस्तेमाल कर सकता है
चंद्रा उद्योग और क्रियान्वयन का ऐसा नजरिया लेकर आते हैं, जो सरकार के भीतर पहले से मौजूद अनुभव का पूरक बन सकता है. उन्होंने देखा है कि बड़े संगठन कैसे बनाए जाते हैं, तकनीक कारोबार को कैसे बदलती है, प्रतिभा की पहचान और उसका विकास कैसे किया जाता है और प्रासंगिक बने रहने के लिए संस्थानों को लगातार खुद को कैसे नए रूप में ढालना पड़ता है.
इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि उन्होंने तकनीक और लोगों के बीच के संबंधों के स्तर पर काम किया है. तमिलनाडु में एक सामान्य शुरुआत से लेकर भारत के सबसे सम्मानित कारोबारी समूहों में से एक के नेतृत्व तक की उनकी अपनी यात्रा उन्हें अवसर, शिक्षा और सामाजिक-आर्थिक गतिशीलता के बारे में ऐसा नजरिया देती है, जो भारत के लिए विशेष रूप से प्रासंगिक है.
सरकार के पास इन क्षेत्रों में योजनाओं की कोई कमी नहीं है. लेकिन कभी-कभी उसे नीति और क्रियान्वयन के बीच, शिक्षा और रोजगार के बीच तथा कक्षा और कार्यस्थल के बीच एक मजबूत पुल की जरूरत होती है. यहीं चंद्रा का अनुभव विशेष रूप से उपयोगी हो सकता है.
कौशल प्रमाणपत्र से रोजगार क्षमता तक
कौशल विकास शायद सबसे तत्काल ऐसा क्षेत्र है, जहां उनका अनुभव बदलाव ला सकता है.
भारत ने युवाओं को कौशल प्रदान करने में भारी निवेश किया है, लेकिन असली परीक्षा यह नहीं है कि कितने प्रमाणपत्र जारी किए जाते हैं. असली सवाल यह है कि क्या ये कौशल उत्पादक रोजगार, उद्यमिता और बेहतर आय में बदलते हैं.
उद्योग को कौशल पारिस्थितिकी तंत्र का कहीं अधिक अभिन्न हिस्सा बनना होगा. पाठ्यक्रम कार्यस्थल से अलग रहकर तैयार नहीं किया जा सकता. अप्रेंटिसशिप, व्यावहारिक प्रशिक्षण, उद्योग का अनुभव और प्लेसमेंट इस व्यवस्था का हिस्सा बनने चाहिए, न कि इसके आसपास की अतिरिक्त गतिविधियां.
चंद्रा सरकार को इस पूरी प्रक्रिया में उद्योग का नजरिया लाने में मदद कर सकते हैं. तकनीक और काम की बदलती प्रकृति को लेकर उनकी समझ भारत को उन कौशलों का अनुमान लगाने में भी मदद कर सकती है, जिनकी अगले पांच या दस वर्षों में जरूरत होगी, बजाय इसके कि देश लगातार बीते समय की जरूरतों के आधार पर प्रतिक्रिया देता रहे.
शिक्षा को एक अलग दुनिया के लिए तैयार करना होगा
बड़ी चुनौती शिक्षा की है.
भारत ने शिक्षा तक पहुंच का बड़े पैमाने पर विस्तार किया है. अगले चरण में उस शिक्षा को ऐसी दुनिया के लिए प्रासंगिक बनाने पर ध्यान देना होगा, जहां तकनीक, खास तौर पर कृत्रिम बुद्धिमत्ता, काम की प्रकृति को बदल रही है.
उद्देश्य केवल स्नातक तैयार करना नहीं हो सकता. भारत को ऐसे युवाओं की जरूरत है, जो स्वतंत्र रूप से सोच सकें, समस्याओं का समाधान कर सकें, प्रभावी ढंग से संवाद कर सकें, तकनीक के साथ काम कर सकें और अपने पूरे करियर के दौरान सीखते रहें.
इसके लिए विश्वविद्यालयों और उद्योग के बीच कहीं अधिक करीबी संबंध जरूरी हैं. छात्रों को वास्तविक दुनिया की परियोजनाओं, अप्रेंटिसशिप और उभरती तकनीकों का अनुभव मिलना चाहिए. शिक्षकों और पाठ्यक्रमों को भी लगातार विकसित करना होगा.
चंद्रा का अनुभव यहां उपयोगी हो सकता है क्योंकि वह समीकरण के दोनों पक्षों को समझते हैं: संस्थान क्या तैयार करते हैं और आधुनिक संगठनों को तेजी से किस तरह की प्रतिभा की जरूरत पड़ रही है.
बड़े शहरों से आगे ले जानी होगी उद्यमिता
भारत की उद्यमिता की कहानी प्रभावशाली है, लेकिन बड़े महानगरों के बाहर काफी अधिक संभावनाएं अभी भी मौजूद हैं.
टियर-2 या टियर-3 शहर में रहने वाले किसी युवा के पास कोई विचार, महत्वाकांक्षा और तकनीकी क्षमता भी हो सकती है, लेकिन उसके पास मेंटर्स, बाजार, पूंजी या नेटवर्क तक पहुंच नहीं हो सकती. सरकारी कार्यक्रम सहायता के कुछ हिस्से उपलब्ध करा सकते हैं, लेकिन पारिस्थितिकी तंत्र अक्सर बिखरा हुआ रहता है.
