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भारत की सबसे युवा पीढ़ी के प्रति हमारी सामाजिक जिम्मेदारी
पहली नौकरी के विरोधाभास से लेकर AI साक्षरता और लोकतांत्रिक असहमति की सेहत तक, Gen Z को भारत के भविष्य में भागीदार के रूप में देखने का तर्क, न कि एक ऐसी समस्या के रूप में जिसे संभालने की जरूरत है
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 hour ago
जिस तरह से हमने जेनरेशन Z के बारे में बात करना शुरू किया है, उसमें कुछ बेहद परेशान करने वाली बात है. जिस पीढ़ी को कल की उम्मीद के रूप में देखा जाना चाहिए, उस पर आज एक ऐसी समस्या के रूप में चर्चा की जा रही है, जिसे संभालने की जरूरत है. हम उन्हें अधीर, बेचैन, मांग करने वाला और उन नियमों को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं मानते, जिन्हें पिछली पीढ़ियों ने बिना सवाल किए स्वीकार कर लिया था. लेकिन शायद हम गलत सवाल पूछ रहे हैं. सवाल यह नहीं है कि Gen Z में क्या गलत है, बल्कि यह है कि जिस दुनिया में उसने कदम रखा है, उसके साथ क्या हुआ है. यह समाज, प्रौद्योगिकी, अर्थव्यवस्था और मानवीय अपेक्षाओं के स्तर पर सामने आ रहा एक वैश्विक बदलाव है.
Gen Z एक ऐसी दुनिया में बड़ा हुआ है, जहां पुराना वादा, कड़ी मेहनत से पढ़ाई करो, डिग्री हासिल करो और एक सुरक्षित जीवन बनाओ, अब पहले की तरह निश्चित नहीं रह गया है. AI काम की प्रकृति को बदल रहा है, ऑटोमेशन उद्योगों को बदल रहा है और सोशल मीडिया ने पूरी दुनिया को एक स्क्रीन पर ला दिया है. एक छोटे शहर में रहने वाला युवा कुछ ही सेकंड में देख सकता है कि उससे दूर कोई अन्य व्यक्ति कैसे पढ़ाई कर रहा है या कमाई कर रहा है और यह भी देख सकता है कि समाज जो वादा करता है और वास्तव में जो देता है, उसके बीच कितना अंतर है. जो अधीरता दिखती है, वह शायद जागरूकता हो सकती है. जो विद्रोह नजर आता है, वह शायद उन व्यवस्थाओं से निराशा हो सकती है, जो समय के साथ कदम नहीं मिला पाई हैं. Gen Z ने ये परिस्थितियां पैदा नहीं कीं. उन्हें ये विरासत में मिली हैं. इससे पहले कि हम पूछें कि Gen Z को कैसे संभाला जाए, हमें यह पूछना चाहिए कि क्या हमारी सरकारें, व्यवसाय, संस्थान और परिवार उन्हें उस दुनिया के लिए तैयार करने को तैयार हैं, जो उन्हें विरासत में मिलने वाली है.
भारत और जनसांख्यिकीय सवाल
भारत इस बदलाव के सबसे महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है. हम अपने जनसांख्यिकीय लाभांश पर गर्व से बात करते हैं, लेकिन बड़ी युवा आबादी अपने आप में जनसांख्यिकीय लाभांश नहीं बन जाती. युवा तभी संपत्ति बनते हैं, जब उनके पास शिक्षा, कौशल, स्वास्थ्य, रोजगार और भागीदारी का आत्मविश्वास हो अन्यथा यही ताकत निराशा में बदल सकती है. शिक्षा को डिग्रियों से क्षमताओं की ओर, रटने से व्यावहारिक उपयोग की ओर और एक बार की पढ़ाई से आजीवन सीखने की ओर बढ़ना चाहिए. कौशल विकास का आकलन बांटे गए प्रमाणपत्रों के आधार पर नहीं, बल्कि उसके बाद होने वाले परिणामों से किया जाना चाहिए, क्या युवा को रोजगार मिला, क्या उसकी आय बढ़ी. इसके लिए प्रशिक्षण की संख्या से वास्तविक रोजगार परिणामों की ओर बदलाव जरूरी है.
