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ज्योतिषीय दृष्टि से निर्णायक मोड़ पर भारत, क्या बदलने वाली है राजनीति की दिशा?
ज्योतिषाचार्य विक्रम चन्दीरमानी कहते हैं कि मेष राशि में शनि का प्रवेश नई शुरुआत का संकेत देता है. उनके अनुसार, उतार-चढ़ाव और उथल-पुथल के दौर के बाद नए राजनीतिक समीकरण उभर सकते हैं, जो धीरे-धीरे मजबूत होते जाएंगे.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 56 minutes ago
हम इतिहास के एक निर्णायक मोड़ से गुजर रहे हैं. कुछ ही साल पहले जो राजनीतिक निश्चितताएं मजबूती से स्थापित नजर आती थीं, वे अब कमजोर पड़ने लगी हैं, जबकि नए आंदोलन, नेता और राजनीतिक प्रभाव के नए स्रोत उल्लेखनीय तेजी से उभर रहे हैं. एक युवा पीढ़ी अधिक मुखर हो रही है, पारंपरिक संस्थाओं को चुनौती दी जा रही है और सोशल मीडिया ने यह पूरी तरह बदल दिया है कि किस तेजी से जनता का गुस्सा गति पकड़ सकता है और राजनीतिक दबाव में बदल सकता है. इस तरह के बदलाव आमतौर पर किसी एक चुनाव, विरोध प्रदर्शन या नेतृत्व परिवर्तन के जरिए नहीं होते. वे घटनाओं की एक श्रृंखला के माध्यम से सामने आते हैं, जो अलग-अलग देखने पर भले ही असंबंधित लगें, लेकिन सामूहिक रूप से यह संकेत देते हैं कि पुरानी राजनीतिक व्यवस्था किसी नई व्यवस्था के लिए जगह बनाना शुरू कर रही है. मेरा मानना है कि भारत अब ऐसे ही एक दौर में प्रवेश कर रहा है.
बिजनेस वर्ल्ड के लिए अपने दिसंबर 2025 के पूर्वानुमान में मैंने जेन जेड विरोध प्रदर्शनों के उभार की भविष्यवाणी की थी और जुलाई तथा अगस्त 2026 को विशेष रूप से महत्वपूर्ण अवधि बताया था. जून 2026 में मैंने X पर यह भी अनुमान लगाया था कि कुछ विरोध प्रदर्शन हिंसक हो सकते हैं. मैंने यह भी लिखा था कि कुछ राजनीतिक नेता पद छोड़ सकते हैं या उनका प्रभाव कम हो सकता है, जबकि नए नेता और राजनीतिक ताकतें उभरेंगी और कुछ मौजूदा नेताओं का प्रभाव और बढ़ेगा.
कॉकरोच जनता पार्टी का अप्रत्याशित उभार इसी व्यापक पैटर्न में फिट बैठता है. जंतर-मंतर पर उसके विरोध प्रदर्शनों के बाद धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा हुआ - NDA सरकार के 12 वर्षों के दौरान मंत्रिस्तरीय इस्तीफे का एक दुर्लभ मामला. यह कोई अलग-थलग घटना नहीं है. यह एक बड़े राजनीतिक चक्र का हिस्सा है. आने वाले समय में इस तरह के और विरोध प्रदर्शन होने की संभावना है. इनके कारण जरूरी नहीं कि एक जैसे हों. नए मुद्दे, शिकायतें और टकराव के बिंदु सामने आएंगे, जो अधिक लोगों को सड़कों पर लाएंगे और नई राजनीतिक ताकतों तथा नेताओं को जन्म देंगे. सोशल मीडिया इन आंदोलनों को बढ़ावा देने, लोगों को तेजी से संगठित करने और स्थानीय या किसी खास मुद्दे से जुड़े विरोध प्रदर्शनों को असाधारण तेजी से राष्ट्रीय पहचान दिलाने में निर्णायक भूमिका निभाएगा. सामूहिक रूप से, ये धाराएं आने वाले वर्षों में भारतीय राजनीति की दिशा बदल सकती हैं.
