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स्वस्थ कर्मचारी, मजबूत कंपनियां: कार्यस्थल तक पहुंची हेल्थकेयर की नई पहल
डॉ. प्रकाशराव शेंडगे ने BW से भारत के कार्यबल के लिए मोबाइल ऑक्यूपेशनल हेल्थ सर्विसेज की शुरुआत, बीमारियों की शुरुआती पहचान में सुधार और एक अत्यंत नवोन्मेषी व प्रिवेंटिव हेल्थकेयर मॉडल विकसित करने पर विस्तार से बात की.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 hour ago
रुहैल आमीन
नवी मुंबई स्थित ओम गगनगिरी हॉस्पिटल्स और ऑक्यूपेशनल हेल्थ सर्विसेज एलएलपी के संस्थापक और जाने-माने लैप्रोस्कोपिक सर्जन डॉ. प्रकाशराव शेंडगे ने दो दशकों से अधिक समय क्लिनिकल मेडिसिन और कार्यस्थल स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम करते हुए बिताया है. वर्ष 2012 में उन्होंने एक हाई-टेक मोबाइल मेडिकल चेक-अप बस शुरू की, जिसका उद्देश्य डायग्नोस्टिक सुविधाओं को सीधे फैक्ट्रियों, औद्योगिक इकाइयों और कॉरपोरेट परिसरों तक पहुंचाना था. एक वाहन से शुरू हुई यह पहल अब पांच बसों के बेड़े में बदल चुकी है, जो महाराष्ट्र और देशभर में विभिन्न संगठनों को सेवाएं दे रहा है. इस विस्तृत बातचीत में डॉ. शेंडगे इस पहल के पीछे की सोच, बसों में इस्तेमाल की गई तकनीक और सुरक्षा व्यवस्थाओं, इंडस्ट्री के अनुसार होने वाली जांचों की अहमियत और कर्मचारियों की भलाई के लिए प्रिवेंटिव ऑक्यूपेशनल हेल्थकेयर को अनिवार्य बनाने की जरूरत पर बात करते हैं. संपादित अंश:
ऑक्यूपेशनल हेल्थकेयर के इस मॉडल को स्थापित करने की प्रेरणा आपको कहां से मिली?
मोबाइल मेडिकल चेक-अप सर्विस शुरू करने से पहले मैं एक दशक से अधिक समय तक ऑक्यूपेशनल हेल्थ एग्जामिनेशन कर रहा था. इस दौरान फैक्ट्रियों और कॉरपोरेट साइट्स पर मुझे बार-बार कई व्यावहारिक समस्याओं का सामना करना पड़ा. अक्सर उपयुक्त कमरे उपलब्ध नहीं होते थे. ऑडियोमेट्री के लिए पूरी तरह साउंडप्रूफ जगह की जरूरत होती थी, एक्स-रे के लिए एक सुरक्षित और अलग स्थान चाहिए होता था और ECG जांच के लिए प्राइवेसी व स्थिर वातावरण जरूरी था. कई मामलों में जांच शुरू होने से पहले ही क्लाइंट के परिसर में पूरा अस्थायी सेटअप तैयार करना पड़ता था.
मुझे महसूस हुआ कि इसका समाधान एक ऐसी पूरी डायग्नोस्टिक सुविधा तैयार करना है, जो खुद कार्यस्थल तक पहुंच सके. उद्देश्य सरल था—कर्मचारियों और नियोक्ताओं का काफी समय बचाते हुए क्लाइंट की साइट पर सटीक, नियमों के अनुरूप और किफायती स्वास्थ्य जांच उपलब्ध कराना. हमने 2012 में अपनी पहली हाई-टेक मेडिकल चेक-अप बस शुरू की. अच्छी प्रतिक्रिया मिलने पर 2015 में दूसरी, 2018 में तीसरी, 2020 में चौथी और 2025 में और अधिक अपग्रेड की गई पांचवीं बस शुरू की गई.
