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भारत के भविष्य के लिए टाटा की भूमिका इतनी महत्वपूर्ण क्यों है
जैसे-जैसे भारत विकास के अगले चरण में प्रवेश कर रहा है, टाटा यह दिखाने का एक शक्तिशाली मॉडल प्रस्तुत करता है कि भरोसा, ज्ञान और जिम्मेदारी पीढ़ियों के बीच कैसे बढ़ सकते हैं.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 11 hours ago
एक विकसित भारत को ऐसी संस्थाओं की जरूरत होगी, जिनका दृष्टिकोण चुनावी चक्र, कमाई के चक्र और उनके संस्थापकों के जीवनकाल से भी आगे तक हो. टाटा ऐसी संस्था बनाने का एक अनूठा भारतीय प्रयास है, जो आज भी कायम है.
बहुत से लोग टाटा की विरासत का जश्न मनाते हैं, लेकिन भविष्य में इसकी भूमिका को नजरअंदाज कर देते हैं. एक संस्था के रूप में इसकी विशिष्टता ही इसे भारत के लिए महत्वपूर्ण बनाती है, जिसे केवल परोपकारी सोच रखने वाली सफल कंपनियों से अधिक की जरूरत है. भारत को मजबूत निजी संस्थानों की जरूरत है.
जैसे-जैसे हमारा देश समृद्ध होता जा रहा है, यह अंतर और स्पष्ट होता जा रहा है. विकास की परिचित कहानी है- कारखाने बनाना, पूंजी आकर्षित करना, श्रमिकों को शिक्षित करना, अर्थव्यवस्था को डिजिटल बनाना, उत्पादकता बढ़ाना आदि. हालांकि, किसी मूल्य सृजक की वास्तविक संस्थागत प्रतिष्ठा कुछ सवालों के जवाबों से सामने आती है.
-कौन अगली तिमाही, साल या दशक से आगे सोचने के लिए भरोसेमंद है?
-जब कोई देख नहीं रहा हो, तब मानकों को कौन बनाए रखता है?
-कौन पीढ़ियों के बीच ज्ञान को संचित करता है?
-कौन सत्ता अपने पास रखता है, लेकिन सत्ता को साधन मानता है, लक्ष्य नहीं?
टाटा इसी आधार पर अपना महत्व अर्जित करता है. जहां पारंपरिक विवरण समूह को परोपकार के नजरिए से देखते हैं और यह वास्तव में एक उल्लेखनीय कहानी है, वहीं टाटा को केवल परोपकार तक सीमित कर देना उसकी बड़ी विरासत को नजरअंदाज करना है, जो वास्तव में संस्थागत प्रकृति की है.
जमशेदजी टाटा ने एक सदी से भी अधिक समय पहले यही बात कही थी. उन्होंने जिसे “पैबंद लगाने वाला परोपकार” कहा, उसे राष्ट्र निर्माण के गहरे कार्य से अलग करते हुए तर्क दिया था कि “जो किसी राष्ट्र या समुदाय को आगे बढ़ाता है.. वह सर्वश्रेष्ठ और सबसे प्रतिभाशाली लोगों को ऊपर उठाना है, ताकि वे देश की सबसे बड़ी सेवा कर सकें.”
जिस अर्थ में उन्होंने इसे कहा था, उस रूप में देखें तो यह लीवरेज का एक सिद्धांत बताता है. एक छात्रवृत्ति एक जीवन बदलती है, जबकि एक महान संस्था यह बदल देती है कि कोई देश क्या कर सकता है.
आधुनिक आर्थिक इतिहास का केंद्रीय सबक भी इसी तर्क से मेल खाता है. समृद्ध समाज केवल पूंजी से नहीं, बल्कि उन संस्थाओं से उभरते हैं जो पूंजी को उत्पादक बनाती हैं, जैसे विश्वविद्यालय, कानून और संपत्ति के अधिकार, जो ज्ञान और भरोसे को किसी एक जीवनकाल से आगे बढ़ने देते हैं. जब 2024 का अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार डैरोन एसमोग्लू, साइमन जॉनसन और जेम्स रॉबिन्सन को दिया गया, तो इसने इसी खोज को सम्मानित किया- कि समृद्धि उन संस्थाओं के बाद आती है, जिन्हें कोई समाज बनाता है.
टाटा संस्थागत पूंजी का एक अनूठा भारतीय उदाहरण है. जमशेदजी केवल संपत्ति से अधिक चाहते थे, क्योंकि औद्योगीकरण के लिए उन क्षमताओं की जरूरत थी जिनकी भारत में कमी थी और उनकी महत्वाकांक्षाएं इस्पात और बिजली से लेकर विज्ञान और शिक्षा तक फैली हुई थीं. अनुसंधान के लिए उनके दृष्टिकोण ने इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया, जबकि बाद की पीढ़ियों में ट्रस्टों ने TISS, TIFR और टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल के निर्माण में मदद की. संपत्ति ऐसी संस्थाओं में बदल गई, जो ज्ञान और सार्वजनिक क्षमता का निर्माण करती हैं.
