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जनसांख्यिकीय लाभांश से बोझ तक: भारत की सबसे बड़ी ताकत कैसे बन सकती है सबसे बड़ी देनदारी

जनसांख्यिकीय संपत्तियां अभी भी मौजूद हैं, लेकिन उनका मूल्य तेजी से और हर दिन घट रहा है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 month ago

विक्रम कुमार लिमसे

भारत के बहुचर्चित जनसांख्यिकीय लाभांश के जनसांख्यिकीय देनदारी में बदलने का खतरा एक तेज, समुराई जैसी तलवार के वार की तरह सामने खड़ा है, अगर एक राष्ट्र के रूप में हम सावधान नहीं रहे. वह दिन दूर नहीं है, बल्कि शायद आ भी चुका है, जब भारत को इस खतरे का सामना करना पड़ेगा. कृत्रिम बुद्धिमत्ता और ह्यूमनॉइड रोबोट उस चीज के लिए सबसे बड़ा खतरा पेश करते हैं, जिसे नीति-निर्माताओं ने लंबे समय से एक रणनीतिक संपत्ति माना है.

तकनीकी पारिस्थितिकी तंत्र इन दोनों क्षमताओं को विकसित करने के लिए पूरी ताकत से काम कर रहा है और एक ऐसी दुनिया के लिए तैयारी कर रहा है, जिसमें जनसांख्यिकीय अनुमानों के अनुसार वैश्विक आबादी के 2075 से 2085 के बीच कभी 10 अरब के शिखर पर पहुंचने के बाद उसमें गिरावट आएगी. 1960 के दशक में 5.3 से घटकर आज 2.2 रह गई वैश्विक कुल प्रजनन दर के साथ, अनुमानित जनसंख्या संकुचन अब किसी विनाशकारी अटकल से कम और गणितीय निश्चितता के अधिक करीब दिखाई देता है.

अधिकांश विकसित देश अब प्रति महिला 2.1 बच्चों की प्रतिस्थापन दर पर या उससे नीचे हैं, जिससे कामकाजी उम्र की आबादी बनाए रखने के लिए उन्हें आव्रजन पर निर्भर रहना पड़ रहा है. लेकिन विकासशील दुनिया ने भी इसी दिशा का अनुसरण किया है, कई बार चिंताजनक तेजी के साथ. दशकों तक चली एक-संतान नीति के बाद चीन की प्रजनन दर गिरकर 0.9 रह गई है, जो जापान से भी कम है. भारत में यह दर 1.9 है, जो 1970 में लगभग 6 थी और "हम दो, हमारे दो" जैसे अभियानों से इसमें गिरावट आई. पीछे मुड़कर देखने पर जल्दबाजी में बनाई गई नीतियां त्रुटिपूर्ण लगती हैं. अफ्रीका अब भी अपवाद है, जहां 1.6 अरब लोग हैं और प्रजनन दर 4 से अधिक है. बाकी हर जगह दिशा स्पष्ट है: आबादी बूढ़ी होगी और अंततः घटेगी.

इसके जवाब में दुनिया की तकनीकी शक्तियों ने अपना दांव लगा दिया है. सार्वजनिक और निजी क्षेत्र की एक ट्रिलियन डॉलर की पूंजी अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता और ह्यूमनॉइड रोबोटिक्स के लिए प्रतिबद्ध है. ये दोनों ऐसे उपकरण हैं, जिनके बारे में उन्नत अर्थव्यवस्थाओं का मानना है कि कम और अधिक उम्र के कामगारों वाली दुनिया में ये समृद्धि को बनाए रखने में मदद करेंगे. अमेरिकी तकनीक की मैग्निफिसेंट टेन - अल्फाबेट, एप्पल, अमेजन, मेटा, माइक्रोसॉफ्ट, टेस्ला, एनवीडिया, ओपनएआई और एंथ्रोपिक - अपनी-अपनी स्थिति बना चुकी हैं. चीन ने बड़े पैमाने पर संप्रभु पूंजी जुटाई है. दक्षिण कोरिया, जापान और जर्मनी अपनी महत्वाकांक्षाएं बढ़ा रहे हैं. दुनियाभर में पिछले एक दशक में ह्यूमनॉइड रोबोटिक्स के लिए 12,000 से अधिक पेटेंट दाखिल किए गए हैं. बोस्टन डायनेमिक्स के चीनी समकक्ष और यूनिट्री जैसी स्वदेशी कंपनियों ने दशकों की विनिर्माण क्षमता का लाभ उठाते हुए बढ़त बना ली है. उद्योग विश्लेषकों का अनुमान है कि 2050 तक दुनियाभर में 2 अरब ह्यूमनॉइड तैनात किए जाएंगे.