आपका मॉडल मेडिकल बस की पारंपरिक अवधारणा से किस तरह अलग है?
कई मेडिकल वाहनों का इस्तेमाल मुख्य रूप से मरीजों को अस्पताल तक पहुंचाने या सीमित स्तर की बुनियादी सेवाएं देने के लिए किया जाता है. हमारा कॉन्सेप्ट अलग है. यह बस खुद एक विशेष रूप से डिजाइन किए गए ऑक्यूपेशनल हेल्थ सेंटर की तरह काम करती है. हम टेस्टिंग इंफ्रास्ट्रक्चर, प्रशिक्षित कर्मचारियों और रिपोर्टिंग सिस्टम को सीधे फैक्ट्री या कॉरपोरेट परिसर तक लेकर जाते हैं.
नियोक्ता को केवल पार्किंग की जगह और बिजली का कनेक्शन उपलब्ध कराना होता है. जहां बिजली उपलब्ध नहीं होती, वहां हम जनरेटर की व्यवस्था कर सकते हैं. इसके बाद संगठन के हेल्थ और सेफ्टी प्रोग्राम के तहत जरूरी सभी जांच साइट पर ही की जाती हैं. इससे कामकाज में कम बाधा आती है और बड़ी संख्या में कर्मचारी आसानी से अनिवार्य स्वास्थ्य जांच पूरी कर पाते हैं.
मोबाइल मेडिकल चेक-अप बस के अंदर कौन-कौन सी सुविधाएं उपलब्ध हैं?
बस को सात कार्यात्मक क्षेत्रों के साथ एक पूर्ण डायग्नोस्टिक यूनिट के रूप में डिजाइन किया गया है. इनमें रजिस्ट्रेशन, विजन स्क्रीनिंग, साउंडप्रूफ ऑडियोमेट्री केबिन, ब्लड कलेक्शन एरिया, ECG केबिन, डॉक्टर का एग्जामिनेशन केबिन, फेफड़ों की कार्यक्षमता जांचने का क्षेत्र और रेडिएशन से सुरक्षित डिजिटल एक्स-रे रूम शामिल हैं.
हम फिजिकल एग्जामिनेशन, नजदीक और दूर की दृष्टि जांच, कलर विजन स्क्रीनिंग, ऑडियोमेट्री, पल्मोनरी फंक्शन टेस्ट, ECG, डिजिटल चेस्ट एक्स-रे और कई तरह की ब्लड व यूरिन जांच कर सकते हैं. इंडस्ट्री के आधार पर जांच का दायरा कंप्लीट ब्लड काउंट, ब्लड शुगर और ब्लड ग्रुप जैसी बुनियादी जांचों से लेकर किडनी और लिवर फंक्शन, लिपिड प्रोफाइल, HbA1c और ब्लड-लेड टेस्ट जैसी विशेष जांचों तक हो सकता है.
एक दिन में कितने कर्मचारियों की जांच की जा सकती है और प्रत्येक चेक-अप में कितना समय लगता है?
जब कोई कर्मचारी जांच प्रक्रिया में प्रवेश करता है तो पूरा एग्जामिनेशन सामान्य तौर पर 25 से 30 मिनट में पूरा हो जाता है. अलग-अलग स्टेशनों पर योजनाबद्ध क्रम में कई टेस्ट एक साथ किए जा सकते हैं. ऐसे में एक बस आमतौर पर एक दिन में करीब 120 से 150 कर्मचारियों की जांच कर सकती है, हालांकि यह टेस्ट पैकेज और साइट की परिस्थितियों पर निर्भर करता है.
नियोक्ताओं के लिए यह इस मॉडल का सबसे बड़ा फायदा है. सैकड़ों या हजारों कर्मचारियों को जांच के लिए अस्पताल भेजने में एक या दो कार्यदिवस खर्च हो सकते हैं और उत्पादन भी प्रभावित हो सकता है. सुविधा को सीधे कार्यस्थल पर लाने से कर्मचारी कम से कम समय में जांच कराकर दोबारा काम पर लौट सकते हैं.
