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त्योहारी सीजन में 6% तक पहुंच सकती है महंगाई; कच्चा तेल और अल नीनो बढ़ाएंगे दबाव: RBI
RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा कि आने वाले समय में महंगाई पर सप्लाई से जुड़े कई दबाव बने रह सकते हैं. इनमें मानसून की स्थिति, अल नीनो और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव प्रमुख हैं.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 hour ago
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने महंगाई को लेकर अपने अनुमान में बढ़ोतरी की है. केंद्रीय बैंक को उम्मीद है कि वित्त वर्ष 2027 में खुदरा महंगाई दर 5.2 फीसदी रह सकती है. सबसे ज्यादा चिंता दिसंबर तिमाही को लेकर है, जब महंगाई दर 6 फीसदी तक पहुंचने का अनुमान है. यह वही दौर होगा जब देश में त्योहारी सीजन के बाद मांग बनी रहती है. RBI के मुताबिक, कच्चे तेल की ऊंची कीमतें, कमजोर मानसून, अल नीनो और रुपये में कमजोरी महंगाई का दबाव बढ़ा सकते हैं. ऐसे में आने वाले महीनों में आम लोगों के घरेलू बजट और रोजमर्रा की चीजों की कीमतों पर असर पड़ने की आशंका है.
वित्त वर्ष 2027 में 5.2% रह सकती है महंगाई
RBI ने वित्त वर्ष 2027 के लिए CPI महंगाई का अनुमान बढ़ाकर 5.2 फीसदी कर दिया है. केंद्रीय बैंक के मुताबिक, दूसरी तिमाही में महंगाई 4.9 फीसदी, तीसरी तिमाही में 6 फीसदी और चौथी तिमाही में 5.7 फीसदी रह सकती है. वित्त वर्ष 2028 की पहली तिमाही के लिए भी महंगाई का अनुमान 5.6 फीसदी रखा गया है.
RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा कि आने वाले समय में महंगाई पर सप्लाई से जुड़े कई दबाव बने रह सकते हैं. इनमें मानसून की स्थिति, अल नीनो और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव प्रमुख हैं.
कच्चा तेल क्यों बढ़ा सकता है महंगाई?
पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आई है. भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है. ऐसे में वैश्विक बाजार में तेल महंगा होने पर देश में ईंधन और परिवहन की लागत बढ़ सकती है.
इसका असर केवल पेट्रोल-डीजल तक सीमित नहीं रहता. परिवहन महंगा होने से माल ढुलाई, उत्पादन और रोजमर्रा की कई वस्तुओं की लागत बढ़ सकती है. कंपनियों की लागत बढ़ने पर उसका कुछ हिस्सा ग्राहकों तक पहुंच सकता है, जिससे महंगाई का दबाव और बढ़ सकता है.
अल नीनो से खाने-पीने की चीजें हो सकती हैं महंगी
महंगाई के मोर्चे पर दूसरा बड़ा जोखिम अल नीनो और कमजोर या असमान मानसून से जुड़ा है. बारिश कम होने पर फसल उत्पादन प्रभावित हो सकता है. इसका असर सब्जियों, अनाज और अन्य कृषि उत्पादों की सप्लाई पर पड़ सकता है.
अगर कृषि उत्पादन कम रहता है तो खाने-पीने की चीजों की कीमतें बढ़ सकती हैं. इससे खाद्य महंगाई बढ़ेगी और इसका असर कुल खुदरा महंगाई यानी CPI पर भी दिखाई दे सकता है. यही वजह है कि RBI आने वाले महीनों में खाद्य कीमतों और मानसून की स्थिति पर करीबी नजर रख रहा है.
कमजोर रुपया भी बढ़ा सकता है दबाव
महंगाई का एक और जोखिम रुपये की कमजोरी से जुड़ा है. इस साल रुपये में करीब 6 फीसदी की गिरावट आई है. कमजोर रुपया आयातित वस्तुओं को महंगा कर देता है. कच्चे तेल का भुगतान अंतरराष्ट्रीय बाजार में डॉलर में होता है, इसलिए रुपये की कमजोरी के साथ तेल आयात की लागत और बढ़ सकती है.
इसका असर ईंधन से लेकर परिवहन और उत्पादन लागत तक दिखाई दे सकता है. ऐसे में कच्चे तेल की ऊंची कीमत और कमजोर रुपया मिलकर महंगाई का दबाव बढ़ा सकते हैं.
दिसंबर तिमाही पर सबसे ज्यादा नजर
RBI का 6 फीसदी का अनुमान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि दिसंबर तिमाही में महंगाई केंद्रीय बैंक की ऊपरी सहनशीलता सीमा के करीब पहुंच सकती है. अर्थशास्त्रियों ने भी पहले से ही इस अवधि में महंगाई बढ़ने की आशंका जताई थी.
अगर महंगाई उम्मीद से ज्यादा बढ़ती है और लंबे समय तक ऊंची बनी रहती है तो RBI पर ब्याज दरों को लेकर सख्त रुख बनाए रखने का दबाव बढ़ सकता है. बुधवार को RBI MPC ने रेपो रेट में 25 बेसिस प्वाइंट की बढ़ोतरी कर इसे 5.50 फीसदी कर दिया है.
दुनिया के दूसरे केंद्रीय बैंक भी महंगाई से चिंतित
महंगाई का दबाव केवल भारत तक सीमित नहीं है. अमेरिका, यूरोप और जापान के केंद्रीय बैंक भी ऊर्जा कीमतों और भू-राजनीतिक तनाव से पैदा होने वाले महंगाई जोखिम पर नजर रख रहे हैं.
ऊंची ऊर्जा कीमतें वैश्विक स्तर पर उत्पादन और परिवहन की लागत बढ़ा सकती हैं. ऐसे माहौल में दुनिया के केंद्रीय बैंकों के लिए महंगाई को नियंत्रित करना और आर्थिक विकास की रफ्तार बनाए रखना बड़ी चुनौती बन गया है.
फिलहाल RBI के सामने भी यही चुनौती है. एक तरफ अर्थव्यवस्था की विकास दर मजबूत बनी हुई है, वहीं दूसरी तरफ कच्चे तेल, खाद्य कीमतों और मौसम से जुड़े जोखिम महंगाई को फिर से ऊपर धकेल सकते हैं.
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