पहली नौकरी के विरोधाभास का भी समाधान किया जाना चाहिए: नियोक्ता ऐसे अनुभव की मांग करते हैं, जिसे युवा बिना अवसर पाए हासिल ही नहीं कर सकते. सरकार और उद्योग एक मजबूत अप्रेंटिसशिप इकोनॉमी के जरिए इस समस्या का समाधान कर सकते हैं. AI साक्षरता को डिजिटल साक्षरता की तरह ही बुनियादी बनाया जाना चाहिए, ताकि यह केवल प्रतिष्ठित संस्थानों तक सीमित विशेषाधिकार न रह जाए. भारत की मैन्युफैक्चरिंग महत्वाकांक्षाओं को उसकी शिक्षा रणनीति से जोड़ा जाना चाहिए. देश को सिर्फ कारखाने ही नहीं बनाने हैं, बल्कि उन्हें चलाने के लिए मानव क्षमताएं भी विकसित करनी हैं. अवसरों को बड़े महानगरों से आगे भी बढ़ना चाहिए, ताकि छोटे शहर का कोई युवा यह न माने कि घर छोड़ना ही सफलता का एकमात्र रास्ता है.
अगली पीढ़ी के प्रति संस्थानों की जिम्मेदारी
सरकार यह जिम्मेदारी अकेले नहीं निभा सकती. व्यवसायों को कुशल कर्मचारियों की कमी की शिकायत करना बंद करना चाहिए, जबकि वे विश्वविद्यालयों या सरकार के उन्हें तैयार करने का इंतजार कर रहे हों. कंपनियों को प्रतिभा विकसित करने में भागीदार बनना चाहिए, जो कंपनी अपने लोगों की क्षमता में निवेश करती है, वह अपनी भविष्य की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता का निर्माण कर रही होती है. एक युवा व्यक्ति नियोक्ता से जो सबसे महत्वपूर्ण सवाल तेजी से पूछ सकता है, वह शायद यह नहीं होगा कि "आप मुझे कितना वेतन देंगे?", बल्कि यह होगा कि "अगर मैं आपके साथ काम करूं तो मैं क्या बन सकता हूं?"
विश्वविद्यालयों को द्वीपों के बजाय पुल बनना चाहिए. व्यावहारिक क्षमता के बिना डिग्री तेजी से अपर्याप्त होती जाएगी. सफलता का आकलन केवल परीक्षा परिणामों से नहीं, बल्कि रोजगार क्षमता से किया जाना चाहिए. परिवारों की भी भूमिका है. कई माता-पिता इस सोच के साथ बड़े हुए कि सुरक्षा का मतलब एक स्थिर पेशा है. उनके बच्चे ऐसी दुनिया में प्रवेश कर रहे हैं, जहां करियर कई बार बदल सकता है और अनुकूलन क्षमता ही सुरक्षा का सबसे बड़ा रूप हो सकती है. एक युवा को घर में यह कहने के लिए सुरक्षित जगह मिलनी चाहिए कि "मैं असफल हो गया" या "मैं उलझन में हूं." समाज को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि युवा महिलाओं को केवल शिक्षित करने के बाद उन्हें अवसरों से बाहर न कर दिया जाए. एक राष्ट्रीय Gen Z ह्यूमन कैपिटल मिशन सरकार, उद्योग और नागरिक समाज को मापने योग्य लक्ष्यों के साथ एकजुट कर सकता है, जहां डेटा नीति और वास्तविकता के बीच पुल का काम करे.