इस पहल को इंडस्ट्री से कैसी प्रतिक्रिया मिली है?
जब हमने इसकी शुरुआत की थी, तब प्रतिक्रिया को लेकर कुछ अनिश्चितता थी, क्योंकि पारंपरिक हेल्थ चेक-अप पहले से उपलब्ध थे और इस तरह के विशेष वाहन के लिए काफी बड़ा निवेश करना पड़ता है. प्रत्येक बस को तैयार करने और जरूरी उपकरणों से लैस करने में करीब 1 करोड़ रुपये की लागत आती है. शुरुआत में हमारी दरें कुछ अधिक थीं, लेकिन नियोक्ताओं ने जल्द ही समय की बचत के साथ-साथ रिपोर्ट की गुणवत्ता और एकरूपता का महत्व समझा.
कई संगठन अब करीब 13 वर्षों से लगातार हमारे साथ काम कर रहे हैं. हमने लगभग 12 लाख कर्मचारियों की स्वास्थ्य जांच की है, जिनमें अधिकांश महाराष्ट्र में हैं. पिछले कुछ वर्षों में हमने अपनी सेवाओं का विस्तार पूरे भारत में किया है. हम करीब 50 कर्मचारियों वाली छोटी इकाइयों से लेकर सालाना लगभग 10,000 कर्मचारियों की जांच के ऑर्डर देने वाले बड़े संगठनों तक को सेवाएं दे रहे हैं. लगातार मांग के कारण एक बस से शुरू हुआ यह मॉडल अब पांच बसों तक पहुंच गया है.
किन इंडस्ट्रीज में सबसे अधिक बार ऑक्यूपेशनल हेल्थ एग्जामिनेशन की जरूरत होती है?
जांच की आवृत्ति और दायरा लागू कानून, काम की प्रकृति और जोखिम के स्तर पर निर्भर करता है. कई उद्योगों में सालाना स्वास्थ्य जांच अनिवार्य होती है. फार्मास्युटिकल, केमिकल, पेट्रोकेमिकल और फूड प्रोसेसिंग बिजनेस के साथ-साथ होटल और अन्य निर्दिष्ट प्रतिष्ठानों में उनके संबंधित अनुपालन ढांचे के तहत हर छह महीने में जांच की आवश्यकता हो सकती है.
खतरनाक उद्योगों में विशेष सावधानी की जरूरत होती है, क्योंकि कर्मचारी लंबे समय तक धूल, शोर, रसायनों, धातुओं या अन्य पदार्थों के संपर्क में रह सकते हैं. इसलिए जांच कार्यक्रम सभी के लिए एक जैसा रखने के बजाय प्रत्येक विभाग में मौजूद वास्तविक जोखिमों के आधार पर तैयार किया जाना चाहिए.
जब कोई कर्मचारी हेल्थ चेक-अप के लिए बस में प्रवेश करता है तो प्रक्रिया क्या होती है?
प्रक्रिया की शुरुआत रजिस्ट्रेशन से होती है. हम कर्मचारी के विभाग, भूमिका और उसकी विशिष्ट पहचान संबंधी जानकारी दर्ज करते हैं. दौरे से पहले हम प्रबंधन, सेफ्टी टीम या फैक्ट्री मेडिकल ऑफिसर के साथ मिलकर अलग-अलग श्रेणी के कर्मचारियों के लिए जरूरी जांचों की पहचान करते हैं. इसके बाद कर्मचारी को क्रमवार संबंधित स्टेशनों पर भेजा जाता है.
