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भारत @ 80: उपलब्धियों की लंबी छलांग, अधूरी चुनौतियां और विकसित भारत 2047 की राह
लेखक डॉ. ब्रजेश कुमार तिवारी कहते हैं, अब भारत के सामने सवाल बदल चुका है. सवाल केवल यह नहीं रह गया है कि देश विकास कर सकता है या नहीं, बल्कि यह है कि क्या विकास संतुलित, उत्पादक, समावेशी और मानवीय बन सकता है.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 hour ago
जब भारत 1947 में आजाद हुआ था, तब उसके सामने गरीबी, अशिक्षा, कमजोर औद्योगिक क्षमता, खराब स्वास्थ्य संकेतक और अपर्याप्त बुनियादी ढांचे जैसी गंभीर चुनौतियां थीं. आठ दशक बाद देश ने एक असाधारण सफर तय किया है. भारत ने लोकतंत्र को मजबूत बनाए रखा, खाद्य सुरक्षा हासिल की, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार किया, तकनीकी क्षमताएं विकसित कीं और दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में अपनी जगह बनाई.
अब भारत के सामने सवाल बदल चुका है. सवाल केवल यह नहीं रह गया है कि देश विकास कर सकता है या नहीं, बल्कि यह है कि क्या विकास संतुलित, उत्पादक, समावेशी और मानवीय बन सकता है. विकसित भारत 2047 को केवल सकल घरेलू उत्पाद से परिभाषित नहीं किया जा सकता. एक विकसित भारत में समृद्धि के साथ अवसर, तकनीक के साथ रोजगार, शिक्षा के साथ मूल्य, बुनियादी ढांचे के साथ जीवन की गुणवत्ता और अधिकारों के साथ जिम्मेदारी का संतुलन होना चाहिए.
आठवें दशक की आजादी की यात्रा में भारत के सामने आठ प्रमुख चुनौतियां विशेष ध्यान देने योग्य हैं.
1. विकास और संतुलन: हर क्षेत्र तक पहुंचना चाहिए विकास
1947 में भारत मुख्य रूप से कृषि प्रधान, गरीब और औद्योगिक रूप से कमजोर देश था. आज यह दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है और 2025-26 में वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि 7.6 प्रतिशत रही. बहुआयामी गरीबी भी 2013-14 के 29.17 प्रतिशत से घटकर 2022-23 में 11.28 प्रतिशत रह गई.
हालांकि, राष्ट्रीय औसत राज्यों, जिलों, शहरों और गांवों के बीच मौजूद बड़े अंतर को छिपा देते हैं. इसलिए भारत की अगली चुनौती केवल तेज विकास नहीं, बल्कि अधिक संतुलित विकास है. किसी नागरिक की शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, डिजिटल कनेक्टिविटी, बाजार और रोजगार तक पहुंच उसके जन्मस्थान पर अत्यधिक निर्भर नहीं होनी चाहिए.
पिछड़े जिलों में मानव संसाधन, स्थानीय बुनियादी ढांचे, कृषि और छोटे उद्यमों में अधिक निवेश की जरूरत है. राज्यों को मापने योग्य परिणामों के आधार पर प्रोत्साहन मिलना चाहिए, शहरी स्थानीय निकायों की वित्तीय स्थिति मजबूत होनी चाहिए और ग्रामीण क्षेत्रों को बाजारों से बेहतर तरीके से जोड़ा जाना चाहिए. वर्ष 2047 तक समृद्धि कुछ महानगरों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए. विकास पूरे देश का अनुभव बनना चाहिए.
2. रोजगार और कौशल: जनसंख्या को उत्पादक पूंजी में बदलना
भारत की युवा आबादी उसकी सबसे बड़ी आर्थिक ताकत बन सकती है, लेकिन इसके लिए शिक्षा को रोजगार से सार्थक रूप से जोड़ना होगा. महिलाओं की श्रम बल भागीदारी 2017-18 में करीब 21 प्रतिशत से बढ़कर 2023-24 में 35 प्रतिशत से अधिक हो गई है, लेकिन अभी भी बड़े अंतर मौजूद हैं.
एक गहरी चिंता औपचारिक कौशल प्रशिक्षण की सीमित पहुंच है. भारत को धीरे-धीरे डिग्री केंद्रित रोजगार संस्कृति से क्षमता केंद्रित अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ना होगा. व्यावसायिक शिक्षा की शुरुआत स्कूलों से होनी चाहिए, अप्रेंटिसशिप को उद्योगों से मजबूती से जोड़ना होगा और जिलों को स्थानीय स्तर पर आवश्यक कौशल की पहचान करनी चाहिए.
सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों को रोजगार सृजन का प्रमुख केंद्र बनना चाहिए. वहीं, उद्यमिता को अंतिम विकल्प के बजाय मुख्यधारा के करियर विकल्प के रूप में देखा जाना चाहिए. भारत को रोजगार की गुणवत्ता पर भी ध्यान देना होगा. वर्ष 2047 तक रोजगार का आकलन केवल संख्या के आधार पर नहीं, बल्कि उत्पादकता, आय, सम्मान और सामाजिक सुरक्षा के आधार पर होना चाहिए.
3. निवेश और तकनीक: भारत को बनना होगा सृजनकर्ता
स्वतंत्र भारत ने शुरुआत में सार्वजनिक निवेश के जरिए अपना औद्योगिक आधार तैयार किया. बाद में आर्थिक सुधारों ने निजी पूंजी, विदेशी निवेश और उद्यमिता को विस्तार दिया. आज भारत को डिजिटल भुगतान, फार्मास्युटिकल्स, सॉफ्टवेयर, अंतरिक्ष और स्टार्टअप के क्षेत्र में वैश्विक पहचान मिली है.
वैश्विक नवाचार सूचकांक में भारत की रैंकिंग 2019 में 66वीं थी, जो 2025 में सुधरकर 38वीं हो गई. लेकिन अगला चरण अधिक कठिन होगा. सेमीकंडक्टर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, उन्नत विनिर्माण, जैव प्रौद्योगिकी, स्वच्छ ऊर्जा और ऊर्जा भंडारण के क्षेत्रों में भारत की तकनीकी क्षमता की असली परीक्षा होगी.
भारत केवल नई तकनीकों का बड़ा उपभोक्ता बनकर नहीं रह सकता. उसे एक प्रमुख सृजनकर्ता बनना होगा. इसके लिए अनुसंधान और विकास में निजी निवेश बढ़ाना होगा, विश्वविद्यालयों और उद्योगों के बीच सहयोग मजबूत करना होगा, पेटेंट को उत्पादों में बदलने की क्षमता विकसित करनी होगी और घरेलू जोखिम पूंजी को बढ़ाना होगा.
विदेशी निवेश का आकलन केवल पूंजी के आधार पर नहीं, बल्कि तकनीक हस्तांतरण, स्थानीय आपूर्ति श्रृंखला और रोजगार सृजन के आधार पर भी किया जाना चाहिए. वर्ष 2047 तक निवेश नीति का उद्देश्य केवल पूंजी आकर्षित करना नहीं, बल्कि राष्ट्रीय क्षमताओं का निर्माण होना चाहिए.
4. शिक्षा और मूल्य: साक्षरता से क्षमता तक
भारत ने 1951 में केवल 18.3 प्रतिशत की साक्षरता दर के साथ अपनी यात्रा शुरू की थी. इसके बाद देश ने दुनिया की सबसे बड़ी शिक्षा व्यवस्थाओं में से एक का निर्माण किया. शिक्षा तक पहुंच में भारी विस्तार हुआ है, लेकिन अब सबसे बड़ी चुनौती गुणवत्ता है.
हाल के आंकड़ों के अनुसार, माध्यमिक स्तर पर सकल नामांकन अनुपात करीब 78.7 प्रतिशत और उच्च माध्यमिक स्तर पर 58.4 प्रतिशत है. बड़ी संख्या में छात्र स्कूल शिक्षा के अंतिम वर्षों तक नहीं पहुंच पाते. इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि केवल नामांकन सीखने का विकल्प नहीं हो सकता.
एक विकसित भारत को ऐसी शिक्षा की जरूरत है, जो भाषा, गणित, विज्ञान, तकनीक, आलोचनात्मक सोच और रोजगार क्षमता को विकसित करे. साथ ही ईमानदारी, संवैधानिक मूल्य, सहानुभूति और नागरिक जिम्मेदारी को भी बढ़ावा दे.
शिक्षकों का प्रशिक्षण बेहतर होना चाहिए, बुनियादी स्तर की शिक्षा पर अधिक ध्यान देना होगा, शोध संस्कृति को मजबूत करना होगा और डिजिटल संसाधनों तक समान पहुंच सुनिश्चित करनी होगी. विश्वविद्यालयों को भी अधिक अकादमिक स्वतंत्रता की आवश्यकता है. वर्ष 2047 तक भारत का लक्ष्य केवल डिग्रीधारी तैयार करना नहीं, बल्कि सक्षम और जिम्मेदार नागरिक तैयार करना होना चाहिए.