यह केवल संचय से अलग पूंजीवाद की एक अलग अवधारणा है. एक अस्पताल मरीजों का इलाज करता है, जबकि एक शोध संस्थान यह बदल देता है कि पूरा देश क्या खोज सकता है. टाटा की कहानी क्षमता के लगातार बढ़ने की कहानी है.
टाटा का विशिष्ट कदम संस्थागत चरित्र को ही एक आर्थिक संपत्ति बनाना रहा है. टाटा कंपनियां टाटा नाम का उपयोग करने के लिए रॉयल्टी देती हैं. दूसरे शब्दों में, भरोसा इनवॉइस पर दर्ज है. संस्थापक ने इसी विचार को सरल शब्दों में रखा था. “एक मुक्त उद्यम में, समुदाय व्यवसाय में केवल एक अन्य हितधारक नहीं है, बल्कि वास्तव में उसके अस्तित्व का मूल उद्देश्य है.”
इन शब्दों को कॉरपोरेट दीवार पर लिखे किसी संदेश की तरह देखना आसान है. असली परीक्षा तब होती है, जब ऐसे सिद्धांत महंगे साबित होते हैं. किसी संस्था का उद्देश्य यही है कि उसे चलाने वाले व्यक्ति के स्वभाव से वह आगे तक कायम रहे, चाहे कुर्सी पर कोई भी बैठा हो और मेज के आसपास कोई भी मौजूद हो.
ट्रस्ट की संरचना इस जिम्मेदारी को सोच-समझकर निभाने के लिए मौजूद है. स्थायी सिद्धांत तभी कायम रहते हैं, जब हर पीढ़ी उन्हें संहिताबद्ध करने, उनकी रक्षा करने और उनकी कीमत वहन करने का विकल्प चुनती है. यह अनुशासन महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारत विकास के ऐसे चरण में प्रवेश कर रहा है, जहां संस्थाओं का महत्व और बढ़ जाता है.
एक गरीब राष्ट्र कभी-कभी असाधारण रूप से सदाचारी व्यक्तियों के जरिए कमजोर संस्थाओं की कमी को पूरा कर सकता है. 1.4 अरब लोगों वाला देश, जहां अनगिनत महत्वपूर्ण फैसले लिए जाते हैं, उसे मजबूत संस्थाओं पर निर्भर रहना होगा.
भारत को ऐसी कंपनियों की जरूरत होगी जो दशकों और सदियों के बारे में सोचें, ऐसे विश्वविद्यालयों की जरूरत होगी जो पीढ़ियों के बारे में सोचें और ऐसे सार्वजनिक निकायों की जरूरत होगी जो मौजूदा सरकार से आगे की सोच रखें.
कोई समाज तब महान बनता है जब उसके बुजुर्ग ऐसे पेड़ लगाते हैं, जिनकी छाया में बाद की पीढ़ियां आराम कर सकें. टाटा अकेले इसका एक हिस्सा उपलब्ध करा सकता है, लेकिन वह एक कंपनी है, राज्य का विकल्प नहीं. वह जो कर सकता है, वह यह दिखाना है कि भारतीय पूंजीवाद क्या बन सकता है- ऐसा उद्यम जो धन के साथ-साथ पीढ़ियों के बीच भरोसा, ज्ञान, मानक और जिम्मेदारी भी संचित करता है.
एडमंड बर्क ने समाज को उन लोगों के बीच साझेदारी के रूप में परिभाषित किया था जो जीवित हैं, जो मर चुके हैं और जो पैदा होने वाले हैं. यही विकसित देशों की वास्तविक विरासत है. उनकी संस्थाओं का उपयोगी जीवन उन लोगों के जीवनकाल से अधिक होता है, जिन्होंने उन्हें बनाया.
भारत का अगला परिवर्तन संस्थागत मजबूती के आधार पर निर्मित होगा. टाटा का सबसे गहरा मूल्य भारत द्वारा संस्थाओं के निर्माण के एक उदाहरण के रूप में है. इनमें टाटा सबसे पुराना, सबसे अधिक निगरानी में रहने वाला और सबसे अधिक प्रशंसित संस्थान है.
अतिथि लेखक: शुभ्रांशु सिंह
(शुभ्रांशु सिंह एक बिजनेस लीडर, सांस्कृतिक रणनीतिकार और स्तंभकार हैं. उन्हें फोर्ब्स द्वारा 2025 के लिए दुनिया के 50 सबसे प्रभावशाली ग्लोबल CMO में से एक के रूप में सम्मानित किया गया है. वह Effie LIONS Foundation के बोर्ड में APAC प्रतिनिधि के रूप में कार्य करते हैं.)
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