एक सामान्य प्रोग्राम में फिजिकल एग्जामिनेशन, विजन टेस्ट, ऑडियोमेट्री, फेफड़ों की कार्यक्षमता जांच, ECG, एक्स-रे इमेजिंग और ब्लड व यूरिन सैंपल कलेक्शन शामिल हो सकते हैं. शोर वाले क्षेत्रों में काम करने वाले कर्मचारियों की ऑडियोमेट्री की जाती है. धूल के संपर्क में रहने वाले कर्मचारियों को पल्मोनरी फंक्शन टेस्ट और चेस्ट एक्स-रे की जरूरत हो सकती है, जबकि विशेष रसायनों या धातुओं के साथ काम करने वाले कर्मचारियों को विशेष लैब जांच की आवश्यकता पड़ सकती है. यह जोखिम आधारित दृष्टिकोण जांच को अधिक उपयोगी बनाता है.
रिपोर्ट कितनी जल्दी मिलती है, खासकर जब कोई गंभीर असामान्यता पाई जाती है?
गंभीर मामलों को प्राथमिकता दी जाती है. अगर कोई बड़ी असामान्यता सामने आती है तो हम कर्मचारी और कंपनी प्रबंधन को 12 से 24 घंटे के भीतर और कई बार इससे भी पहले जानकारी दे देते हैं. एक मामले में एक कर्मचारी का ब्लड शुगर स्तर 600 mg/dL से अधिक पाया गया था. सैंपल मिलने के कुछ घंटों के भीतर उसी शाम हमारी लैब ने हमें इसकी जानकारी दी और कर्मचारी को तत्काल अस्पताल में भर्ती कर इलाज के लिए भेजा गया.
रूटीन लैब रिपोर्ट आमतौर पर करीब 48 घंटे के भीतर कर्मचारियों को WhatsApp या ईमेल के जरिए भेज दी जाती है. पूरी अनुपालन डॉक्यूमेंटेशन प्रक्रिया, जिसमें डेटा एंट्री, जहां लागू हो वहां वैधानिक फॉर्म, व्यक्तिगत हेल्थ कार्ड, विश्लेषण और मैनेजमेंट इंफॉर्मेशन सिस्टम रिपोर्ट शामिल हैं, आमतौर पर 10 से 15 दिन में पूरी हो जाती है. मेडिकल फॉलो-अप, रिकॉर्ड और ऑडिट के लिए प्रबंधन को जरूरी सॉफ्ट और हार्ड कॉपी उपलब्ध कराई जाती हैं.
जब कोई असामान्य परिणाम सामने आता है तो उसके बाद आप किस तरह की सहायता देते हैं?
स्क्रीनिंग तभी उपयोगी है, जब उसके बाद समय पर कार्रवाई की जाए. किसी गंभीर असामान्यता की स्थिति में हम तुरंत कर्मचारी और नियोक्ता को सूचित करते हैं, ताकि आवश्यक इलाज या अस्पताल में भर्ती कराने की व्यवस्था की जा सके. कई बड़े संगठनों में फैक्ट्री मेडिकल ऑफिसर और कर्मचारी बीमा की सुविधा होती है और हम आगे के इलाज के लिए इन व्यवस्थाओं के साथ समन्वय करते हैं.
अनियंत्रित डायबिटीज या हाइपरटेंशन जैसी स्थितियों में कर्मचारी को काउंसलिंग, दवाओं की समीक्षा और लंबे समय तक निगरानी की जरूरत हो सकती है. जहां किसी छोटे संगठन के पास इन-हाउस मेडिकल टीम नहीं होती, वहां हमारे अस्पताल के डॉक्टर काउंसलिंग और इलाज के लिए साइट पर जा सकते हैं. यदि कर्मचारी किसी दूसरे शहर में है या आसानी से अस्पताल नहीं पहुंच सकता तो हम टेलीकंसल्टेशन की सुविधा भी देते हैं.
डिजिटल एक्स-रे बस का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है. रेडिएशन से सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की जाती है?
एक्स-रे सेक्शन को रेडिएशन से सुरक्षित एक अलग केबिन के रूप में तैयार किया गया है. इस संरचना में दो मिलीमीटर की लेड शील्डिंग वाला कंपोजिट सिस्टम इस्तेमाल किया गया है, जिससे रेडिएशन कमरे के भीतर ही सीमित रहता है. डिजाइन और उपकरणों का निरीक्षण लागू रेडिएशन सेफ्टी मानकों के तहत किया जाता है और आवश्यक मंजूरी ली जाती है. कार्यात्मक रूप से यह जांच अस्पताल स्थित एक्स-रे सुविधा के समान सुरक्षा और डायग्नोस्टिक मानकों को पूरा करने के लिए डिजाइन की गई है.