इस समझौते का दूसरा पक्ष
हालांकि, इस सामाजिक समझौते का एक दूसरा पक्ष भी है और वह स्वयं Gen Z से जुड़ा है: कोई समाज संस्थानों से अवसर पैदा करने की उम्मीद करते हुए उस पीढ़ी से कुछ भी अपेक्षा नहीं कर सकता, जिसे वे अवसर मिल रहे हैं. कोई युवा जो सरकार से सवाल करता है या शांतिपूर्ण विरोध करता है, वह अपने आप लोकतंत्र के लिए खतरा नहीं बन जाता, सवाल करने की क्षमता इस बात का संकेत हो सकती है कि लोकतंत्र जीवित है. लेकिन इसकी सेहत इस बात पर निर्भर करती है कि सवाल के बाद क्या होता है. एक हैशटैग ध्यान आकर्षित कर सकता है, लेकिन स्थायी बदलाव के लिए ज्ञान, साक्ष्य, नीति और धैर्य की जरूरत होती है. Gen Z को आवाज से जिम्मेदारी की ओर, दर्शक से नागरिक की ओर और आखिरकार संरक्षक की भूमिका की ओर बढ़ना होगा. सरकारों को वैध और शांतिपूर्ण माध्यम बनाने चाहिए, जिनके जरिए युवाओं की असंतुष्टि भागीदारी और सुधार में बदल सके. राजनीतिक दलों को भी उस निराशा का ध्रुवीकरण के लिए इस्तेमाल करने से बचना चाहिए, एक निराश युवा किसी की राजनीतिक संपत्ति नहीं है. यह समझौता पारस्परिक होना चाहिए: समाज Gen Z को अवसर और आवाज देने का ऋणी है. वहीं, Gen Z समाज के प्रति भागीदारी और निर्माण की इच्छा का जिम्मेदार है.
सीखो, काम करो, कमाओ, बनाओ, नेतृत्व करो
इसलिए शायद सबसे बड़ा खतरा एक गुस्सैल पीढ़ी नहीं है. असली खतरा वह पीढ़ी है, जो विश्वास करना बंद कर देती है. जो युवा विरोध करता है, वह अब भी मानता है कि बदलाव संभव है. लेकिन जो चुपचाप कहता है कि "कुछ भी कभी नहीं बदलेगा", वह पहले ही पीछे हटना शुरू कर चुका है, निराशा निंदकता में बदलती है, निंदकता उदासीनता में और उदासीनता संस्थानों से पूरी तरह विश्वास खत्म होने में बदल सकती है. यही कारण है कि असली चुनौती Gen Z को नियंत्रित करना नहीं, बल्कि प्रयास और अवसर के बीच संबंध को फिर से स्थापित करना है. इसका जवाब शायद पांच शब्दों में दिया जा सकता है: सीखो, काम करो, कमाओ, बनाओ, नेतृत्व करो.
Gen Z कोई ऐसी जिम्मेदारी नहीं है, जिसे संभाले जाने का इंतजार हो. असली जिम्मेदारी वह समाज है, जो अपने युवाओं को विकसित करने में विफल रहता है. Gen Z को कैसे संभालना है, यह पूछने के बजाय हमें पूछना चाहिए कि उन्हें कैसे तैयार किया जाए. युवाओं को लाभार्थी मानने के बजाय हमें उन्हें भागीदार के रूप में देखना चाहिए. शांति का मतलब विरोध का अभाव नहीं है. शांति का मतलब यह भरोसा है कि आने वाला कल एक निष्पक्ष अवसर देगा. अगर सरकारें वह अवसर उपलब्ध कराती हैं और Gen Z स्वतंत्रता के साथ आने वाली जिम्मेदारी को स्वीकार करता है, तो यह पीढ़ी दुनिया के लिए समस्या नहीं बनेगी बल्कि यह दुनिया को मिली सबसे बड़ी संपत्तियों में से एक बन सकती है. हम केवल Gen Z के लिए भविष्य तैयार नहीं कर रहे हैं. हम Gen Z को हम सभी के लिए भविष्य संभालने के लिए तैयार कर रहे हैं.
(StartupUI की ग्रोथ एंड बिजनेस डेवलपमेंट टीम के सिद्धांत बंसल द्वारा शोध)
अतिथि लेखक: शशि भूषण दुबे, फाउंडर चेयरमैन, द इंडियन स्कूल ऑफ नेचुरल एंड स्पिरिचुअल साइंसेज
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