5. स्वास्थ्य सेवा: इलाज से स्वास्थ्य सुरक्षा तक
आजादी के समय भारत में औसत जीवन प्रत्याशा केवल 32 से 33 वर्ष के आसपास थी. टीकाकरण, स्वच्छता, पोषण, चिकित्सा और सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार से लोगों की औसत आयु में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है.
चिकित्सा ढांचे का भी विस्तार हुआ है. 2014 में देश में मेडिकल कॉलेजों की संख्या 387 थी, जो 2026 में बढ़कर 800 से अधिक हो गई है.
इसके बावजूद स्वास्थ्य सेवाओं की लागत और पहुंच बड़ी चुनौती बनी हुई है. वर्ष 2022-23 के राष्ट्रीय स्वास्थ्य लेखा के आंकड़ों के अनुसार, सरकारी स्वास्थ्य खर्च सकल घरेलू उत्पाद का करीब 1.43 प्रतिशत था, जबकि अपनी जेब से किया जाने वाला खर्च कुल स्वास्थ्य व्यय का 43.4 प्रतिशत रहा.
भारत को केवल अस्पताल केंद्रित व्यवस्था से आगे बढ़कर प्राथमिक और निवारक स्वास्थ्य सेवाओं में अधिक निवेश करना होगा. जिलों को विशेषज्ञ डॉक्टर, नर्स, जांच सुविधाएं, सस्ती दवाएं और भरोसेमंद सरकारी अस्पतालों की जरूरत है. मानसिक स्वास्थ्य, बुजुर्गों की देखभाल और गैर-संचारी बीमारियों पर भी अधिक ध्यान देना होगा.
वर्ष 2047 तक बीमारी किसी परिवार को आर्थिक संकट में नहीं धकेलनी चाहिए. स्वास्थ्य सेवा को मानव क्षमता में निवेश के रूप में देखा जाना चाहिए.
6. बुनियादी ढांचा और सार्वजनिक सेवाएं: मात्रा से गुणवत्ता तक
भारत कभी सड़कों, बिजली, रेलवे, सिंचाई, आवास और संचार सुविधाओं की भारी कमी से जूझता था. आज इसमें व्यापक बदलाव आया है. मार्च 2026 तक राष्ट्रीय राजमार्ग नेटवर्क 2014 के 91,287 किलोमीटर से बढ़कर करीब 1,46,572 किलोमीटर हो गया.
ब्रॉड गेज रेलवे नेटवर्क का 99 प्रतिशत से अधिक हिस्सा विद्युतीकृत हो चुका है. हवाई अड्डों और डिजिटल कनेक्टिविटी का भी तेजी से विस्तार हुआ है. हालांकि, अगली चुनौती केवल और अधिक निर्माण करने की नहीं है. बुनियादी ढांचे का आकलन उसकी विश्वसनीयता, सुरक्षा, रखरखाव, सामर्थ्य और नागरिकों के समय की बचत के आधार पर होना चाहिए.
शहरों को बेहतर सार्वजनिक परिवहन, जल निकासी, स्वच्छ हवा, जल व्यवस्था और किफायती आवास चाहिए. ग्रामीण भारत को अंतिम छोर तक मजबूत कनेक्टिविटी, भरोसेमंद बिजली, भंडारण सुविधाएं और उच्च गुणवत्ता वाले इंटरनेट की जरूरत है.
नए निर्माण जितना ही ध्यान रखरखाव पर भी दिया जाना चाहिए. वर्ष 2047 तक बुनियादी ढांचा कारोबार की लागत कम करने, आम जीवन को बेहतर बनाने और पर्यावरणीय नुकसान को न्यूनतम करने वाला होना चाहिए.
7. समाज और जिम्मेदारी: अधिकारों के साथ कर्तव्य भी जरूरी
भारत की लोकतांत्रिक उपलब्धि उल्लेखनीय है. संविधान विशाल सामाजिक, भाषाई और धार्मिक विविधता के बीच समान नागरिकता, मौलिक अधिकार और राजनीतिक भागीदारी की गारंटी देता है. लेकिन विकसित समाज केवल सरकारों से नहीं बनते. उनकी मजबूती नागरिकों पर भी निर्भर करती है. कर अनुपालन, यातायात अनुशासन, स्वच्छता, जल संरक्षण, सार्वजनिक संपत्ति का सम्मान, महिलाओं के प्रति सम्मान और कमजोर वर्गों की देखभाल, ये सभी विकास का हिस्सा हैं.
