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टी. वी. नरेंद्रन: टाटा समूह के अनुभवी अंदरूनी व्यक्ति, जो इसे अगले अध्याय में ले जा सकते हैं

जैसे-जैसे टाटा संस निरंतरता, वित्तीय प्रबंधन और संचालन के अनुभव को महत्व दे रहा है, टाटा स्टील प्रमुख के समूह के भीतर चार दशकों के अनुभव से उन्हें एक अलग बढ़त मिल सकती है.

डॉ. अनुराग बत्रा 16 hours ago

टाटा संस के अगले चेयरमैन की तलाश अब तीन नामों तक सीमित हो गई है और टी. वी. नरेंद्रन भारतीय कारोबार के सबसे प्रतिष्ठित और चुनौतीपूर्ण पदों में से एक के लिए मजबूत दावेदार के रूप में उभरे हैं. उनकी उम्मीदवारी को खास बनाने वाली बात सिर्फ यह नहीं है कि उन्होंने टाटा समूह के साथ लगभग चार दशक बिताए हैं, बल्कि यह भी है कि इन वर्षों में उन्होंने कारोबार के संचालन पक्ष पर काम किया और अंततः समूह की सबसे बड़ी और सबसे जटिल कंपनियों में से एक का नेतृत्व किया.

शॉर्टलिस्ट इस चुनाव को इसलिए भी दिलचस्प बनाती है क्योंकि नरेंद्रन और सौरभ अग्रवाल दोनों टाटा समूह के अंदरूनी लोग हैं, हालांकि समूह में दोनों का करियर काफी अलग रहा है. टाटा संस के ग्रुप CFO अग्रवाल एक बेहद सम्मानित वित्त और रणनीति पेशेवर हैं, जो समूह को उसके वित्तीय और पूंजी आवंटन केंद्र से समझते हैं. नरेंद्रन एक अलग तरह का नेतृत्व पेश करते हैं. वह टाटा के ऐसे ऑपरेटिंग व्यक्ति हैं, जिन्होंने वास्तव में एक बड़े कारोबार को चलाया है.

टाटा के भीतर बना करियर

नरेंद्रन ने NIT तिरुचिरापल्ली से मैकेनिकल इंजीनियरिंग और IIM कलकत्ता से MBA पूरा करने के बाद 1988 में टाटा स्टील जॉइन की. उनके करियर में अंतरराष्ट्रीय व्यापार, मार्केटिंग, बिक्री, सप्लाई चेन और वरिष्ठ प्रबंधन जैसे क्षेत्र शामिल रहे. उन्होंने दुबई में पांच साल बिताए, जहां वह मध्य पूर्व में टाटा स्टील के निर्यात का काम देखते थे और बाद में टाटा टिस्कॉन तथा उसके डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क को तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

ये उनके कॉर्पोरेट करियर की सीढ़ी पर महज पड़ाव नहीं थे. इन अनुभवों ने उन्हें कारोबार को जमीनी स्तर से समझने का अवसर दिया, जिसमें ग्राहक, बाजार और लोग से लेकर संचालन और प्रतिस्पर्धा तक शामिल हैं. इसके बाद वह वरिष्ठ नेतृत्व की भूमिका में पहुंचे और टाटा स्टील के CEO और मैनेजिंग डायरेक्टर बने, जहां उन्होंने वैश्विक स्तर पर कारोबार और बड़ी परिचालन तथा पूंजीगत जरूरतों की जिम्मेदारी संभाली.

टाटा संस के लिए उनके नाम पर विचार करते समय यह यात्रा महत्वपूर्ण हो जाती है.

उन्होंने वास्तव में एक बड़ा टाटा कारोबार चलाया है

टाटा संस के चेयरमैन को स्टील, ऑटोमोबाइल, टेक्नोलॉजी, एविएशन या कंज्यूमर कारोबार का विशेषज्ञ होना जरूरी नहीं है. लेकिन उन्हें यह समझना जरूरी है कि किसी बड़े उद्यम को खड़ा करने और चलाने का क्या मतलब होता है.

नरेंद्रन के पास यह अनुभव है.

टाटा स्टील का नेतृत्व करने का मतलब कमोडिटी साइकल, वैश्विक प्रतिस्पर्धा, बड़े पूंजी निवेश, अंतरराष्ट्रीय संचालन और पारंपरिक औद्योगिक कारोबार को लगातार अधिक प्रतिस्पर्धी बनाने की चुनौती से निपटना रहा है. उन्हें ऐसे फैसले लेने पड़े हैं, जिनका असर हजारों कर्मचारियों, ग्राहकों, निवेशकों और अन्य हितधारकों पर पड़ता है.

शायद यही वह क्षेत्र है जहां उन्हें अग्रवाल पर बढ़त मिल सकती है. अग्रवाल की ताकत वित्त, रणनीति और पूंजी आवंटन में है. नरेंद्रन ऐसे व्यक्ति का नजरिया लेकर आते हैं, जो एक बड़ी टाटा ऑपरेटिंग कंपनी के वास्तविक प्रदर्शन के लिए जवाबदेह रहे हैं.