भारत के लिए सवाल यह नहीं है कि यह भविष्य आएगा या नहीं. यह आएगा. सवाल यह है कि क्या भारतीय इसे बनाने में अपनी हिस्सेदारी रखेंगे.

सॉफ्टवेयर आर्बिट्रेज का भ्रम

तीन दशकों तक भारत का तकनीकी क्षेत्र ऐसी परिस्थितियों में काम करता रहा, जो अब मौजूद नहीं हैं. जब श्रम सस्ता था और पश्चिमी कंपनियों को ऑफशोर सॉफ्टवेयर विकास की जरूरत थी, तब भारत के अंग्रेजी बोलने वाले इंजीनियर और भरोसेमंद सेवा देने वाली कंपनियां अनिवार्य बन गईं. इंफोसिस, टीसीएस, विप्रो और कॉग्निजेंट इसी आधार पर वैश्विक दिग्गज बन गईं. कुछ समय तक ऐसा लगा कि लाभांश काम कर रहा है: नौकरियां, संपत्ति और आगे बढ़ने का वादा.

लेकिन यह मॉडल बेहद तेजी से खत्म हो गया है. स्वचालन ने मात्रा आधारित सेवा कार्यों को खोखला कर दिया है. कृत्रिम बुद्धिमत्ता अब सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग के साथ वही करने की धमकी दे रही है, जो कंटेनरीकरण ने बंदरगाहों पर होने वाले काम के साथ किया था. बाजार ने इसे नोटिस किया है. विप्रो को भारत के प्रमुख इक्विटी सूचकांकों, सेंसेक्स और निफ्टी, से बाहर कर दिया गया है. यह उस कंपनी के लिए प्रतीकात्मक अपमान है, जो कभी भारत के तकनीकी गौरव का प्रतिनिधित्व करती थी. तथाकथित स्विच ब्रिगेड (टीसीएस, इंफोसिस, कॉग्निजेंट) में उसकी सहयोगी कंपनियां भी तेजी से ऐसी स्थिति में फंसती दिख रही हैं, जिसे उदारता से एक परिपक्व कारोबारी मॉडल कहा जा सकता है. जैसा कि कहा जाता है, वे एक बहुत पुराने दड़बे में व्यस्त मुर्गियों की तरह हैं.

इन कंपनियों में लाखों भारतीय काम करते हैं. जब इनमें ठहराव आता है, तो अगली पीढ़ी के अवसर तलाश रहे युवा इंजीनियर अक्सर विदेश का रुख करते हैं या कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डीप टेक पर दांव लगाने वाले स्टार्टअप की ओर मुड़ जाते हैं. वह पाइपलाइन, जो कभी भारत के जनसांख्यिकीय अधिशेष को मध्यवर्गीय समृद्धि में विश्वसनीय रूप से बदलती थी, अब अवरुद्ध हो रही है.

बुनियादी ढांचे की कमी

भारत की समस्या प्रतिभा की कमी नहीं है. देश हर साल लाखों इंजीनियरिंग स्नातक तैयार करता है. समस्या संस्थागत और बुनियादी ढांचे से जुड़ी है. यह अंतर हर साल बढ़ रहा है.

कृत्रिम बुद्धिमत्ता में अत्याधुनिक काम का बड़ा हिस्सा अब भी मूलभूत स्तरों पर केंद्रित है: सेमीकंडक्टर, चिप्स और बड़े भाषा मॉडल के प्रशिक्षण का बुनियादी ढांचा. यहां भारत लगातार पिछड़ने के बाद बराबरी की कोशिश कर रहा है, लेकिन इसके लाभ कम होते जा रहे हैं. अमेरिका और चीन का दबदबा है. भारत की अपनी पहलें, नेशनल एआई स्ट्रैटेजी और सेमीकंडक्टर मिशन, सराहनीय हैं, लेकिन अभी शुरुआती चरण में हैं. अधिकारी सही तौर पर "खोए हुए वर्षों की भरपाई करते हुए आगे बढ़ने" की बात करते हैं. फिर भी तय की जाने वाली दूरी बहुत लंबी है.

ह्यूमनॉइड रोबोटिक्स में भारत की स्थिति और भी कमजोर है. पिछले एक दशक में भारतीय संस्थाओं ने 150 से कम पेटेंट दाखिल किए हैं, जबकि चीन, जापान और अमेरिका से हजारों पेटेंट दाखिल हुए हैं. भारत ने हाल ही में इस दौड़ में प्रवेश किया है. चीनी कंपनियों को एकीकृत विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र का लाभ मिलता है, जो निर्यात आधारित औद्योगिकीकरण के 40 वर्षों में हासिल बढ़त का परिणाम है. दक्षिण कोरिया और जर्मनी के पास पीढ़ियों से विकसित गहरी मैकेनिकल इंजीनियरिंग परंपराएं हैं. भारत के पास समान स्तर पर इनमें से कोई भी लाभ नहीं है.