ज्योतिषीय दृष्टि से यह समय शनि के चक्र में एक महत्वपूर्ण बदलाव के साथ मेल खाता है. शनि पूरे 2026 में मीन राशि में रहेगा और जून 2027 में पहली बार मेष राशि में प्रवेश करेगा. उस वर्ष बाद में संक्षिप्त अवधि के लिए वक्री होकर वापस मीन राशि में जाने के बाद, फरवरी 2028 में यह फिर से मेष राशि में लौटेगा और उस गोचर के मुख्य चरण की शुरुआत करेगा, जो 2029 तक जारी रहेगा. मेष राशि में शनि नई शुरुआत का संकेत देता है - उतार-चढ़ाव और विघटन के दौर के बाद नए राजनीतिक संतुलन का उभरना और धीरे-धीरे मजबूत होना.
भारत ने यह पैटर्न पहले भी देखा है. 1998 में शनि ने मेष राशि में प्रवेश किया था. इसके अगले वर्ष, अस्थिर गठबंधन सरकारों के लंबे दौर के बाद, अटल बिहारी वाजपेयी ने 1999 के आम चुनाव में एक स्थिर जनादेश हासिल किया. आजादी के बाद पहली बार किसी गैर-कांग्रेस सरकार ने अपना पूरा पांच साल का कार्यकाल पूरा किया. किसी का भी राजनीतिक दृष्टिकोण कुछ भी हो, लेकिन वह दौर केवल एक पार्टी की सफलता से कहीं अधिक था. मेष राशि में शनि के दौरान, इसने वर्षों की अनिश्चितता के बाद एक अलग राजनीतिक संतुलन के उभरने का संकेत दिया.
इससे भी पीछे जाएं तो 1960 के दशक के अंत और 1970 के दशक की शुरुआत में ऐसा ही बदलाव देखने को मिला, जब शनि फिर से मेष राशि में था. 1969 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का विभाजन आजादी के बाद भारत की प्रमुख सत्तारूढ़ पार्टी का पहला बड़ा औपचारिक विभाजन था. यह प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और पार्टी के पुराने नेतृत्व, जिसे सिंडिकेट के नाम से जाना जाता था, के बीच लंबे समय से चल रहे सत्ता संघर्ष का परिणाम था. 1966 में लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु के बाद प्रधानमंत्री बनने वाली इंदिरा गांधी को के. कामराज, एस. निजलिंगप्पा, मोरारजी देसाई और एस.के. पाटिल सहित संगठन के वरिष्ठ नेताओं के साथ बढ़ते मतभेदों का सामना करना पड़ा. 1967 के चुनावों के बाद तनाव और बढ़ गया. निर्णायक मोड़ 1969 के राष्ट्रपति चुनाव के दौरान आया. सिंडिकेट ने नीलम संजीव रेड्डी का समर्थन किया, जबकि इंदिरा ने वी.वी. गिरि का समर्थन किया और अंतरात्मा की आवाज पर मतदान करने की अपील की. गिरि की जीत, इसके बाद बैंकों के राष्ट्रीयकरण और प्रिवी पर्स समाप्त करने की पहल ने मतभेदों को और गहरा कर दिया. 12 नवंबर 1969 को इंदिरा को पार्टी से निष्कासित कर दिया गया. उनके समर्थकों ने इस निष्कासन को स्वीकार करने से इनकार कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप दो प्रतिद्वंद्वी संगठन बने - इंदिरा के नेतृत्व में कांग्रेस (R) और पुराने नेतृत्व के अधीन कांग्रेस (O). इंदिरा के गुट ने बाद में 1 से 10 मार्च 1971 के बीच हुए आम चुनावों में 'गरीबी हटाओ' के नारे के साथ भारी जीत हासिल की. इस निर्णायक चुनावी जीत के समय शनि मेष राशि में था. इस विभाजन ने कांग्रेस को क्षेत्रीय नेताओं के प्रभुत्व वाली एक व्यापक संगठनात्मक पार्टी से बदलकर एक अधिक केंद्रीकृत और व्यक्तित्व आधारित राजनीतिक ताकत में बदल दिया.
