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टाटा संस में हिस्सेदारी पर बड़ी डील की तैयारी? शापूर मिस्त्री परिवार से ₹10,000 करोड़ के बायबैक पर चर्चा

प्रस्तावित ₹10,000 करोड़ का सौदा मिस्त्री परिवार की केवल एक शाखा को कवर करेगा और इसके एक वैकल्पिक निवेश कोष के माध्यम से किए जाने की संभावना है, मामले से जुड़े लोगों ने बताया.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 month ago

पलक शाह

टाटा संस करीब ₹10,000 करोड़ के शेयर बायबैक को लेकर चर्चा कर रही है, जिसके तहत शापूरजी पलोनजी समूह के शापूर मिस्त्री परिवार से जुड़ी हिस्सेदारी का एक हिस्सा खरीदा जा सकता है. मामले से जुड़े लोगों ने यह जानकारी दी.

लोगों ने बताया कि प्रस्तावित लेनदेन केवल परिवार की उसी शाखा तक सीमित रहेगा. टाटा संस में परिवार की कुल 18.37% हिस्सेदारी का वह हिस्सा, जो दिवंगत साइरस मिस्त्री के परिवार से जुड़ा है, बेचा नहीं जा रहा है और यह मौजूदा चर्चा का हिस्सा नहीं है.

सूत्रों ने आगाह किया कि सौदे की शर्तें अभी अंतिम रूप में नहीं हैं, इसका आकार और संरचना बदल सकती है और यह भी संभव है कि बातचीत किसी लेनदेन तक न पहुंचे.

टाटा संस ने विस्तृत सवालों के जवाब में कहा कि वह इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं देगी. शापूरजी पलोनजी समूह ने भी विस्तृत सवालों का जवाब नहीं दिया. डिकी अल्टरनेटिव इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट के निवेश प्रबंधक ने भी अपनी वेबसाइट पर दिए गए ईमेल के जरिए भेजे गए सवालों का जवाब नहीं दिया.

शापूरजी पलोनजी समूह पिछले कई वर्षों से अपने कर्ज को कम करने पर काम कर रहा है, जिसके बारे में सार्वजनिक रिपोर्टों में ₹55,000 करोड़ से ₹60,000 करोड़ के बीच बताया गया है. टाटा संस में उसकी हिस्सेदारी, जो समूह की निवेश इकाइयों के माध्यम से रखी गई है, उसकी सबसे मूल्यवान संपत्ति है, लेकिन सबसे कम तरल भी है. टाटा संस के आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन बाहरी खरीदारों को शेयर ट्रांसफर करने पर प्रतिबंध लगाते हैं. 2020 में इस हिस्सेदारी के बदले करीब 1 अरब डॉलर जुटाने की कोशिश को टाटा संस ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी.

शेयर बेचने में असमर्थ रहने के कारण समूह ने इसके बदले कर्ज लिया है, वह भी बार-बार और बढ़ती लागत पर. जून 2023 में गोस्वामी इंफ्राटेक ने 18.75% की दर वाले नॉन-कन्वर्टिबल डिबेंचर के जरिए करीब ₹14,300 करोड़ जुटाए थे. यह कर्ज टाटा संस की 9.18% हिस्सेदारी के बदले सुरक्षित किया गया था. इन नोट्स की अवधि अप्रैल 2026 में पूरी हो गई. इससे पहले 2021 में स्टर्लिंग इन्वेस्टमेंट कॉरपोरेशन ने 9.1% हिस्सेदारी और रियल एस्टेट संपत्तियों के बदले एरेस मैनेजमेंट और फैरालॉन कैपिटल मैनेजमेंट से करीब 2.2 अरब डॉलर जुटाए थे.

समूह ने इस साल फिर से रीफाइनेंसिंग की. स्टर्लिंग के माध्यम से टाटा संस की 9.185% हिस्सेदारी के बदले करीब 3.3 अरब डॉलर के जीरो-कूपन डिबेंचर के लिए एक टर्म शीट पर हस्ताक्षर किए गए. इन डिबेंचर पर मैच्योरिटी के समय करीब 19.75% की यील्ड देय होगी. उस समय की रिपोर्टों के अनुसार, डॉयचे बैंक करीब 64.4 करोड़ डॉलर के साथ सबसे बड़ा सब्सक्राइबर था, जबकि बर्लिंगटन लोन मैनेजमेंट और वार्डे ने प्रत्येक ने 10 करोड़ डॉलर से अधिक का निवेश किया था. इस रकम का बड़ा हिस्सा पहले के प्राइवेट क्रेडिट लेंडर्स का कर्ज चुकाने में इस्तेमाल किया गया.