भारत के अगले चरण में अधिकारों और जिम्मेदारियों के बीच संतुलन स्थापित करना होगा. स्कूलों और विश्वविद्यालयों में नागरिक शिक्षा को सार्थक बनाना चाहिए, समुदायों को सार्वजनिक संपत्तियों के रखरखाव में भागीदार बनाना चाहिए और स्वैच्छिक सेवा को अधिक मान्यता मिलनी चाहिए.
डिजिटल युग में बिना सत्यापन के गलत सूचना को आगे न बढ़ाना भी नागरिक जिम्मेदारी है. वर्ष 2047 तक भारतीयों को केवल यह नहीं पूछना चाहिए कि राज्य उनके लिए क्या करेगा, बल्कि यह भी सोचना चाहिए कि वे समाज के लिए क्या कर सकते हैं.
8. न्याय और सहिष्णुता: विकास की अंतिम परीक्षा
भारत ने न्यायिक स्वतंत्रता, मौलिक अधिकारों और कानून के शासन पर आधारित एक मजबूत संवैधानिक ढांचा तैयार किया है. लेकिन मामलों में देरी आज भी न्याय तक पहुंच को कमजोर करती है.
वर्ष 2026 की शुरुआत में सुप्रीम कोर्ट, हाईकोर्ट और जिला अदालतों में करीब 5.46 करोड़ मामले लंबित थे. न्याय केवल सही फैसला नहीं है, बल्कि उचित समय के भीतर दिया गया फैसला भी है.
भारत को तेज न्यायिक नियुक्तियों, बेहतर अदालत प्रशासन, तकनीक के व्यापक उपयोग और मध्यस्थता तथा वैकल्पिक विवाद समाधान पर अधिक भरोसा करने की जरूरत है.
सहिष्णुता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है. जिस समाज में असहमति धीरे-धीरे दुश्मनी में बदल जाती है, वह तर्कसंगत तरीके से समस्याओं को सुलझाने की अपनी क्षमता खो देता है.
भारत की विविधता के लिए ऐसी संस्कृति जरूरी है, जहां लोग अलग विचार रख सकें, बिना एक-दूसरे का दुश्मन बने. वर्ष 2047 तक एक विकसित भारत को कानून के समक्ष समानता, सस्ता और समय पर न्याय तथा यह भरोसा सुनिश्चित करना होगा कि अलग-अलग विचार एक साझा संवैधानिक ढांचे के भीतर साथ रह सकते हैं.
वर्ष 2047 की राह
आजादी के बाद से भारत की प्रगति असाधारण रही है, लेकिन अगले दो दशकों का आकलन विस्तार से अधिक गुणवत्ता के आधार पर किया जाएगा.
सड़कें सुरक्षित होनी चाहिए, स्कूलों में वास्तविक सीख सुनिश्चित होनी चाहिए, अस्पताल किफायती बने रहने चाहिए, आर्थिक विकास से उत्पादक रोजगार पैदा होने चाहिए और तकनीक का केवल भारत में उपभोग नहीं, बल्कि तेजी से भारत में निर्माण भी होना चाहिए.
नागरिकों को अधिकारों का उपयोग करते हुए अपनी जिम्मेदारियों को भी स्वीकार करना होगा और अदालतों को उचित समय के भीतर न्याय देना होगा.
इसलिए विकसित भारत 2047 की सबसे सार्थक परिभाषा शायद बहुत सरल है. ऐसा भारत, जहां किसी व्यक्ति के अवसर उसके जन्मस्थान, लिंग, आय या सामाजिक पृष्ठभूमि से तय न हों, बल्कि उसकी क्षमता, प्रयास और आकांक्षाओं से अधिक निर्धारित हों.
यही आजादी का अधूरा एजेंडा है. भारत के आठवें दशक को केवल उस दौर के रूप में याद नहीं किया जाना चाहिए, जब देश अधिक समृद्ध हुआ. इसे उस दौर के रूप में याद किया जाना चाहिए, जब आर्थिक प्रगति को मानव क्षमता, संस्थागत गुणवत्ता और समान अवसरों में बदला गया.
(डिस्क्लेमर: इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं और जरूरी नहीं कि वे प्रकाशन के विचारों को प्रतिबिंबित करते हों.)
अतिथि लेखक: डॉ. ब्रजेश कुमार तिवारी, एसोसिएट प्रोफेसर, अटल स्कूल ऑफ मैनेजमेंट (ABVSME), जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली
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