इससे भी पहले, 1937-1942 का दौर एक और महत्वपूर्ण समानांतर प्रस्तुत करता है. भारत सरकार अधिनियम 1935 के तहत हुए 1936-37 के प्रांतीय चुनावों ने प्रांतीय स्वायत्तता की शुरुआत की और मतदाताओं के दायरे का नाटकीय रूप से विस्तार किया. कांग्रेस ने 11 में से आठ प्रांतों में सरकारें बनाईं और शासन का अपना पहला महत्वपूर्ण अनुभव हासिल किया. इन सरकारों ने सुधार लागू किए और प्रशासनिक क्षमता का प्रदर्शन किया, लेकिन साथ ही सांप्रदायिक तनाव भी बढ़े. मई 1939 में शनि ने मेष राशि में प्रवेश किया. जब ब्रिटेन ने भारत से बिना परामर्श किए उसे द्वितीय विश्व युद्ध में शामिल घोषित कर दिया, तो कांग्रेस ने अक्टूबर और नवंबर 1939 के बीच विरोध में अपनी सरकारों से इस्तीफा दे दिया - यह एक ऐसा राजनीतिक रुख था जिसमें सत्ता बनाए रखने के बजाय आजादी की मांग को प्राथमिकता दी गई और यह फैसला उस समय लिया गया जब शनि मेष राशि में था. इसके बाद के वर्षों में व्यक्तिगत सत्याग्रह, क्रिप्स मिशन की विफलता और 8 अगस्त 1942 को भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत हुई. इस दौर ने कांग्रेस की दोहरी क्षमता को सामने रखा - अवसर मिलने पर शासन करने की क्षमता और मूल सिद्धांतों के दांव पर होने पर सत्ता छोड़कर जन प्रतिरोध को संगठित करने की तत्परता.
इन सभी पुराने बदलावों में - 1999 के बाद वाजपेयी द्वारा शासन को स्थिरता देना, इंदिरा गांधी की 1971 की निर्णायक जीत और 1939 के अंत में कांग्रेस सरकारों का इस्तीफा - मेष राशि में शनि की उपस्थिति एक राजनीतिक व्यवस्था के अंत और एक नई व्यवस्था के उभरने के साथ मेल खाती है. मौजूदा समय में भी ऐसी ही संरचनात्मक विशेषता दिखाई देती है. मीन राशि में शनि एक पुराने राजनीतिक चक्र को उसके अंत की ओर ले जा रहा है, वहीं नई ताकतें और राजनीतिक अभिव्यक्ति के नए रूप उभरने लगे हैं. यह प्रक्रिया पहले ही शुरू हो चुकी है. शनि का मेष राशि में प्रवेश नई शुरुआत के एक दौर का मार्ग प्रशस्त करेगा. नए नेता, राजनीतिक ताकतें, आंदोलन और गठजोड़ उभरेंगे, जबकि सत्ता के कुछ स्थापित केंद्र अपनी पकड़ खो देंगे. पुराना नई व्यवस्था के लिए रास्ता बनाएगा. मेष राशि में शनि का आने वाला चक्र भारतीय राजनीति में एक नए अध्याय की शुरुआत का संकेत देगा.
(डिस्क्लेमर: इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं और अनिवार्य रूप से प्रकाशन के विचारों को प्रतिबिंबित नहीं करते.)
अतिथि लेखक: विक्रम चन्दीरमानी
(विक्रम चन्दीरमानी, 2001 से ज्योतिषाचार्य, वेदिक और पश्चिमी ज्योतिष के सिद्धांतों को अपनी सहज अंतर्दृष्टि के साथ मिलाकर भविष्य के गहन विश्लेषण प्रदान करते हैं.)
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