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एन. चंद्रशेखरन के लिए एक राष्ट्रीय भूमिका
असली सवाल यह नहीं है कि ‘क्या एन. चंद्रशेखरन को सरकार में शामिल होना चाहिए’, बल्कि यह है कि ‘भारत यह कैसे सुनिश्चित कर सकता है कि चंद्रा जैसे लोग कॉरपोरेट जीवन से विदा लेने के बाद भी लंबे समय तक भारत के लिए योगदान देते रहें?’
डॉ. अनुराग बत्रा 3 hours ago
हर बार जब कोई सफल कॉरपोरेट नेता एक लंबे और सफल करियर को पूरा करता है, तो हमेशा यह सवाल उठता है कि अब आगे क्या? क्या वह कॉरपोरेट बोर्ड्स में बने रहते हैं, सलाहकार बनते हैं, किताब लिखते हैं, अगली पीढ़ी का मार्गदर्शन करते हैं या शायद सार्वजनिक जीवन में प्रवेश करते हैं?
एन. चंद्रशेखरन, जो भारत के सबसे प्रमुख कॉरपोरेट नेताओं में से एक हैं, इसका एक दिलचस्प उदाहरण हैं. बिजनेस, टेक्नोलॉजी और संस्थान निर्माण में उनके व्यापक अनुभव को देखते हुए, इसमें कोई संदेह नहीं है कि अगर वह सरकार में कोई जिम्मेदारी संभालते हैं, तो वह सार्थक योगदान दे सकते हैं. टेक्नोलॉजी, प्रबंधन और बड़े संस्थानों के कामकाज की उनकी समझ ऐसे समय में मूल्यवान हो सकती है, जब शासन व्यवस्था खुद लगातार जटिल होती जा रही है.
लेकिन मेरे विचार में असली सवाल यह नहीं है कि चंद्रा को सरकार में शामिल होना चाहिए या नहीं.
इससे भी महत्वपूर्ण सवाल यह है कि जब ऐसे लोगों का कॉरपोरेट करियर खत्म हो जाता है, जिन्होंने दशकों तक कारोबार, संस्थानों और टेक्नोलॉजी प्लेटफॉर्म्स का निर्माण किया है, तो भारत उनके अनुभव का क्या करता है?
भारत में नेतृत्व की अप्रयुक्त क्षमता
पिछले कुछ दशकों में भारतीय कंपनियों ने ऐसे नेताओं को तैयार किया है, जिन्होंने महाद्वीपों के स्तर पर कारोबार का प्रबंधन किया है, लाखों लोगों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले टेक्नोलॉजी प्लेटफॉर्म बनाए हैं, रोजगार पैदा किए हैं, संकटों को संभाला है, सरकारों और नियामकों के साथ काम किया है और वैश्विक बाजारों में सफलतापूर्वक प्रतिस्पर्धा की है.
इसके अलावा वैज्ञानिक, शिक्षाविद, उद्यमी, टेक्नोक्रेट, डॉक्टर, इंजीनियर और ऐसे पेशेवर भी हैं, जिन्होंने अपने-अपने क्षेत्रों में कठिन समस्याओं को हल करने में अपना पूरा जीवन लगा दिया है. भारत ने पारंपरिक राजनीतिक व्यवस्था से बाहर ज्ञान और अनुभव का एक विशाल भंडार तैयार किया है.
फिर भी, जब इनमें से कई लोग अपने औपचारिक करियर से दूर हो जाते हैं, तो उनके अनुभव को सरकार में संरचित और सार्थक तरीके से बहुत कम इस्तेमाल किया जाता है.
शायद हमें इसे बदलने की जरूरत है.
आज सरकार केवल प्रशासन तक सीमित नहीं है. यह विशाल टेक्नोलॉजी प्रणालियों के प्रबंधन, डिजिटल बुनियादी ढांचे के निर्माण, साइबर सुरक्षा को मजबूत करने, स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा में बदलाव लाने, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से निपटने, विनिर्माण क्षमताओं को विकसित करने, निवेश आकर्षित करने और तेजी से बदलती वैश्विक अर्थव्यवस्था में प्रतिस्पर्धा करने के बारे में भी है.
राजनीतिक नेतृत्व शासन व्यवस्था के लिए हमेशा केंद्रीय रहेगा. लेकिन राजनीतिक नेतृत्व का यह अर्थ नहीं है कि सरकार को पेशेवर विशेषज्ञता के लाभ के बिना काम करना होगा.
वास्तव में, दोनों एक-दूसरे के पूरक हो सकते हैं.
जब कॉरपोरेट अनुभव का शासन व्यवस्था से मेल होता है
मौजूदा सरकार पहले ही यह दिखा चुकी है कि पारंपरिक राजनीति से बाहर पेशेवर अनुभव रखने वाले लोग सार्वजनिक जीवन में महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभा सकते हैं.
