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2037-38 की जरूरत की 84% हुई कोल्ड स्टोरेज क्षमता, पैक-हाउस और रीफर वाहनों की भारी कमी: रिपोर्ट
रिपोर्ट में प्रमुख बागवानी उत्पादन केंद्रों के आसपास बहु-वस्तु और अलग-अलग तापमान पर काम करने वाली सुविधाएं विकसित करने की जरूरत बताई गई है. इसके साथ भरोसेमंद रेफ्रिजरेटेड परिवहन नेटवर्क को मजबूत करने पर भी जोर दिया गया है.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 hour ago
भारत ने 2037-38 तक जरूरी कोल्ड स्टोरेज क्षमता का 84 फीसदी हिस्सा हासिल कर लिया है, लेकिन खेत से बाजार तक तापमान-संवेदनशील उत्पादों की सप्लाई चेन अभी भी कई अहम मोर्चों पर कमजोर है. फिक्की और ग्रांट थॉर्नटन भारत की रिपोर्ट के मुताबिक, देश में 8,815 सुविधाओं में कुल 4.022 करोड़ टन कोल्ड स्टोरेज क्षमता मौजूद है, जबकि 2037-38 तक करीब 4.8 करोड़ टन क्षमता की जरूरत होगी.
उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में केंद्रित क्षमता
रिपोर्ट India’s Cold Chain: From Storage to a Chain के अनुसार, मौजूदा कोल्ड स्टोरेज नेटवर्क भारत की कोल्ड चेन के विस्तार के लिए मजबूत आधार देता है, लेकिन इसकी क्षमता कुछ चुनिंदा वस्तुओं और क्षेत्रों में ज्यादा केंद्रित है. करीब तीन-चौथाई कोल्ड स्टोरेज क्षमता का इस्तेमाल आलू के लिए होता है. वहीं, आधे से अधिक कोल्ड स्टोरेज उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में केंद्रित हैं.
रिपोर्ट में प्रमुख बागवानी उत्पादन केंद्रों के आसपास बहु-वस्तु और अलग-अलग तापमान पर काम करने वाली सुविधाएं विकसित करने की जरूरत बताई गई है. इसके साथ भरोसेमंद रेफ्रिजरेटेड परिवहन नेटवर्क को मजबूत करने पर भी जोर दिया गया है.
फिक्की लॉजिस्टिक्स कमेटी के चेयरमैन और डीपी वर्ल्ड के सबकॉन्टिनेंट, सेंट्रल एशिया, लेवेंट और मिस्र के सीईओ एवं मैनेजिंग डायरेक्टर रिजवान सूमार ने कहा कि कोल्ड चेन को केवल कोल्ड स्टोरेज तक सीमित नहीं रखा जा सकता. इसमें खेत और शुरुआती परिवहन से लेकर स्टोरेज, ट्रांसपोर्टेशन, डिस्ट्रीब्यूशन और अंतिम उपभोक्ता तक तापमान-संवेदनशील उत्पादों की पूरी आवाजाही शामिल होनी चाहिए. इसमें बंदरगाह और निर्यात बाजार भी महत्वपूर्ण हैं.
पैक-हाउस और रेफ्रिजरेटेड वाहनों की बड़ी कमी
रिपोर्ट के मुताबिक, जहां कोल्ड स्टोरेज क्षमता दीर्घकालिक जरूरत की 84 फीसदी तक पहुंच गई है, वहीं कोल्ड चेन के दूसरे हिस्सों में काफी बड़ा अंतर बना हुआ है. पैक-हाउस की क्षमता तय लक्ष्य की सिर्फ करीब 0.4 फीसदी है. वहीं रेफ्रिजरेटेड यानी रीफर वाहनों की उपलब्धता करीब 3.8 फीसदी और फल पकाने वाले चैंबर यानी राइपनिंग चैंबर की क्षमता करीब 7.1 फीसदी है.
पैक-हाउस खेतों के पास उत्पाद से खेत की गर्मी निकालने, उसकी ग्रेडिंग और पैकेजिंग के लिए जरूरी होते हैं. वहीं रीफर वाहन परिवहन के दौरान उत्पाद का तापमान बनाए रखने में अहम भूमिका निभाते हैं.