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत के पास न तो बोस्टन डायनेमिक्स है, न यूनिट्री और न ही स्वदेशी रूप से विकसित कोई ऐसा रोबोटिक्स चैंपियन है, जो तकनीकी मानक तय कर सके और नवाचार तथा विनिर्माण का एक सकारात्मक चक्र बना सके. जब भारत अंततः 2050 तक ह्यूमनॉइड विकसित करेगा, तो संभव है कि वे आयातित बौद्धिक संपदा पर आधारित हों.

भू-राजनीतिक बदलाव

भारत का नेतृत्व दांव पर लगे मुद्दों से अनजान नहीं रहा है. ताइवान, नीदरलैंड और जापान के साथ राजनयिक संबंधों को मजबूत करना, जो उन्नत सेमीकंडक्टर और रोबोटिक्स पारिस्थितिकी तंत्र के महत्वपूर्ण केंद्र हैं, इस बढ़ती समझ को दर्शाता है कि तकनीकी संप्रभुता ही भू-राजनीतिक संप्रभुता है. अफ्रीकी देशों, मध्य एशियाई राज्यों और ऊर्जा समृद्ध अर्थव्यवस्थाओं के साथ साझेदारी दुर्लभ पृथ्वी तत्वों और महत्वपूर्ण सामग्रियों को सुरक्षित करने की रणनीति का संकेत देती है. 500 गीगावाट का नवीकरणीय ऊर्जा लक्ष्य महत्वाकांक्षी और ठोस आधार वाला है. सेमीकंडक्टर विनिर्माण और कृत्रिम बुद्धिमत्ता को समर्थन देने वाली नीतियां आवश्यक हैं, भले ही प्रतिद्वंद्वियों की तुलना में उनमें वित्त पोषण कम हो.

फिर भी ये प्रयास ऐसी गति से आगे बढ़ रहे हैं, जो तात्कालिकता को देखते हुए धीमी लगती है. औद्योगिक स्तर पर पूंजी और प्रतिभा जुटाने की चीन की राज्य क्षमता अब भी बेजोड़ है. अमेरिका के पास असाधारण वेंचर कैपिटल, उद्यमशील संस्कृति और वैश्विक प्रतिभा तक पहुंच है. वहीं भारत का निजी क्षेत्र डीप टेक के लिए आवश्यक धैर्यपूर्ण पूंजी और बुनियादी ढांचे में निवेश करने में बहुत कम रुचि दिखाता है.

नीतिगत अनिवार्यता

अगर भारत अपने जनसांख्यिकीय प्रोफाइल को संपत्ति से देनदारी में बदलने से रोकना चाहता है, तो कई चीजें एक साथ और तेजी से करनी होंगी.

पहला, राज्य को लक्षित हस्तक्षेप के जरिए सक्रिय रूप से नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करना होगा. इसका मतलब केंद्रीय योजना नहीं, बल्कि जिसे "रणनीतिक संरचना" कहा जा सकता है. प्रमुख महानगरीय केंद्रों पर आधारित सार्वजनिक-निजी भागीदारी, रोबोटिक्स और एआई के इस्तेमाल के लिए नियामकीय सैंडबॉक्स और प्रायोगिक तकनीक में जोखिम लेने को प्रोत्साहित करने वाले तंत्र आवश्यक हैं. दक्षिण कोरिया ने ऐसे ही निर्देशित प्रयासों के जरिए सैमसंग और हुंडई का निर्माण किया. भारत ने इसरो का निर्माण किया. संस्थागत क्षमता मौजूद है.

दूसरा, निजी क्षेत्र को वास्तविक प्रतिबद्धता के साथ दीर्घकालिक अनुसंधान एवं विकास करने के लिए प्रोत्साहित करना होगा. कंपनियों को कॉरपोरेट सामाजिक जिम्मेदारी की बाध्यताओं को अनुसंधान एवं विकास खर्च के साथ मिलाने की अनुमति देना, यानी वर्तमान में सीएसआर के रूप में दान और क्रमिक नवाचार के बीच बंटी पूंजी को एकत्रित करना, अरबों डॉलर के प्रतिबद्ध निवेश को खोल सकता है. इसके लिए विधायी बदलाव की जरूरत होगी, लेकिन इससे असाधारण रिटर्न मिल सकता है.