डिजिटल टेक्नोलॉजी ने पुराने सिस्टम की तुलना में रेडिएशन डोज को काफी कम किया है और पारंपरिक डार्क रूम की जरूरत भी खत्म कर दी है. इमेज लगभग तुरंत समीक्षा के लिए उपलब्ध हो जाती हैं, जिससे टीम किसी स्पष्ट समस्या की तुरंत पहचान कर कर्मचारी को सलाह दे सकती है. हमारी एक बस में धूल वाले वातावरण में काम करने वाले कर्मचारियों के लिए विशेष चेस्ट इमेजिंग की जरूरत को पूरा करने वाला हाई-फ्रीक्वेंसी, हाई-डेफिनिशन सिस्टम भी मौजूद है.
स्थिर और सटीक जांच सुनिश्चित करने के लिए बस को किस तरह डिजाइन किया गया है?
यह वाहन करीब 40 फीट लंबा है, जिसमें लगभग 34 फीट का उपयोगी क्लिनिकल स्पेस है. साइट पर पहुंचने के बाद हाइड्रोलिक जैक की मदद से इसे ऊपर उठाकर स्थिर किया जाता है, ताकि बस के भीतर होने वाली हलचल ब्लड कलेक्शन, ECG रिकॉर्डिंग या अन्य जांचों को प्रभावित न करे.
सटीकता के लिए वातावरण और उपकरण दोनों महत्वपूर्ण हैं. ऑडियोमेट्री साउंडप्रूफ केबिन में की जाती है. ब्लड सैंपल को 2 से 8 डिग्री सेल्सियस के तापमान नियंत्रित रेफ्रिजरेटर में रखा जाता है, ताकि जांच के पैरामीटर स्थिर रहें. वाहन के भीतर पारंपरिक छह मीटर की विजन टेस्टिंग दूरी तैयार करना मुश्किल होता है, इसलिए हम डिजिटल विजन स्कैनर का उपयोग करते हैं. ECG और पल्मोनरी फंक्शन टेस्ट कंप्यूटर आधारित उपकरणों से किए जाते हैं. रजिस्ट्रेशन, सैंपल लेबलिंग, टेस्टिंग, डेटा हैंडलिंग और रिपोर्टिंग के लिए स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर अपनाई जाती हैं, ताकि तकनीकी और पहचान संबंधी त्रुटियों को कम किया जा सके.
आपकी ऑक्यूपेशनल हेल्थ सर्विसेज को किन मंजूरियों और पेशेवर योग्यताओं का समर्थन प्राप्त है?
हमारा काम उन क्षेत्रों के लिए आवश्यक संबंधित मंजूरियों के तहत किया जाता है, जिन्हें हम सेवाएं प्रदान करते हैं. मुझे महाराष्ट्र सरकार द्वारा औद्योगिक कर्मचारियों की मेडिकल जांच के लिए सर्टिफाइंग सर्जन के रूप में मान्यता प्राप्त है. इसके अलावा, मेरे पास समुद्री कर्मचारियों और ऑफशोर या ऑनशोर कर्मियों की जांच के लिए डायरेक्टोरेट जनरल ऑफ शिपिंग की मंजूरी है, साथ ही पोर्ट और केंद्रीय श्रम से जुड़े ऑक्यूपेशनल हेल्थ कार्यों के लिए भी संबंधित योग्यताएं हैं.
