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जी के 3,100 करोड़ रुपये के फंड जुटाने पर रोक क्यों? सैट ने सेबी के फैसले पर उठाए सवाल
प्रतिभूति अपीलीय न्यायाधिकरण ने कहा कि जब दो महीने की रोक खत्म होने के बाद निवेश की अनुमति है, तो अभी इस पर रोक लगाने का आधार क्या है. सार्वजनिक शेयरधारकों के भारी समर्थन को भी न्यायाधिकरण ने अहम माना.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 hour ago
जी एंटरटेनमेंट एंटरप्राइजेज लिमिटेड (ZEE) के 3,100 करोड़ रुपये के प्रस्तावित फंड जुटाने पर रोक लगाने के भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड यानी सेबी के फैसले पर प्रतिभूति अपीलीय न्यायाधिकरण यानी सैट ने सवाल उठाए हैं. सैट ने कहा कि जब सेबी खुद यह मान रहा है कि दो महीने की रोक अवधि समाप्त होने के बाद यह निवेश किया जा सकता है, तो फिलहाल इसे रोकने का तर्क समझ से परे है.
सैट ने शुक्रवार को अंतरिम राहत देते हुए जी को प्रमोटर समूह की इकाई के पक्ष में पूर्ण रूप से परिवर्तनीय वारंट जारी करने की अनुमति दे दी. हालांकि, न्यायाधिकरण ने सेबी के पूरे आदेश पर रोक नहीं लगाई है और जी पर प्रतिभूति बाजार तक पहुंच को लेकर लगाई गई व्यापक रोक फिलहाल जारी रहेगी.
दो महीने बाद निवेश की अनुमति तो अभी रोक क्यों?
सुनवाई के दौरान सैट ने सेबी से सीधे सवाल किया था कि क्या दो महीने की रोक अवधि खत्म होने के बाद यह निवेश कंपनी में किया जा सकता है. इस पर सेबी के वकील ने माना कि रोक अवधि समाप्त होने के बाद निवेश किया जा सकता है. यहीं से सैट ने सेबी के तर्क पर सवाल उठाया. न्यायाधिकरण ने कहा कि यदि प्रस्तावित लेनदेन दो महीने बाद कानूनी रूप से किया जा सकता है और इसके रास्ते में कोई अन्य कानूनी बाधा नहीं है, तो फिलहाल इसे रोकने का आधार स्पष्ट नहीं है.
सेबी ने जी की तत्काल राहत की मांग का विरोध करते हुए कहा था कि कंपनी ने आवंटन को तुरंत पूरा करने की जरूरत साबित करने के लिए पर्याप्त सामग्री पेश नहीं की है. हालांकि, सैट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया.
सार्वजनिक शेयरधारकों का भारी समर्थन
सैट ने अपने आदेश में इस बात को भी काफी महत्व दिया कि प्रस्तावित फंड जुटाने की योजना को बड़ी संख्या में सार्वजनिक शेयरधारकों का समर्थन मिला है. 31 जुलाई को हुई असाधारण आम बैठक में प्रमोटरों को छोड़कर 76.64 प्रतिशत शेयरधारकों ने वारंट जारी करने के प्रस्ताव के पक्ष में मतदान किया था. वहीं, जी के करीब 96 प्रतिशत शेयरधारक सार्वजनिक श्रेणी के हैं.
न्यायाधिकरण ने कहा कि प्राथमिकता के आधार पर पूर्ण रूप से परिवर्तनीय वारंट जारी करने से सार्वजनिक शेयरधारकों को भी फायदा होने की संभावना है. इस वारंट निर्गम के जरिए कंपनी को करीब 3,100 करोड़ रुपये का निवेश मिल सकता है.
प्रतिभूति लेनदेन में धोखाधड़ी का आरोप नहीं
सुनवाई के दौरान सेबी ने एक और अहम बात स्वीकार की. सैट के सवाल पर सेबी ने माना कि उसके आदेश में जी के खिलाफ प्रतिभूतियों के लेनदेन से जुड़े मामले में धोखाधड़ी और अनुचित व्यापार व्यवहार निषेध नियमों के उल्लंघन का आरोप नहीं लगाया गया है. हालांकि, सैट ने इस स्तर पर सेबी के मूल आरोपों पर कोई अंतिम फैसला नहीं दिया है. न्यायाधिकरण ने स्पष्ट किया कि दोनों पक्षों की अन्य दलीलों पर अंतिम सुनवाई के दौरान विचार किया जाएगा.
लेकिन अंतरिम राहत देते समय इस तथ्य को अहम माना गया कि कंपनी पर प्रतिभूति लेनदेन के संबंध में धोखाधड़ी या अनुचित व्यापार व्यवहार का आरोप नहीं है, जबकि दूसरी ओर शेयरधारकों की मंजूरी से जुड़ा एक समयबद्ध फंड जुटाने का प्रस्ताव मौजूद है.
फंड जुटाने की अनुमति, लेकिन बाजार प्रतिबंध जारी
सैट ने सेबी के आदेश पर केवल उतनी सीमा तक रोक लगाई है, जिससे जी और पुनीत गोयनका प्रमोटर समूह की इकाई को प्राथमिकता के आधार पर पूर्ण रूप से परिवर्तनीय वारंट जारी कर सकें. इसके साथ ही अपीलकर्ताओं को एक सप्ताह के भीतर पूरी जुर्माना राशि जमा करनी होगी. सेबी को इस राशि को ब्याज वाले खाते में रखने का निर्देश दिया गया है.
न्यायाधिकरण ने वारंट जारी करने की समयसीमा भी एक सप्ताह बढ़ा दी है. यह समयसीमा पहले 14 अगस्त को समाप्त हो रही थी. सैट ने कंपनी को सामान्य कारोबारी जरूरतों के लिए म्यूचुअल फंड से जुड़े लेनदेन करने की भी अनुमति दी है. हालांकि, प्रस्तावित लाभांश के भुगतान सहित अन्य उद्देश्यों के लिए ऐसी अनुमति नहीं दी गई है.
हैदराबाद संपत्ति मामले से जुड़ा है विवाद
सेबी की कार्रवाई जी की हैदराबाद स्थित एक संपत्ति से जुड़े आरोपों के बाद हुई थी. आरोप है कि वर्ष 2016 में प्रमोटरों ने चार समूह कंपनियों के कर्ज के लिए इस संपत्ति को गिरवी रखा था. सेबी का आरोप है कि यह संपत्ति जरूरी बोर्ड या शेयरधारकों की मंजूरी के बिना गिरवी रखी गई थी. हालांकि, सैट ने अभी इन आरोपों की वैधता पर कोई फैसला नहीं दिया है.
फिलहाल सैट के अंतरिम आदेश ने यह साफ कर दिया है कि सेबी जी की बाजार तक पहुंच पर प्रतिबंध जारी रख सकता है, लेकिन इसी प्रतिबंध के आधार पर सार्वजनिक शेयरधारकों की मंजूरी वाले 3,100 करोड़ रुपये के वारंट निर्गम को अंतरिम अवधि में रोका नहीं जा सकता.
अब मामले की अंतिम सुनवाई में यह तय होगा कि सेबी के मूल निष्कर्ष और जी पर लगाए गए प्रतिबंध कानूनी जांच की कसौटी पर कितने खरे उतरते हैं. लेकिन फिलहाल सैट ने सेबी के सामने एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा कर दिया है कि जब निवेश दो महीने बाद कानूनी रूप से स्वीकार्य है, तो इन दो महीनों के दौरान उसे रोकने के लिए और मजबूत आधार की जरूरत है.
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