इस तरह समूह एक ऐसी संपत्ति के बदले करीब 20% की दर पर कर्ज का बोझ उठा रहा है, जिसे वह स्वतंत्र रूप से बेच नहीं सकता. यही दबाव टाटा संस की लिस्टिंग की मांग और हिस्सेदारी के एक हिस्से को बेचने की उसकी इच्छा के पीछे प्रमुख कारण रहा है.

यह प्रतिबंध मौजूदा प्रस्तावित संरचना के केंद्र में है. किसी तीसरे पक्ष को सीधे बिक्री करने के बजाय, व्यवस्था के तहत फंडिंग का एक हिस्सा डिकी अल्टरनेटिव इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट के माध्यम से किया जा सकता है. मामले से जुड़े लोगों ने इसे सेबी के साथ पंजीकृत कैटेगरी II अल्टरनेटिव इन्वेस्टमेंट फंड बताया है.

लेनदेन से जुड़े नहीं रहे टैक्स विशेषज्ञों ने कहा कि सामान्य तौर पर कैटेगरी II AIF के जरिए निवेश करने से टैक्स ट्रीटमेंट बदल जाता है. आयकर अधिनियम की धारा 115UB के तहत ऐसे फंड को पास-थ्रू दर्जा प्राप्त है. इसका मतलब है कि आय पर टैक्स फंड स्तर पर नहीं, बल्कि निवेशकों के हाथों में लगाया जाता है. विशेषज्ञों के अनुसार, इस तरह की संरचना को आमतौर पर प्रमोटर को किए गए वितरण के बजाय आर्म्स-लेंथ निवेश के रूप में माना जाएगा और यह 2024 में बदले गए बायबैक टैक्स नियमों के दायरे से बाहर होगा, जिनमें टैक्स का बोझ प्राप्तकर्ता शेयरधारक पर डाल दिया गया है.

मामले से जुड़े लोगों ने यह नहीं बताया कि प्रस्तावित ढांचे को तैयार करने में टैक्स ट्रीटमेंट कोई कारक था या नहीं. साथ ही, इस बात का कोई संकेत नहीं है कि प्रस्तावित संरचना का कोई भी हिस्सा अनुचित है. AIF और शेयर बायबैक, दोनों ही भारतीय कॉरपोरेट वित्त में सामान्य और विनियमित साधन हैं.

मूल्यांकन पहले की बातचीत में सबसे बड़ी बाधा रहा है. 2020 में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष कार्यवाही के दौरान मिस्त्री पक्ष के वकील ने परिवार की हिस्सेदारी का मूल्य करीब ₹1.78 लाख करोड़ बताया था, जबकि टाटा संस ने इसका मूल्य लगभग ₹80,000 करोड़ आंका था. दोनों पक्ष सार्वजनिक रूप से इस अंतर को कम नहीं कर सके हैं.

दोनों समूहों के बीच इस साल फिर बातचीत शुरू हुई. टाटा संस के चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन और शापूरजी पलोनजी समूह के चेयरमैन शापूर मिस्त्री ने हाल के महीनों में निजी तौर पर मुलाकात की. SP समूह ने भी टाटा संस की लिस्टिंग की अपनी सार्वजनिक मांग दोहराई है. लिस्टिंग होने से परिवार को अपनी हिस्सेदारी का बाजार मूल्य मिल सकेगा और उसे बेचने का रास्ता खुल जाएगा. टाटा ट्रस्ट्स के दो वाइस चेयरमैन ने भी अलग-अलग तौर पर लिस्टिंग का समर्थन किया है.

इस तरह का आंशिक बायबैक व्यापक मुद्दे का समाधान नहीं करेगा. इससे परिवार की एक शाखा को अपनी हिस्सेदारी के एक हिस्से के बदले नकदी मिल जाएगी, जबकि टाटा संस को पूरी हिस्सेदारी का मूल्य तय करने या मिस्त्री परिवार को अपनी पूरी हिस्सेदारी छोड़ने की जरूरत नहीं पड़ेगी.

पलक शाह, BW रिपोर्टर्स

(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
 


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