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विदेशी पूंजी की बाढ़ और RBI के सामने पैसों को संभालने की चुनौती
समस्याओं की भरमार से भरमार की समस्या तक
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 2 hours ago
कल्पना कीजिए कि आप सुबह उठते हैं और देखते हैं कि आपका बैंक खाता रातोंरात भर गया है, किसी लॉटरी के जैकपॉट से नहीं, बल्कि विदेशों से तेजी से आ रही धन की एक शक्तिशाली लहर से. अधिकांश लोगों के लिए यह किसी सपने जैसा होगा. लेकिन RBI के लिए यह वास्तविक समय में नीति संबंधी सिरदर्द है. महज पिछले 3 महीनों में, भारत ने विदेशी मुद्रा जमा और विदेशी उधारी के लिए विशेष स्वैप विंडो के कारण 136 अरब डॉलर का प्रभावशाली विदेशी प्रवाह आकर्षित किया है. यह उछाल निस्संदेह भारत की व्यापक आर्थिक मजबूती में भरोसे का संकेत है. लेकिन इसने केंद्रीय बैंक के सामने एक नाजुक और तत्काल सवाल भी खड़ा कर दिया है: इस प्रचुर धन को अतिरिक्त तरलता में बदलने से कैसे रोका जाए, जो बैंकिंग प्रणाली में प्रवाहित होकर मौद्रिक नियंत्रण को कमजोर कर सकती है और संभावित रूप से महंगाई के दबाव को बढ़ा सकती है.
₹12 लाख करोड़ की तरलता से बढ़ा दबाव
तरलता की यह प्रचुरता एक चुनौतीपूर्ण समय पर आई है. वैश्विक बॉन्ड यील्ड दशकों के उच्चतम स्तर पर हैं, अमेरिकी फेडरल रिजर्व ब्याज दरों को लेकर आक्रामक रुख अपना रहा है और घरेलू स्तर पर महंगाई बढ़ने की ओर है, जिससे RBI की आरामदायक स्थिति प्रभावित हो रही है. जब करीब ₹12 लाख करोड़ बैंकिंग प्रणाली में प्रवाहित हो रहे हों, तो RBI के दर संबंधी कदमों का असर कम होने का जोखिम है. अतिरिक्त नकदी पर बैठे बैंक आक्रामक तरीके से कर्ज देते रह सकते हैं, जिससे केंद्रीय बैंक मांग को ठंडा करने की कोशिश के बावजूद ऋण का विस्तार जारी रह सकता है. इसका नतीजा यह होगा कि महंगाई का दबाव बना रहेगा, मौद्रिक संचरण कमजोर होगा और कीमतों को स्थिर रखने की RBI की लड़ाई कहीं अधिक कठिन हो जाएगी.
CMBs और T-Bills से शुरुआत कर सकता है RBI
तो RBI क्या कर सकता है? केंद्रीय बैंक के पास कई उपायों का एक टूलकिट है, जिनमें से प्रत्येक की अपनी ताकत और कमियां हैं और किसी उपाय का चुनाव स्थिति पर निर्भर करता है. फिलहाल, RBI के शॉर्ट-टर्म उपायों से शुरुआत करने की उम्मीद है. कैश मैनेजमेंट बिल्स (CMBs) और ट्रेजरी बिल्स सरकार को दिए जाने वाले शॉर्ट-टर्म लोन की तरह हैं. जब बैंक इन्हें खरीदते हैं, तो उनका पैसा अस्थायी रूप से लॉक हो जाता है, जिससे अतिरिक्त तरलता को सोखने में मदद मिलती है. मार्केट स्टेबिलाइजेशन स्कीम (MSS) एक अन्य विकल्प है, जिसमें RBI विशेष बॉन्ड जारी करता है और उससे प्राप्त राशि को एक अलग खाते में रखता है, जो सरकारी खर्च के लिए उपलब्ध नहीं होती. फिलहाल सरकारी नकदी शेष अधिक होने के कारण MSS विशेष रूप से उपयोगी है, हालांकि इसके लिए संसदीय मंजूरी की आवश्यकता होती है, जिससे प्रक्रिया धीमी हो सकती है. यही कारण है कि CMBs और T-Bills रक्षा की पहली पंक्ति होने की संभावना है, वे तेजी से और आसानी से लागू किए जा सकते हैं.
I-CRR की वापसी से प्रोत्साहन प्रभावित होने का खतरा
इन्क्रीमेंटल कैश रिजर्व रेशियो (I-CRR) को फिर से लागू करने की भी चर्चा हुई है, जिसके तहत बैंकों को अपनी जमा राशि का अधिक हिस्सा RBI के पास रखना होगा, जिससे तुरंत तरलता कम हो जाएगी. लेकिन अब यह कदम काफी कठिन लगता है. RBI ने अपनी हालिया स्वैप योजनाओं के जरिए जुटाई गई जमाराशियों को ऐसी आवश्यकताओं से छूट दी है, इसलिए I-CRR को फिर से लागू करना उन प्रोत्साहनों को कमजोर करेगा, जिन्होंने सबसे पहले इन विदेशी प्रवाहों को आकर्षित किया था. साथ ही, वे बैंक जिन्हें डॉलर की तरलता की इस तेजी से कोई लाभ नहीं मिला है, उन्हें बिना किसी गलती के दंडित महसूस होगा.