अश्विनी वैष्णव इसका एक उदाहरण हैं. इंजीनियरिंग, प्रबंधन और प्रशासन में उनकी पृष्ठभूमि ने उन्हें ऐसा दृष्टिकोण दिया है, जो टेक्नोलॉजी, रेलवे और संचार जैसे मंत्रालयों के लिए विशेष रूप से प्रासंगिक है. हरदीप सिंह पुरी एक और उदाहरण हैं कि चुनावी राजनीति से बाहर हासिल किए गए अनुभव को सरकार और सार्वजनिक सेवा में कैसे लाया जा सकता है.
ऐसे और भी लोग हैं और उनकी मौजूदगी एक महत्वपूर्ण बात सामने रखती है: पेशेवर विशेषज्ञता और सार्वजनिक सेवा के बीच की सीमाएं कठोर होने की जरूरत नहीं है.
मुद्दा यह नहीं है कि हर सफल कॉरपोरेट अधिकारी को राजनेता बन जाना चाहिए. यह न तो व्यावहारिक है और न ही वांछनीय. राजनीति के लिए एक अलग स्वभाव, समाज की अलग समझ और राजनीतिक व्यवस्था के भीतर काम करने की इच्छा की आवश्यकता होती है.
लेकिन राजनेता बनने और सरकार से पूरी तरह बाहर रहने के बीच एक बड़ा क्षेत्र है.
इस क्षेत्र का कहीं अधिक प्रभावी ढंग से इस्तेमाल किया जा सकता है.
अनुभवी पेशेवर सरकारी समितियों में काम कर सकते हैं, मंत्रालयों को सलाह दे सकते हैं, टेक्नोलॉजी मिशनों में योगदान दे सकते हैं, सार्वजनिक संस्थानों के साथ काम कर सकते हैं, प्रणालियों को डिजाइन करने में मदद कर सकते हैं या बड़े कार्यक्रमों को लागू करने के लिए जिम्मेदार लोगों का मार्गदर्शन कर सकते हैं.
नंदन नीलेकणि दिखाते हैं कि क्या संभव है
शायद इस दृष्टिकोण का सबसे मजबूत उदाहरण नंदन नीलेकणि हैं. इंफोसिस के निर्माण में वर्षों तक योगदान देने के बाद, नीलेकणि सार्वजनिक सेवा में आए और उन्हें आधार कार्यक्रम का नेतृत्व करने की विशाल जिम्मेदारी दी गई. यह ऐसी व्यापकता और जटिलता वाली परियोजना थी, जिसे निजी क्षेत्र या सरकार में इससे पहले बहुत कम लोगों ने करने का प्रयास किया था.
नीलेकणि के योगदान का महत्व केवल यह नहीं था कि वह कॉरपोरेट जगत से आए थे. महत्व यह था कि वह अपने साथ बड़े टेक्नोलॉजी सिस्टम बनाने और जटिल संगठनों के प्रबंधन का अनुभव लेकर आए थे.
और उनका अनुभव उस विशेष जिम्मेदारी से आगे भी प्रासंगिक बना हुआ है.
जब सरकार को टेक्नोलॉजी, सिस्टम और सुरक्षा से जुड़ी विशेषज्ञता की जरूरत होती है, तो इस तरह के अनुभव वाले लोगों से अब भी मदद ली जा सकती है. पेपर लीक की चिंताओं के बाद परीक्षा प्रणालियों और सुरक्षा को मजबूत करने से जुड़ी चर्चाओं में उनकी भागीदारी इस बात की एक और याद दिलाती है कि किसी व्यक्ति के औपचारिक कॉरपोरेट या सरकारी पद से हटने के लंबे समय बाद भी उसकी पेशेवर विशेषज्ञता उपयोगी रह सकती है.
यह एक महत्वपूर्ण सीख है.
सिर्फ इसलिए कि किसी व्यक्ति ने नौकरी से सेवानिवृत्ति ले ली है, उसके अनुभव की कोई समाप्ति तिथि नहीं होनी चाहिए.
राजनीति से आगे, सार्वजनिक सेवा भी है
शायद भारत को एक ऐसी अधिक लचीली व्यवस्था बनाने की जरूरत है, जहां अनुभवी लोग पूर्णकालिक राजनेता बने बिना सार्वजनिक सेवा में आ-जा सकें.