वह केवल टाटा के अंदरूनी व्यक्ति नहीं हैं. वह ऐसे टाटा ऑपरेटिंग लीडर हैं, जिनकी क्षमता बड़े पैमाने पर परखी जा चुकी है.

वह टाटा के तरीके को जानते हैं

समूह में लगभग चार दशक बिताने से मिलने वाला एक और फायदा संस्थागत ज्ञान है. टाटा समूह कोई पारंपरिक कॉन्ग्लोमरेट नहीं है. इसके कारोबार स्टील, ऑटोमोबाइल, IT, एविएशन, कंज्यूमर प्रोडक्ट्स, पावर, होटल, वित्तीय सेवाओं और कई उभरते क्षेत्रों तक फैले हुए हैं. इसके बावजूद समूह एक साझा संस्कृति और मूल्यों के एक ऐसे समूह से जुड़ा है, जो पीढ़ियों के दौरान विकसित हुआ है.

नरेंद्रन इसी माहौल में आगे बढ़े हैं.

वह लोगों, नेतृत्व की संस्कृति और टाटा नाम का प्रतिनिधित्व करने के साथ आने वाली अपेक्षाओं को जानते हैं. वह यह भी समझते हैं कि टाटा कंपनी की प्रतिष्ठा केवल वित्तीय प्रदर्शन से नहीं बनती. भरोसा, गवर्नेंस और कारोबार चलाने का तरीका भी उतना ही महत्वपूर्ण है.

इस तरह का ज्ञान बाहर से जल्दी हासिल करना मुश्किल है.

कहानी सिर्फ टाटा स्टील तक सीमित नहीं

नरेंद्रन की योग्यता टाटा स्टील में उनकी भूमिका से आगे भी जाती है. Confederation of Indian Industry के अध्यक्ष के रूप में उनके कार्यकाल ने उन्हें भारतीय उद्योग की व्यापक समझ दी और सरकार तथा नीति निर्माताओं के साथ उनके संपर्क को भी बढ़ाया. अंतरराष्ट्रीय उद्योग और शैक्षणिक संस्थानों के साथ उनके जुड़ाव ने भी उनके अनुभव का दायरा बढ़ाया है.

अगर वह टाटा संस में जाते हैं तो यह व्यापक अनुभव महत्वपूर्ण होगा, क्योंकि चेयरमैन की भूमिका बोर्डरूम से काफी आगे तक जाती है. टाटा समूह के शीर्ष व्यक्ति को कारोबारी नेताओं, सरकार, निवेशकों, कर्मचारियों और व्यापक समाज के साथ संवाद करना होता है.

नरेंद्रन पहले ही इस व्यापक इकोसिस्टम में काम कर चुके हैं.

इंजीनियर, मैनेजर और संस्थान निर्माता

उनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि भी टाटा समूह के बदलते स्वरूप के अनुरूप है. IIM कलकत्ता से MBA करने वाले इंजीनियर नरेंद्रन तकनीकी समझ को प्रबंधन के अनुभव के साथ जोड़ते हैं.

यह संयोजन ऐसे समय में महत्वपूर्ण है जब टाटा अब केवल एक औद्योगिक समूह नहीं रह गया है. समूह सेमीकंडक्टर्स, इलेक्ट्रॉनिक्स, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी, एविएशन, डिजिटल कारोबार और एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग में महत्वाकांक्षी निवेश कर रहा है.

अगले चेयरमैन को उन पुराने अर्थव्यवस्था वाले कारोबारों को समझना होगा, जो अब भी बड़े पैमाने और नकदी का सृजन करते हैं, साथ ही उन नए कारोबारों को भी समझना होगा जो समूह के भविष्य को आकार देंगे.

नरेंद्रन का करियर उन्हें दोनों के बारे में एक उपयोगी नजरिया दे सकता है.

निरंतरता, लेकिन यथास्थिति नहीं

नरेंद्रन के पक्ष में सबसे मजबूत तर्क शायद यह हो सकता है कि वह यथास्थिति का प्रतिनिधित्व किए बिना निरंतरता प्रदान करते हैं. एन. चंद्रशेखरन के नेतृत्व में टाटा समूह में बड़ा बदलाव आया है. अगले चेयरमैन को उस बदलाव से पैदा हुए परिणामों और अवसरों की जिम्मेदारी संभालनी होगी. बड़े निवेश को आगे बढ़ाना है, नए कारोबार खड़े करने हैं और पूंजी आवंटन से जुड़े मुश्किल फैसले लेने हैं.

नरेंद्रन संस्थान की गहरी समझ लेकर आएंगे, लेकिन उनका करियर चीजों को जैसा है वैसा ही बनाए रखने के इर्द-गिर्द नहीं बना है. टाटा स्टील में उनकी अपनी यात्रा बदलाव और प्रतिस्पर्धा से निपटने की रही है.

यह संतुलन उपयोगी हो सकता है.