हम अंतरराष्ट्रीय तेल और गैस तथा समुद्री आवश्यकताओं के अनुरूप जांच भी करते हैं, जिनमें विदेशों और ऑफशोर वातावरण में काम करने वाले कर्मचारियों के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले मानक शामिल हैं. हमारी सेवाओं में लागू नियामकीय आवश्यकताओं के तहत फूड और होटल सेक्टर के कर्मचारियों की मेडिकल जांच भी शामिल है. ये मंजूरियां महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि ऑक्यूपेशनल फिटनेस सर्टिफिकेट नियोक्ता, ऑडिटर और संबंधित प्राधिकरण के लिए विश्वसनीय और स्वीकार्य होना चाहिए.
एक इंडस्ट्री से दूसरी इंडस्ट्री में स्वास्थ्य जोखिम किस तरह अलग होते हैं?
हर कर्मचारी के लिए सामान्य फिटनेस का एक बुनियादी आकलन जरूरी होता है, जिसमें भूमिका के अनुसार ऊंचाई, वजन, बॉडी मास इंडेक्स, ब्लड प्रेशर, दृष्टि, हीमोग्लोबिन, ब्लड शुगर, ECG और सुनने की क्षमता की जांच शामिल हो सकती है. इसके अलावा टेस्टिंग कार्यस्थल पर मौजूद जोखिमों के अनुसार होनी चाहिए.
पेट्रोकेमिकल और केमिकल वातावरण में रसायनों का संपर्क लिवर या किडनी को प्रभावित कर सकता है, इसलिए लिवर और रीनल फंक्शन टेस्ट महत्वपूर्ण हो जाते हैं. स्टील और मेटल प्रोसेसिंग यूनिट्स में लेड के संपर्क के कारण ब्लड-लेड टेस्ट की जरूरत हो सकती है. अधिक धूल वाले कार्यस्थलों पर फेफड़ों की कार्यक्षमता जांच और विशेष चेस्ट एक्स-रे जरूरी हो सकते हैं. अत्यधिक जोखिम वाली जगहों पर जांच अधिक बार करनी पड़ सकती है. यदि किसी तरह का ट्रेंड या असामान्यता सामने आती है तो मेडिकल मॉनिटरिंग, कर्मचारी को उस जोखिम वाले स्थान से हटाने और जोखिम को उसके स्रोत पर कम करने के लिए इंजीनियरिंग उपायों की सिफारिश की जा सकती है.
आप किन ऑक्यूपेशनल बीमारियों को लेकर सबसे ज्यादा चिंतित हैं?
सिलिका, एस्बेस्टस और अन्य औद्योगिक धूल के लंबे समय तक संपर्क में रहने से सिलिकोसिस और न्यूमोकोनियोसिस सहित गंभीर और कई बार अपरिवर्तनीय फेफड़ों की बीमारियां हो सकती हैं. खदानों, टाइल निर्माण और अत्यधिक धूल वाले अन्य उद्योगों में काम करने वाले कर्मचारी विशेष रूप से जोखिम में हो सकते हैं, यदि पर्याप्त सुरक्षा उपाय और निगरानी न हो.
अधिक शोर वाले वातावरण में काम करने से नॉइज-इंड्यूस्ड हियरिंग लॉस हो सकता है. रसायनों के संपर्क से लिवर या किडनी को नुकसान पहुंच सकता है, जबकि कुछ पदार्थों के लंबे समय तक संपर्क से ऑक्यूपेशनल कैंसर और त्वचा संबंधी बीमारियों का जोखिम बढ़ सकता है.
चुनौती यह है कि कई ऑक्यूपेशनल बीमारियां धीरे-धीरे विकसित होती हैं और शुरुआती चरण में स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देते. नियमित और जोखिम-विशिष्ट स्क्रीनिंग के जरिए समस्या को पहले पहचाना जा सकता है और नुकसान गंभीर होने से पहले सुधारात्मक कदम उठाए जा सकते हैं.
कर्मचारियों में लाइफस्टाइल से जुड़ी कौन-सी बड़ी स्वास्थ्य समस्याएं सामने आ रही हैं?