OMO और डॉलर बिक्री से अतिरिक्त तरलता पर लगाम
यदि अतिरिक्त तरलता बनी रहती है, तो RBI अधिक टिकाऊ उपायों की ओर रुख कर सकता है. ओपन मार्केट ऑपरेशंस (OMO) बिक्री में RBI अपने पास पहले से मौजूद सरकारी बॉन्ड बैंकों को बेचता है, जिससे लंबे समय के लिए पैसा सिस्टम से बाहर हो जाता है. केंद्रीय बैंक अपने भंडार से अमेरिकी डॉलर भी बेच सकता है, जिससे रुपये की मात्रा को प्रचलन से बाहर निकालने और मुद्रा के मूल्य को प्रबंधित करने में मदद मिलेगी. हालांकि, इन कदमों के साथ जोखिम भी जुड़े हैं. आक्रामक OMO बिक्री ब्याज दरों को बढ़ा सकती है, जिससे सभी के लिए कर्ज महंगा हो सकता है, जबकि बड़े पैमाने पर डॉलर की बिक्री भारत के विदेशी मुद्रा भंडार को कम कर सकती है, जो अनिश्चित समय में एक जोखिम भरा कदम है. FX सेल/बाय स्वैप, जिसमें RBI अस्थायी रूप से डॉलर के बदले रुपये लेता है, एक बीच का रास्ता पेश करते हैं, लेकिन इनके अत्यधिक इस्तेमाल से भविष्य के मुद्रा बाजारों में लागत बढ़ सकती है.
2013 और 2000 के अनुभवों से RBI को मिले सबक
आज RBI का दृष्टिकोण अतीत से मिले सबक से आकार ले रहा है. 2013 में, जब विदेशी प्रवाह बढ़ गया था और रुपया अस्थिर हो गया था, तब केंद्रीय बैंक ने स्थिति को स्थिर करने के लिए MSS बॉन्ड, I-CRR और डॉलर बिक्री के मिश्रण का इस्तेमाल किया था. 2000 में, इंडिया मिलेनियम डिपॉजिट्स प्रकरण के दौरान, RBI ने बड़े विदेशी मुद्रा प्रवाह के प्रभाव को निष्प्रभावी करने के लिए MSS और OMOs को मिलाकर इस्तेमाल किया था. ये अनुभव दिखाते हैं कि सभी परिस्थितियों के लिए एक ही समाधान नहीं हो सकता. RBI को हर स्थिति की विशिष्ट परिस्थितियों के अनुरूप उपायों का मिश्रण तैयार करना होगा.
शॉर्ट-टर्म उपायों को प्राथमिकता, बड़े हथियार सुरक्षित
अब जो बात सबसे अलग नजर आती है, वह यह है कि RBI तत्काल अतिरिक्त तरलता को सोखने के लिए लचीले, शॉर्ट-टर्म उपायों से शुरुआत करने को प्राथमिकता दे रहा है, जबकि अतिरिक्त तरलता लंबे समय तक बनी रहने की स्थिति में अधिक शक्तिशाली उपायों को सुरक्षित रख रहा है. नीति में निरंतरता बेहद महत्वपूर्ण है - हाल की योजनाओं के प्रोत्साहनों के विपरीत जाने वाले उपायों को फिर से लागू करना उलटा असर डाल सकता है. समय और लचीलापन भी मायने रखते हैं, क्योंकि RBI को बाजारों में घबराहट पैदा करने या विकास को कमजोर करने से बचने के लिए अपने कदमों को सावधानी से तय करना होगा.
RBI के लिए असली चुनौती भरोसा बनाए रखना
अंततः, RBI की चुनौती सिर्फ आंकड़ों और तकनीकी पहलुओं से जुड़ी नहीं है, बल्कि भरोसे से भी जुड़ी है. हर कदम बाजारों, बैंकों और आम नागरिकों को एक संकेत देता है. बहुत अधिक सावधानी बरती गई, तो महंगाई फिर बढ़ सकती है. बहुत अधिक आक्रामकता दिखाई गई, तो उधारी की लागत बढ़ सकती है, जिससे विकास को नुकसान पहुंचेगा. केंद्रीय बैंक की कुशलता सही समय पर सही उपकरण का इस्तेमाल करने, पिछले अनुभवों से सीखने और स्थिर हाथ से पतवार संभालने में है. अंत में, अप्रत्याशित रूप से मिली भरपूर धनराशि का प्रबंधन करना सूखे से निपटने जितना ही कठिन है. RBI के लिए आने वाले महीने इस क्षमता की परीक्षा लेंगे कि वह भरमार की समस्या को स्थिरता की नींव में बदल सके, यह साबित करते हुए कि कभी-कभी संयम ही सबसे शक्तिशाली उपकरण होता है.
अतिथि लेखख: सच्चिदानंद शुक्ला, ग्रुप चीफ इकोनॉमिस्ट, L&T
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