एक पूर्व सीईओ किसी मंत्रालय को सलाह दे सकता है. कोई टेक्नोलॉजी उद्यमी सरकारी प्लेटफॉर्म बनाने में मदद कर सकता है. कोई वैज्ञानिक राष्ट्रीय मिशन में योगदान दे सकता है. कोई अर्थशास्त्री नीति निर्माण पर काम कर सकता है. कोई शिक्षाविद शिक्षा में सुधार लाने में मदद कर सकता है. कोई पूर्व बैंकर वित्तीय समावेशन पर सलाह दे सकता है. कोई अनुभवी प्रशासक राज्य सरकार को कार्यान्वयन बेहतर बनाने में मदद कर सकता है.
इनमें से किसी के लिए भी चुनाव लड़ना जरूरी नहीं है.
जरूरत इस बात की है कि सरकार यह पहचाने कि उनका अनुभव कहां बदलाव ला सकता है और उनके योगदान के लिए रास्ते तैयार करे.
इससे निजी और सार्वजनिक क्षेत्रों के बीच मौजूद सबसे बड़े अंतर में से एक को पाटने में भी मदद मिल सकती है, नीति तैयार करने और उसे बड़े पैमाने पर वास्तव में लागू करने के बीच का अंतर.
कॉरपोरेट भारत ने दशकों तक यह सीखा है कि किसी काम को कैसे लागू किया जाए. सरकार की जिम्मेदारी अलग और कहीं बड़ी है, लेकिन वह निश्चित रूप से इनमें से कुछ सीखों से लाभ उठा सकती है.
चंद्रा शुरुआत हो सकते हैं, पूरी कहानी नहीं
यह हमें फिर चंद्रा के पास ले आता है. मुझे नहीं पता कि राजनीति में प्रवेश करने या सरकार में कोई औपचारिक पद संभालने का उनका कोई इरादा है या नहीं. हो सकता है कि वह अपने जीवन के अगले अध्याय को पूरी तरह किसी और चीज के लिए समर्पित करने का फैसला करें. यह पूरी तरह उनकी पसंद है.
लेकिन अगर वह सार्वजनिक जीवन में योगदान देने का फैसला करते हैं, तो मेरा मानना है कि उनका खुले दिल से स्वागत किया जाएगा.
और शायद यही वजह है कि उनका नाम इस चर्चा के लिए इतना दिलचस्प शुरुआती बिंदु बनता है.
कहानी वास्तव में इस बारे में नहीं है कि चंद्रा को राजनेता बनना चाहिए या नहीं. यह इस बारे में है कि क्या भारत राजनीति से बाहर तैयार हुए अनुभव के विशाल भंडार का पर्याप्त उपयोग कर रहा है.
हमने दशकों तक देश के कुछ सबसे सक्षम कॉरपोरेट और पेशेवर नेताओं को तैयार किया है. हमने उन्हें कंपनियां, संस्थान, टेक्नोलॉजी प्लेटफॉर्म और वैश्विक कारोबार बनाने का अवसर दिया है.
तो फिर उनके कॉरपोरेट करियर के खत्म होने के साथ देश के लिए उनका योगदान भी क्यों खत्म हो जाना चाहिए?
भारत ऐसे दौर में प्रवेश कर रहा है, जहां शासन व्यवस्था की जटिलता केवल बढ़ेगी. देश को राजनीतिक दृष्टिकोण की जरूरत होगी, लेकिन उसे विशेषज्ञता, संस्थागत स्मृति, टेक्नोलॉजी के ज्ञान और काम को लागू करने की क्षमता की भी जरूरत होगी.
शायद इसलिए शासन व्यवस्था की अगली पीढ़ी राजनेताओं और पेशेवरों के बीच चयन करने के बारे में नहीं होगी.
यह दोनों की सर्वश्रेष्ठ क्षमताओं को एक साथ लाने के बारे में होगी.
चंद्रा इस यात्रा का हिस्सा बनें या न बनें. लेकिन अगर उनका अनुभव इस बारे में एक व्यापक चर्चा को जन्म देता है कि भारत पेशेवर प्रतिभा के अपने विशाल भंडार का उपयोग कैसे कर सकता है, तो यह चर्चा इस बात पर बहस करने से कहीं अधिक मूल्यवान होगी कि किसी एक व्यक्ति को सरकार में शामिल होना चाहिए या नहीं.
क्योंकि अंततः सवाल यह नहीं है कि ‘क्या चंद्रा को सरकार में शामिल होना चाहिए?’
सवाल यह है कि ‘भारत यह कैसे सुनिश्चित कर सकता है कि चंद्रा जैसे लोग कॉरपोरेट जीवन से विदा लेने के लंबे समय बाद भी भारत के लिए योगदान देते रहें?’
डॉ. अनुराग बत्रा, BW रिपोटर्स
(लेखक BW Businessworld Group के चेयरमैन और एडिटर-इन-चीफ तथा exchange4media Group के संस्थापक और एडिटर-इन-चीफ हैं.)
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