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अगला केरल मॉडल: गरिमा के साथ बढ़ती उम्र

डॉ. प्रो. सुधा चंद्रशेखर के अनुसार, जैसे-जैसे केरल भारत के सबसे अधिक दीर्घायु समाजों में से एक बनता गया, वैसे-वैसे यह उन शुरुआती राज्यों में भी शामिल हो गया, जिन्हें उस सवाल का सामना करना पड़ा जिसका सामना आने वाले वर्षों में कई अन्य राज्यों को भी करना होगा: जब हर 5 में से 1 व्यक्ति की उम्र 60 वर्ष से अधिक हो, तो ऐसा समाज कैसा होना चाहिए?

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 months ago

दशकों तक केरल ने विकास को जीवन प्रत्याशा, साक्षरता और सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार के आधार पर मापा. इन निवेशों का उल्लेखनीय लाभ मिला है. लोग पहले से कहीं अधिक लंबा जीवन जी रहे हैं. लेकिन केवल लंबी उम्र ही अंतिम लक्ष्य नहीं है. वास्तविक प्रगति का पैमाना यह है कि क्या जीवन के ये अतिरिक्त वर्ष अच्छे स्वास्थ्य, आत्मनिर्भरता, वित्तीय सुरक्षा और उद्देश्यपूर्ण जीवन के साथ बिताए जा रहे हैं.

केरल ने कभी भारत को दिखाया था कि स्वास्थ्य और शिक्षा में निवेश किस तरह मानव विकास को बदल सकता है. अब उसके पास देश के अगले विकास मॉडल को परिभाषित करने का अवसर है, एक ऐसा मॉडल, जिसका केंद्र स्वस्थ वृद्धावस्था और दीर्घायु हो. अब जनसंख्या की बढ़ती उम्र को केवल कल्याण के मुद्दे के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए. यह केरल के सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक और सामाजिक बदलावों में से एक बनती जा रही है.

बढ़ती उम्र पर होने वाली चर्चा अक्सर पेंशन, अस्पतालों और वृद्धाश्रमों तक सीमित रहती है. हालांकि ये सभी महत्वपूर्ण हैं, लेकिन ये पूरी तस्वीर का केवल एक हिस्सा हैं. आज के वरिष्ठ नागरिक पिछली पीढ़ियों की तुलना में अधिक स्वस्थ, अधिक शिक्षित और अधिक सक्रिय हैं. उनमें से कई काम जारी रखना, मार्गदर्शन देना, स्वयंसेवा करना, यात्रा करना और अपने समुदायों में योगदान देना चाहते हैं. वहीं, बढ़ती जीवन प्रत्याशा का मतलब यह भी है कि अधिक लोगों को अंततः दीर्घकालिक बीमारियों, डिमेंशिया, दिव्यांगता और लंबे समय तक देखभाल की आवश्यकता होगी. इसलिए सार्वजनिक नीति को एक जैसी सभी पर लागू होने वाली सोच से आगे बढ़कर वृद्धावस्था की विविध वास्तविकताओं के अनुरूप होना होगा.

केरल का जनसांख्यिकीय बदलाव राज्य की विशिष्ट चुनौतियों से भी प्रभावित है. प्रवासन ने परिवारों की आय तो बढ़ाई है, लेकिन इसके कारण कई बुजुर्ग अकेले रह गए हैं, जबकि उनके बच्चे भारत के अन्य हिस्सों या विदेशों में अपना करियर बना रहे हैं. छोटे होते परिवार और बदलती सामाजिक संरचनाएं यह संकेत देती हैं कि अनौपचारिक देखभाल व्यवस्था अब बढ़ती जरूरतों को पूरा नहीं कर सकती.

महिलाएं अब भी इस बिना वेतन वाले देखभाल कार्य का बड़ा हिस्सा निभाती हैं, लेकिन उन्हें अक्सर न तो पर्याप्त पहचान मिलती है और न ही राहत. अकेलापन, सामाजिक अलगाव और देखभाल करने वालों पर बढ़ता मानसिक दबाव अब मधुमेह, उच्च रक्तचाप और डिमेंशिया जैसी बीमारियों के साथ सार्वजनिक स्वास्थ्य की चिंता बनते जा रहे हैं. ये केवल सामाजिक कल्याण के अलग-अलग मुद्दे नहीं हैं, बल्कि इस बात के संकेत हैं कि बदलती जनसंख्या के साथ केरल की देखभाल व्यवस्था को भी विकसित होना होगा.

इस बदलाव को पहचानते हुए केरल ने वरिष्ठ नागरिकों के लिए एक समर्पित कल्याण विभाग का गठन कर पहले ही एक महत्वपूर्ण संस्थागत कदम उठाया है. यह इस बात की स्वीकारोक्ति है कि जनसंख्या की बढ़ती उम्र अब केवल सामाजिक कल्याण का विषय नहीं रही, बल्कि पूरे शासन तंत्र की विकास प्राथमिकता बन चुकी है. बढ़ती उम्र का असर स्वास्थ्य और आवास से लेकर स्थानीय शासन, प्रौद्योगिकी, रोजगार और आर्थिक विकास तक हर क्षेत्र पर पड़ता है. इसलिए अलग-अलग योजनाओं के बजाय समन्वित कार्रवाई की आवश्यकता है.