ऑक्यूपेशनल स्क्रीनिंग में अब कार्यस्थल से जुड़े जोखिमों के साथ-साथ लाइफस्टाइल से जुड़ी बीमारियां भी तेजी से सामने आ रही हैं. हमारे अनुभव में, जांच किए गए करीब 15 फीसदी कर्मचारियों में डायबिटीज हो सकती है, जबकि अन्य 8 से 10 फीसदी कर्मचारियों में इसका जोखिम या बढ़ा हुआ शुगर लेवल देखा जा सकता है. लगभग 15 से 20 फीसदी कर्मचारियों में हाइपरटेंशन और करीब 10 से 15 फीसदी में दृष्टि संबंधी असामान्यताएं देखी जाती हैं, हालांकि ये आंकड़े कार्यबल और इंडस्ट्री के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं. मोटापा, खराब खानपान, तनाव और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी चिंताएं भी बढ़ रही हैं.
इसी वजह से कई संगठन अब विस्तृत वार्षिक हेल्थ पैकेज की मांग कर रहे हैं, जिनमें फास्टिंग और पोस्ट-मील ब्लड शुगर, HbA1c, लिपिड प्रोफाइल और लिवर फंक्शन टेस्ट शामिल होते हैं. कार्यस्थल स्वास्थ्य कार्यक्रम अब सिर्फ वैधानिक अनुपालन तक सीमित नहीं रह सकते. उन्हें कर्मचारियों को पुरानी बीमारियों को समझने और उन्हें मैनेज करने में भी मदद करनी होगी.
भारत में प्रिवेंटिव और ऑक्यूपेशनल हेल्थकेयर को लेकर आपका व्यापक विजन क्या है?
हेल्थकेयर को अधिक सक्रिय और प्रोएक्टिव बनना होगा. किसी कर्मचारी के बीमार पड़ने का इंतजार करना और उसके बाद उसे अस्पताल भेजना एक रिएक्टिव मॉडल है. डायग्नोस्टिक सुविधाओं को कार्यस्थल तक पहुंचाकर हम बड़ी संख्या में लोगों की प्रभावी तरीके से स्क्रीनिंग कर सकते हैं, जोखिमों की शुरुआती पहचान कर सकते हैं और व्यक्ति व संगठन दोनों के लिए उपयोगी स्वास्थ्य डेटा तैयार कर सकते हैं.
मेरा विजन एक्सेसिबिलिटी, टेक्नोलॉजी, क्लिनिकल एक्यूरेसी और फॉलो-अप को एक साथ जोड़ने का है. एक मोबाइल यूनिट का काम सिर्फ टेस्ट करना नहीं होना चाहिए, बल्कि उसे प्रिवेंशन, काउंसलिंग, समय पर रेफरल और लंबे समय तक निगरानी में भी सहयोग देना चाहिए. अगर नियोक्ता ऑक्यूपेशनल हेल्थ को सिर्फ एक कंप्लायंस एक्सरसाइज के बजाय कर्मचारियों में निवेश के रूप में देखें, तो इसका लाभ कर्मचारी कल्याण, उत्पादकता और संगठन की मजबूती के रूप में दिखाई देगा.
रुहैल आमीन, BW रिपोर्टर्स
(रुहैल अमीन, BW Businessworld में सीनियर एडिटर हैं और नई दिल्ली में आधारित एक अनुभवी पत्रकार हैं. वे अपने गहन विश्लेषण और विस्तृत रिपोर्टिंग के लिए जाने जाते हैं. उनका कार्य पत्रकारिता की निष्पक्षता और उत्कृष्ट कहानी कहने की प्रतिबद्धता को दर्शाता है, जिसने उन्हें उद्योग में एक विश्वसनीय आवाज के रूप में स्थापित किया है. उनके योगदान विभिन्न प्लेटफॉर्म्स पर फैले हुए हैं, जहां वे लगातार ऐसी सामग्री प्रस्तुत करते हैं जो पाठकों को जानकारी देने के साथ-साथ उन्हें जोड़कर भी रखती है.)
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