तीसरा, भारत को तत्काल प्रभाव से अपनी शिक्षा प्रणाली को एसटीईएम विषयों की ओर मोड़ना होगा. लिबरल आर्ट्स की अपनी जगह है; लेकिन अभी वह जगह नहीं है. जब दुनिया का तकनीकी भविष्य लिखा जा रहा है, तब भारत को इंजीनियरों, भौतिकविदों, सामग्री वैज्ञानिकों और गणितज्ञों की जरूरत है. यह कोई मूल्य निर्णय नहीं है, बल्कि श्रम बाजार की वास्तविकता है.

चौथा और सबसे महत्वपूर्ण, भारत को "पकड़ बनाने" की भाषा से आगे बढ़कर "सबसे पहले निर्माण करने" की संस्कृति अपनानी होगी. इसका मतलब विफलता को स्वीकार करना, यह मानना कि कुछ मिशन सफल नहीं होंगे और स्वदेशी नवाचार के लिए जगह बनाना है, भले ही अल्पावधि में आयातित समाधान सस्ते क्यों न हों. सेमीकंडक्टर मिशन एक शुरुआत है; इसे रोबोटिक्स, उन्नत सामग्रियों और भारतीय तथा अफ्रीकी बाजारों के लिए तैयार एज एआई अनुप्रयोगों में भी दोहराने की जरूरत है.

पांचवां, सार्वजनिक विमर्श का स्वर बेहद महत्वपूर्ण है. तकनीक पर मीडिया कवरेज में नवीनता के बजाय ठोस उपलब्धियों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए. आयातित चीनी खिलौने, यानी रोबोट, से किसी नाई की दुकान का उद्घाटन सुखद खबर बन सकता है, लेकिन यह तकनीकी बुनियाद तैयार करने के कठिन काम से ध्यान भटकाता है. भारत की तकनीकी कहानी कभी-कभी बुनियादी ढांचे से अलग होकर केवल प्रचार तक सीमित रही है. इसे बदलना होगा.

सिमटती हुई खिड़की

जनसांख्यिकीय बदलाव ऐसा खतरा नहीं है, जो 2050 में आएगा. यह पहले ही आ चुका है. भारत की कामकाजी उम्र की आबादी अगले दो दशकों के भीतर घटने लगेगी. तकनीकी क्षमता, विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र और औद्योगिक दिग्गज तैयार करने की खिड़की अधिकांश लोगों की स्वीकारोक्ति से कहीं संकरी है. हर साल की देरी उन देशों के मुकाबले प्रतिस्पर्धात्मक नुकसान का एक साल है, जो पहले से ही बड़े पैमाने पर संसाधन जुटा रहे हैं.

विकल्प पर्याप्त रूप से स्पष्ट है: बड़ी कामकाजी उम्र की आबादी, लेकिन उसे उत्पादक रूप से रोजगार देने के लिए पर्याप्त आर्थिक गतिशीलता नहीं. यह कोई काल्पनिक डिस्टोपिया नहीं है; यह उन कई देशों का वास्तविक अनुभव है, जो पहले के तकनीकी बदलावों को सफलतापूर्वक पार नहीं कर पाए. इस तरह के असंतुलन के बाद पैदा होने वाली सामाजिक अस्थिरता न तो सैद्धांतिक है और न ही सुखद.

भारत का जनसांख्यिकीय लाभांश हमेशा सशर्त था. यह एक ऐसा उपहार था, जिसकी देखभाल जरूरी थी. तीन दशकों तक देश को अनुकूल परिस्थितियों का लाभ मिला: सस्ता श्रम, ऑफशोर मांग और तकनीकी पिछड़ापन, जिसने सेवा आधारित विकास के अवसर पैदा किए. वे परिस्थितियां अब समाप्त हो चुकी हैं. अब एक विकल्प बचा है: क्या भारत अगली पीढ़ी के तकनीकी बुनियादी ढांचे और विनिर्माण क्षमता का निर्माण करेगा, या फिर किनारे बैठकर दूसरे देशों को ऐसा करते देखेगा.

जनसांख्यिकीय संपत्तियां अभी भी मौजूद हैं. लेकिन उनका मूल्य हर दिन घट रहा है.

(अस्वीकरण: इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं और जरूरी नहीं कि वे प्रकाशन के विचारों को प्रतिबिंबित करते हों.)

अतिथि लेखक, विक्रम कुमार लिमसे

(लेखक रणनीति सलाहकार और हेलिकॉन कंसल्टिंग के संस्थापक एवं प्रबंध साझेदार हैं. वह @VikramLimsay नाम से ट्वीट करते हैं.)


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