यह एक और क्षेत्र है, जहां चंद्रा का संगठनों के निर्माण और उन्हें बड़े स्तर पर ले जाने का अनुभव उपयोगी हो सकता है.
भारत की उद्यमिता की कहानी का अगला चरण केवल बेंगलुरु, मुंबई, दिल्ली या हैदराबाद के स्टार्टअप तक सीमित नहीं होना चाहिए. यह छोटे शहरों और कस्बों में उद्यमियों को तैयार करने, उन्हें तकनीक, बाजार और विशेषज्ञता से जोड़ने और ऐसे कारोबार खड़े करने का आत्मविश्वास देने के बारे में होना चाहिए, जो आगे बढ़ सकें.
मानव संसाधन की बड़ी चुनौती
शायद सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र मानव संसाधन विकास है.
रोजगार की प्रकृति ही बदल रही है. कृत्रिम बुद्धिमत्ता और ऑटोमेशन केवल तकनीक उद्योग में ही नहीं, बल्कि विभिन्न क्षेत्रों में नौकरियों को बदलेंगे. लोगों को अपने कामकाजी जीवन के दौरान लगातार सीखना, पुरानी चीजों को भूलना और फिर से सीखना होगा.
इसलिए भारत को मानव संसाधन विकास की पारंपरिक सोच से आगे बढ़ने की जरूरत है, जिसमें लोगों को केवल उनकी पहली नौकरी के लिए तैयार किया जाता है.
देश को आजीवन सीखने की व्यवस्था की जरूरत है.
कंपनियों की भूमिका होगी. विश्वविद्यालयों की भूमिका होगी. सरकार की भूमिका होगी. लेकिन ऐसे व्यक्ति की भी जरूरत है, जो इन सीमाओं से परे जाकर यह बुनियादी सवाल पूछ सके: अगले दशक में भारत को किस तरह की प्रतिभा की जरूरत होगी?
चंद्रा इस बातचीत में योगदान देने के लिए अच्छी स्थिति में हैं.
जिम्मेदारी से बड़ी भूमिका
जब भी कोई सफल कारोबारी नेता किसी बड़ी कॉरपोरेट जिम्मेदारी के अंत के करीब पहुंचता है, तो यह अटकलें लगना स्वाभाविक है कि क्या वह सरकार में कोई औपचारिक भूमिका संभाल सकता है.
चंद्रा के मामले में सटीक संरचना से ज्यादा महत्वपूर्ण उसका उद्देश्य हो सकता है. चाहे औपचारिक सार्वजनिक भूमिका के जरिए या सरकार, उद्योग, शिक्षा जगत और तकनीकी नेताओं को एक साथ लाने वाले राष्ट्रीय मंच के जरिए, भारत को उनके अनुभव का सार्थक इस्तेमाल करने का रास्ता तलाशना चाहिए.
ऐसी पहल कौशल, शिक्षा, उद्यमिता और भविष्य की प्रतिभा के आपस में जुड़े क्षेत्रों में काम कर सकती है. चंद्रा क्रियान्वयन का अनुशासन, उद्योग की समझ और तकनीक आधारित संगठन का नजरिया उन क्षेत्रों में ला सकते हैं, जहां सरकार पहले ही पर्याप्त संसाधनों का निवेश कर रही है.
अनुभव को राष्ट्रीय संपत्ति में बदलना
भारत ने असाधारण कारोबारी नेताओं की कई पीढ़ियां तैयार की हैं. अक्सर जो चीज गायब रहती है, वह है उनके अनुभव को व्यापक राष्ट्रीय विकास प्रक्रिया में वापस लाने का एक संरचित तरीका.
चंद्रा एक दिलचस्प अवसर पेश करते हैं क्योंकि उनका अनुभव तकनीक, प्रबंधन, लोगों और संस्थान निर्माण तक फैला हुआ है. इसलिए भारत के लिए उनकी उपयोगिता उन कंपनियों से कहीं आगे तक हो सकती है, जिनका वह नेतृत्व करते हैं.
टाटा की कहानी हमेशा व्यक्तिगत कारोबारों से बड़ी रही है. यह ऐसे संस्थान बनाने के बारे में रही है, जो व्यक्तियों से आगे तक बने रहें और देश में योगदान देते रहें.
शायद चंद्रा का अगला योगदान भी इसी सिद्धांत का अनुसरण कर सकता है.
उन्होंने अपने करियर का एक बड़ा हिस्सा भारत के सबसे महत्वपूर्ण कारोबारी संस्थानों में से एक को बनाने में बिताया है. अगला अवसर भारत को कुछ और बुनियादी बनाने में मदद करने का हो सकता है: वह प्रतिभा, कौशल और उद्यमशील क्षमता, जो देश का भविष्य तय करेगी.
यह उनके अगले अध्याय को केवल टाटा से आगे बढ़ने का कदम नहीं, बल्कि उस भारत में योगदान बनाएगा, जो आज से आगे का भारत है.
डॉ. अनुराग बत्रा, BW रिपोर्टर्स
(लेखक BW बिजनेसवर्ल्ड ग्रुप के चेयरमैन और एडिटर-इन-चीफ तथा एक्सचेंज4मीडिया ग्रुप के संस्थापक और एडिटर-इन-चीफ हैं.)
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