बढ़ती उम्र को केवल बढ़ते बोझ के रूप में देखना भी एक भूल होगी. दुनिया भर में वृद्ध होती आबादी वाले समाज दीर्घायु या सिल्वर इकोनॉमी के माध्यम से नए अवसर पैदा कर रहे हैं. घर आधारित देखभाल, पुनर्वास, सहायक प्रौद्योगिकी, वरिष्ठ नागरिकों के अनुकूल आवास, डिजिटल स्वास्थ्य, वित्तीय सेवाएं और आजीवन शिक्षा तेजी से बढ़ते क्षेत्र बन रहे हैं. ये उद्योग केवल स्वास्थ्य पर होने वाले खर्च से संचालित नहीं हैं, बल्कि रोजगार सृजित कर रहे हैं, निवेश आकर्षित कर रहे हैं, नवाचार को बढ़ावा दे रहे हैं और लोगों के जीवन की गुणवत्ता भी बेहतर बना रहे हैं. भारत की सिल्वर इकोनॉमी का अनुमानित आकार पहले ही लगभग 73,000 करोड़ रुपये है और जनसंख्या के वृद्ध होने के साथ इसके तेजी से बढ़ने की संभावना है. इसलिए वृद्ध होती आबादी की तैयारी केवल सामाजिक निवेश नहीं, बल्कि एक आर्थिक रणनीति भी है.

इस परिवर्तन का नेतृत्व करने के लिए केरल विशिष्ट स्थिति में है. राज्य के पास पहले से ही वे कई आधार मौजूद हैं, जिन्हें दूसरे राज्य अभी विकसित करने की कोशिश कर रहे हैं—एक मजबूत सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली, सशक्त स्थानीय स्वशासन संस्थाएं, कुदुम्बश्री नेटवर्क, सामुदायिक स्तर पर अग्रणी उपशामक देखभाल व्यवस्था, उच्च साक्षरता और अनुभवी स्वास्थ्यकर्मी. भारत के पहले WHO आयु-अनुकूल शहर के रूप में कोच्चि की मान्यता यह भी दर्शाती है कि वरिष्ठ नागरिकों के अनुकूल शहरी नियोजन अब केवल एक आकांक्षा नहीं, बल्कि एक व्यावहारिक वास्तविकता है.

अब चुनौती पूरी तरह नई व्यवस्थाएं खड़ी करने की नहीं, बल्कि केरल की मौजूदा ताकतों को जोड़कर एक समग्र आयु-तैयार पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करने की है. इसका अर्थ है सामुदायिक स्तर की देखभाल को मजबूत करना, निवारक स्वास्थ्य सेवाओं में निवेश बढ़ाना, पारिवारिक देखभाल करने वालों को सहयोग देना और ऐसे मोहल्ले, परिवहन व्यवस्था तथा डिजिटल सेवाएं विकसित करना, जिनसे वरिष्ठ नागरिक सक्रिय और आत्मनिर्भर बने रह सकें. इसका अर्थ यह भी है कि बुजुर्गों के लिए आर्थिक और सामाजिक योगदान जारी रखने के अवसर उपलब्ध कराए जाएं, जब तक वे स्वयं ऐसा करना चाहें. इसे हासिल करने के लिए स्वास्थ्य, आवास, परिवहन, वित्त, प्रौद्योगिकी, श्रम और स्थानीय शासन सहित विभिन्न क्षेत्रों के बीच सहयोग आवश्यक होगा, केवल सामाजिक कल्याण विभागों के भरोसे नहीं.

शायद सबसे महत्वपूर्ण बदलाव सांस्कृतिक सोच में होना चाहिए. वरिष्ठ नागरिकों को केवल निर्भरता के नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए. वे अनुभवी पेशेवर, उद्यमी, शिक्षक, देखभालकर्ता, कुशल कारीगर और सामुदायिक नेता हैं, जिनका ज्ञान और योगदान आज भी अमूल्य है. उत्पादक वृद्धावस्था को बढ़ावा देने से केवल वरिष्ठ नागरिकों को ही नहीं, बल्कि युवाओं, समुदायों और पूरी अर्थव्यवस्था को भी लाभ मिलता है.

केरल जनसांख्यिकीय बदलाव को पलट नहीं सकता और न ही उसे ऐसा करने की इच्छा रखनी चाहिए. लंबा जीवन राज्य की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक है. अब चुनौती यह सुनिश्चित करने की है कि दीर्घायु के साथ जीवन की गुणवत्ता भी बनी रहे. यदि केरल ऐसे समुदाय बनाने में सफल होता है, जहां लोग गरिमा के साथ वृद्ध हो सकें, समाज से जुड़े रहें और जीवन के अंतिम वर्षों तक योगदान देते रहें, तो वह एक बार फिर भारत के सामने अनुकरणीय मॉडल प्रस्तुत करेगा. अगला केरल मॉडल इस बात से नहीं आंका जाएगा कि लोग कितने लंबे समय तक जीवित रहते हैं, बल्कि इस बात से कि वे अपने अतिरिक्त वर्षों को कितनी अच्छी तरह जीते हैं.

अतिथि लेखक: डॉ. प्रो. सुधा चंद्रशेखर, सीईओ, स्वास्ति – द हेल्थ कैटेलिस्ट


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