रिपोर्ट के अनुसार, इंडिया कूलिंग एक्शन प्लान के तहत पैक-हाउस, रीफर वाहनों और राइपनिंग चैंबर की जरूरत पूरी करने के लिए 2037-38 तक करीब 1.75 लाख करोड़ रुपये के निवेश की जरूरत पड़ सकती है. यानी हर साल औसतन करीब 8,800 करोड़ रुपये का निवेश करना होगा.
हर साल 4.7 करोड़ टन तक खाद्य नुकसान
रिपोर्ट में भारत में खाद्य पदार्थों के बाद-कटाई नुकसान को भी बड़ी चुनौती बताया गया है. इसके मुताबिक, बागवानी, डेयरी, मांस, पोल्ट्री और मछली समेत विभिन्न क्षेत्रों में हर साल करीब 1.7 करोड़ से 4.7 करोड़ टन खाद्य पदार्थों का नुकसान होता है.
54 फसलों में बाद-कटाई नुकसान का अनुमानित मूल्य करीब 1.5 लाख करोड़ रुपये सालाना है. रिपोर्ट के मुताबिक, इसकी प्रमुख वजहों में उत्पाद की हैंडलिंग, स्टोरेज और परिवहन से जुड़ी कमियां शामिल हैं.
रिपोर्ट में खेत के स्तर पर प्री-कूलिंग सुविधाओं, फीडर पैक-हाउस और साझा रेफ्रिजरेटेड परिवहन के लिए पूंजीगत सहायता देने की सिफारिश की गई है.
हर खेप के तापमान का डिजिटल रिकॉर्ड रखने का सुझाव
रिपोर्ट में एक एकीकृत राष्ट्रीय कोल्ड चेन मानक बनाने का सुझाव भी दिया गया है. इसके तहत उत्पाद की हर खेप के पूरे सफर के दौरान तापमान का मशीन से पढ़े जा सकने वाला रिकॉर्ड रखा जा सकता है.
इससे कंपनियों को यह पता लगाने में मदद मिलेगी कि सप्लाई चेन के किस चरण में तापमान तय सीमा से बाहर गया. साथ ही खरीदारों, नियामकों और कर्जदाताओं को सप्लाई चेन के प्रदर्शन से जुड़ी सत्यापन योग्य जानकारी मिल सकेगी.
रिपोर्ट में बहु-वस्तु कोल्ड स्टोरेज के ज्यादा इस्तेमाल, पूरे साल उपयोग के अनुबंध और प्रोसेसर, रिटेलर तथा निर्यातकों के साथ सुनिश्चित खरीद व्यवस्था को बढ़ावा देने की भी बात कही गई है. इससे मौजूदा बुनियादी ढांचे का बेहतर इस्तेमाल हो सकता है.
अब सिर्फ कोल्ड स्टोरेज बढ़ाना काफी नहीं
ग्रांट थॉर्नटन भारत के पार्टनर करण शर्मा ने कहा कि भारत की चुनौती अब सिर्फ अतिरिक्त कोल्ड स्टोरेज क्षमता तैयार करने तक सीमित नहीं है. उनके मुताबिक, देश को एकीकृत कोल्ड चेन और उसे जोड़ने वाली लॉजिस्टिक्स की जरूरत है.
उन्होंने कहा कि देश की करीब तीन-चौथाई कोल्ड स्टोरेज क्षमता आलू के लिए इस्तेमाल होती है, जबकि हर साल बड़ी मात्रा में फल और सब्जियां बर्बाद हो जाती हैं. इनमें काफी नुकसान उत्पाद के पहले कोल्ड प्वाइंट तक पहुंचने से पहले और परिवहन के दौरान होता है.
रिपोर्ट के मुताबिक, मौजूदा कोल्ड स्टोरेज को खेत से जुड़ी शुरुआती सुविधाओं, रेफ्रिजरेटेड परिवहन और डिजिटल ट्रेसबिलिटी से जोड़ने पर खाद्य नुकसान कम किया जा सकता है. इससे किसानों को बेहतर कीमत मिलने के साथ भारत के खाद्य, फार्मास्यूटिकल और कृषि निर्यात की प्रतिस्पर्धात्मकता भी बढ़ सकती है.
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