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क्रिस्टोफर नोलन की ‘द ओडिसी’: क्यों हीरो की यात्रा आज भी बेहतरीन नेतृत्व को परिभाषित करती है

क्रिस्टोफर नोलन की ‘द ओडिसी’ का रूपांतरण जोसेफ कैंपबेल की ‘हीरो जर्नी’ और नेतृत्व, दृढ़ता व व्यक्तिगत बदलाव पर इसके स्थायी सबक को फिर से देखने का अवसर देता है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 months ago

जब मैंने पहली बार पढ़ा कि क्रिस्टोफर नोलन की अगली फिल्म ‘द ओडिसी’ होगी, तो मेरा ध्यान तुरंत होमर की ओर नहीं गया. मेरा ध्यान जोसेफ कैंपबेल की ओर गया.

कई साल पहले, नेतृत्व और कहानी कहने की कला का अध्ययन करते हुए, मेरी नजर कैंपबेल के ‘हीरो जर्नी’ के विचार पर पड़ी थी. वर्षों के दौरान नोलन की फिल्मों को देखते हुए मुझे एहसास हुआ कि वह हमेशा से इसी कहानी के अलग-अलग रूप प्रस्तुत करते रहे हैं.

जोसेफ कैंपबेल ने अपनी किताब ‘द हीरो विद अ थाउजेंड फेसेस’ में ‘हीरो जर्नी’ को दुनिया भर की संस्कृतियों की पौराणिक कथाओं में मिलने वाले एक सार्वभौमिक पैटर्न के रूप में बताया था. इसके सबसे सरल रूप में, एक सामान्य व्यक्ति परिचित दुनिया को छोड़ता है, ऐसी चुनौतियों का सामना करता है जो उसके चरित्र और संकल्प की परीक्षा लेती हैं, उन अनुभवों से बदलता है और अंततः ऐसी समझ के साथ लौटता है जिससे दूसरों को लाभ मिलता है.

अपने पूरे करियर में नोलन ऐसी कहानियों से आकर्षित रहे हैं जो पहचान, समय, त्याग और मानवीय भावना की दृढ़ता को तलाशती हैं. होमर की यह महाकाव्य कहानी इन सभी तत्वों को समेटे हुए है, लेकिन यह इससे भी गहरी बात कहती है. कैंपबेल द्वारा इस पैटर्न को पहचानने से बहुत पहले ही ‘द ओडिसी’ इसे दर्शा चुकी थी.

कैंपबेल का मानना था कि ‘हीरो जर्नी’ केवल कहानी कहने का एक तरीका नहीं है. यह उस प्रक्रिया को दर्शाती है जिसके माध्यम से इंसान विकसित होता है.

शायद यही वजह है कि यह कहानी लगभग तीन हजार वर्षों से कायम है. इसमें हम खुद को पहचानते हैं. चाहे हम असफलता के बाद दोबारा खड़े होने वाले उद्यमी हों, अनिश्चित परिस्थितियों में संगठनों का नेतृत्व करने वाले अधिकारी हों, अपने परिवार के लिए त्याग करने वाले माता-पिता हों या दुनिया में अपनी जगह तलाशने वाले युवा पेशेवर हों, हमारे जीवन अक्सर इसी यात्रा का अनुसरण करते हैं. हम आरामदायक स्थिति को छोड़ते हैं, मुश्किलों का सामना करते हैं, उन क्षमताओं को खोजते हैं जिनके बारे में हमें पहले पता नहीं था और अनुभवों से बदलकर वापस लौटते हैं.

इस नजरिए से देखा जाए तो ओडीसियस केवल ट्रोजन युद्ध के बाद घर लौटने की कोशिश कर रहा एक योद्धा नहीं है. उसकी यात्रा दृढ़ता का प्रतीक है. हर अनुभव साइक्लोप्स, सायरन, तूफान और वर्षों तक भटकना, केवल उसकी ताकत की नहीं, बल्कि उसके निर्णय लेने की क्षमता, धैर्य और चरित्र की भी परीक्षा लेता है. जब तक वह इथाका पहुंचता है, तब तक वह वह व्यक्ति नहीं रह जाता जो वहां से रवाना हुआ था.

शायद यही इस कहानी की स्थायी अपील है और यही एक कारण है कि क्रिस्टोफर नोलन इसे नई पीढ़ी तक पहुंचाना चाहते हैं. उनकी फिल्मों ने हमेशा इस बात की पड़ताल की है कि इंसान के रूप में हमें क्या आकार देता है. ‘द ओडिसी’ शायद सबसे पुराने सवालों में से एक पूछती है: जीवन की चुनौतियां हमें खुद का बेहतर रूप बनने के लिए कैसे बदलती हैं?

इसका जवाब सिनेमा से कहीं आगे तक जाता है. यह नेतृत्व के लिए एक महत्वपूर्ण सीख देता है. हम अक्सर नेताओं को उनकी उपलब्धियों के लिए सम्मान देते हैं, लेकिन ये उपलब्धियां आमतौर पर एक ऐसी अदृश्य यात्रा का परिणाम होती हैं, जिसमें असफलताएं, कठिन फैसले, आत्म-संदेह के क्षण और विकास के अप्रत्याशित अवसर शामिल होते हैं. जिन नेताओं की हम सबसे अधिक प्रशंसा करते हैं, वे शायद ही वे होते हैं जिन्होंने कठिनाइयों से दूरी बनाए रखी हो. वे वे लोग होते हैं जिन्होंने कठिन परिस्थितियों को अपनी समझ और ज्ञान को गहरा करने दिया.

ओडीसियस उन शुरुआती नायकों में से एक है जिसने इस पैटर्न को जीवंत किया.

लेकिन हममें से भी कई लोग ऐसे ही हैं.

हर वह उद्यमी जो असफलता के बाद दोबारा शुरुआत करता है.
हर वह नेता जो कठिन फैसले लेता है.
हर वह माता-पिता जो परिवार के लिए त्याग करता है.
हर वह पेशेवर जो किसी झटके के बाद खुद को नए सिरे से तैयार करता है.

शायद यही कारण है कि होमर की यह महाकाव्य कहानी लगभग तीन सहस्राब्दियों से जीवित है, जबकि अनगिनत अन्य कहानियां समय के साथ खो गईं. परिस्थितियां बदलती हैं. तकनीक विकसित होती है. हर पीढ़ी इस कहानी को अपने तरीके से प्रस्तुत करती है. लेकिन यात्रा वही रहती है.

हर सार्थक जीवन की अपनी एक ओडिसी होती है.

सवाल यह नहीं है कि क्या हम यह यात्रा शुरू करेंगे.

सवाल यह है कि हम इस यात्रा से क्या लेकर लौटेंगे.

अस्वीकरण: इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं और जरूरी नहीं कि वे प्रकाशन के विचारों को प्रतिबिंबित करते हों.

अतिथि लेखक-प्रभाकर मुंडकुर

(लेखक कॉरपोरेट सलाहकार और मेंटर हैं और हाल ही में लॉन्च हुई किताब ‘Here Today Here Tomorrow’ के सह-लेखक हैं.)

 


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