ऑपरेटिंग अनुभव क्यों मायने रखता है

सौरभ अग्रवाल की उम्मीदवारी टाटा समूह के आंतरिक नेतृत्व की मजबूती को दर्शाती है. वित्त, रणनीति और पूंजी आवंटन की उनकी गहरी समझ इतने बड़े पैमाने पर निवेश कर रहे समूह के लिए विशेष रूप से उपयोगी होगी. हालांकि, ऐसा लगता है कि तीन लोगों के बीच मुकाबला पहली नजर में जितना बराबरी का दिखाई देता है, शायद उतना नहीं है. अग्रवाल को 2017 में एन. चंद्रशेखरन टाटा संस में लेकर आए थे और तब से उन्होंने समूह की वित्तीय रणनीति, पूंजी आवंटन और पोर्टफोलियो से जुड़े फैसलों के केंद्र में उनके साथ करीबी तौर पर काम किया है. यह अनुभव निश्चित रूप से एक संपत्ति है, हालांकि चयन समिति यह भी विचार कर सकती है कि क्या अगले चरण के लिए ऐसे नेता की जरूरत है, जिसकी संचालन संबंधी पहचान अधिक स्वतंत्र हो.

इस बीच, आशीष चौहान को रिपोर्टों में बाहरी डार्क हॉर्स के रूप में पेश किया गया था, जो टाटा सिस्टम से बाहर कैपिटल मार्केट्स, टेक्नोलॉजी और संस्थान निर्माण का व्यापक अनुभव लेकर आते हैं. NSE ने बाद में सार्वजनिक रूप से इनकार किया कि वह दौड़ में शामिल हैं, जबकि चौहान ने कहा है कि वह एक्सचेंज और उसकी प्रस्तावित लिस्टिंग के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं.

ये बातें नतीजे को तय नहीं करतीं, लेकिन संभावित रूप से नरेंद्रन के पक्ष को मजबूत करती हैं. वह ऐसी चीज लेकर आते हैं, जिसे अन्य दोनों प्रोफाइल बिल्कुल उसी तरह दोहरा नहीं सकते: टाटा का करीब चार दशक का अनुभव, साथ ही एक बड़े टाटा उद्यम को वास्तव में चलाने की जिम्मेदारी.

यह अंतर महत्वपूर्ण हो सकता है.

टाटा संस अंततः पूंजी, रणनीति और गवर्नेंस के बारे में है, लेकिन यह कारोबारों के बारे में भी है. एक बड़े ऑपरेटिंग कंपनी के शीर्ष पर रह चुका व्यक्ति उस दबाव को समझता है, जो रणनीति को अमल में बदलने के साथ आता है.

अगले अध्याय के लिए टाटा के व्यक्ति

बेशक, अभी यह निश्चित नहीं है कि यह पद किसे मिलेगा. अंतिम फैसला टाटा संस की उत्तराधिकार प्रक्रिया के जरिए होगा और यह इस बात को प्रतिबिंबित करेगा कि बोर्ड समूह के अगले चरण के लिए क्या जरूरी मानता है.

लेकिन नरेंद्रन के पक्ष में मामला मजबूत है.

वह टाटा समूह को अंदर से जानते हैं. उन्होंने इसकी प्रमुख कंपनियों में से एक का सफलतापूर्वक नेतृत्व किया है. उन्होंने विभिन्न बाजारों और भौगोलिक क्षेत्रों में काम किया है. उन्होंने उच्चतम स्तर पर भारतीय उद्योग का प्रतिनिधित्व किया है. वह संस्थान की संस्कृति और मूल्यों को समझते हैं और उन्होंने अपने करियर में लगातार बड़ी जिम्मेदारियां संभाली हैं.

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उनके पास संस्थागत स्मृति और संचालन के अनुभव का दुर्लभ संयोजन है.

टाटा समूह एक और महत्वपूर्ण मोड़ पर पहुंच गया है. उसके पास मजबूत आधार, महत्वाकांक्षी नए कारोबार और आगे अवसरों की लंबी सूची है. अगले चेयरमैन को उन चीजों को बनाए रखना होगा जो टाटा को अलग पहचान देती हैं, साथ ही समूह को अनजान क्षेत्रों में ले जाने का आत्मविश्वास भी रखना होगा.

नरेंद्रन का करियर बताता है कि वह इस समीकरण के दोनों पक्षों को समझते हैं.

उन्होंने लगभग चार दशक टाटा के तरीके को सीखने में बिताए हैं. उन्होंने इन दशकों में यह भी साबित किया है कि वह एक कारोबार चला सकते हैं. अगर टाटा संस ऐसे नेता की तलाश में है जो दोनों चीजों को जोड़ सके, तो टी. वी. नरेंद्रन स्वाभाविक विकल्प हो सकते हैं. 

डॉ. अनुराग बत्रा, BW रिपोर्टर्स

(लेखक BW Businessworld Group के चेयरमैन और एडिटर-इन-चीफ तथा exchange4media Group के संस्थापक और एडिटर-इन-चीफ हैं.)


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