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खाद्य सुरक्षा से किसान सुरक्षा तक: 2014 के बाद भारत की कृषि नीति के ढांचे में कैसे आया बदलाव
लेखक बंशीलाल गुर्जर और नीरज सहरावत के अनुसार, इस बदलाव की सबसे सीधी अभिव्यक्ति प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि में दिखाई देती है. पीएम-किसान पात्र भूमिधारक किसान परिवारों को प्रत्यक्ष लाभ अंतरण के माध्यम से सालाना 6,000 रुपये की आय सहायता प्रदान करता है.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 hour ago
भारत की आजादी के बाद के अधिकांश समय में कृषि नीति एक प्रमुख राष्ट्रीय लक्ष्य से संचालित रही: बढ़ती आबादी के लिए पर्याप्त खाद्य उत्पादन करना. इस उद्देश्य ने खाद्य सुरक्षा की नींव रखी, लेकिन किसान अक्सर आय में उतार-चढ़ाव, जलवायु जोखिम, बाजार तक अनिश्चित पहुंच और बढ़ती इनपुट लागत के प्रति असुरक्षित बना रहा. 2014 के बाद से नीति का ढांचा धीरे-धीरे किसान सुरक्षा की व्यापक अवधारणा की ओर बढ़ा है. यह बदलाव किसी एक योजना में नहीं, बल्कि इस बात में दिखाई देता है कि आय सहायता, फसल बीमा, खरीद, मृदा स्वास्थ्य, सिंचाई, तकनीक और बाजार तक पहुंच को एक अधिक एकीकृत ढांचे में लाया गया है.
इस बदलाव की सबसे सीधी अभिव्यक्ति प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि में दिखाई देती है. पीएम-किसान पात्र भूमिधारक किसान परिवारों को प्रत्यक्ष लाभ अंतरण के माध्यम से सालाना 6,000 रुपये की आय सहायता प्रदान करता है. इसका पैमाना महत्वपूर्ण है. आधिकारिक पीएम-किसान पोर्टल के मुताबिक अप्रैल से जुलाई 2026 के चक्र में 9.44 करोड़ से अधिक किसानों को लाभ मिला. इस योजना ने एक राष्ट्रीय डिजिटल तंत्र तैयार किया है, जिसके माध्यम से सहायता सीधे, नियमित और बिना किसी मध्यस्थ के लाभार्थियों तक पहुंचती है. ऐसे क्षेत्र में जहां बीज, उर्वरक, श्रम और सिंचाई पर खर्च फसल से होने वाली आय प्राप्त होने से पहले ही हो जाता है, वहां नियमित नकद सहायता किसान परिवारों के लिए व्यावहारिक महत्व रखती है.
जोखिम से सुरक्षा एक अन्य प्रमुख स्तंभ रहा है. 2016 में शुरू की गई प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना भागीदारी के लिहाज से दुनिया की सबसे बड़ी फसल बीमा योजनाओं में से एक बन गई है. अगस्त 2026 में जारी सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, शुरुआत से अब तक 92.46 करोड़ से अधिक किसान आवेदनों का बीमा किया गया है और 26.33 करोड़ से अधिक किसान आवेदनों के लिए 2.06 लाख करोड़ रुपये से अधिक के दावों का भुगतान किया गया है. ऐसी सुरक्षा का महत्व फसल नुकसान के बाद मिलने वाले मुआवजे से कहीं आगे है. यह ऐसे पेशे के लिए औपचारिक जोखिम-साझाकरण तंत्र तैयार करती है, जिसमें बारिश, बाढ़, कीट, बीमारी और चरम मौसम कुछ ही दिनों में महीनों की मेहनत को खत्म कर सकते हैं.
सरकार ने कृषि आय की सुरक्षा के साधन के तौर पर न्यूनतम समर्थन मूल्य और खरीद का भी इस्तेमाल जारी रखा है. आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक 2004 से 2014 के दौरान 698.7 मिलियन टन की कुल खरीद की तुलना में 2014 से 2026 के दौरान यह बढ़कर 1,229.2 मिलियन टन हो गई, जबकि इसी तुलना अवधि में एमएसपी पर खरीद का मूल्य भी काफी बढ़ा है. यह विस्तार इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि खरीद केवल राज्य और किसान के बीच एक लेन-देन नहीं है. प्रमुख उत्पादक क्षेत्रों में यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था में कीमतों की उम्मीदों, नकदी की उपलब्धता और भरोसे को प्रभावित कर सकती है.
संसाधनों के अधिक कुशल इस्तेमाल की दिशा में इनपुट-आधारित कृषि से बदलाव भी उतना ही स्पष्ट है. मृदा स्वास्थ्य कार्ड कार्यक्रम के तहत 26 करोड़ से अधिक कार्ड जारी किए गए हैं, जिससे किसानों को मिट्टी में पोषक तत्वों की स्थिति और फसल-विशिष्ट उर्वरक संबंधी सिफारिशों की जानकारी मिलती है. सरकारी आंकड़े प्रति बूंद अधिक फसल योजना के तहत सूक्ष्म सिंचाई के विस्तार और राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान प्रणाली के माध्यम से हजारों जलवायु-अनुकूल फसल किस्मों के जारी होने को भी दर्शाते हैं. ये पहल एक महत्वपूर्ण नीतिगत समझ को दर्शाती हैं: भारतीय कृषि का भविष्य केवल इस बात पर निर्भर नहीं करेगा कि कितना उत्पादन होता है, बल्कि इस पर भी निर्भर करेगा कि पानी, मिट्टी, बीज और ऊर्जा का कितनी कुशलता से इस्तेमाल किया जाता है.
बाजार सुधारों ने इसमें एक और परत जोड़ी है. इलेक्ट्रॉनिक राष्ट्रीय कृषि बाजार ने कृषि मंडियों को जोड़ने वाला एक डिजिटल मंच तैयार किया है, जबकि किसान उत्पादक संगठनों की दिशा में नीतिगत जोर का उद्देश्य छोटे किसानों को एकत्रीकरण, इनपुट, प्रसंस्करण और बाजार में बातचीत के लिए अधिक सामूहिक ताकत देना है. कृषि अवसंरचना कोष, भंडारण और खाद्य प्रसंस्करण में निवेश तथा मूल्य श्रृंखलाओं पर जोर, ये सभी किसान को केवल कच्ची कृषि उपज के उत्पादक से आगे बढ़ाकर अधिक मूल्य वाली कृषि अर्थव्यवस्था में भागीदार बनाने के बड़े प्रयास का हिस्सा हैं.
यहीं कृषि नीति का सामाजिक प्रभाव सबसे महत्वपूर्ण हो जाता है. जिस किसान परिवार को समय पर आय सहायता मिलती है, संस्थागत ऋण तक पहुंच होती है, वह अपनी फसल का बीमा करा सकता है, मिट्टी संबंधी सलाह प्राप्त कर सकता है और बड़े बाजार तक पहुंच बना सकता है, वह उस परिवार की तुलना में संकटों का सामना बेहतर तरीके से कर सकता है जो एक ही फसल और अनौपचारिक कर्ज पर निर्भर है. इसका प्रभाव खेती से आगे तक जाता है. अधिक स्थिर ग्रामीण आय से परिवारों की खपत, बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य पर खर्च, स्थानीय व्यापार और कृषि उपकरणों में निवेश को समर्थन मिलता है. इसलिए कृषि केवल एक क्षेत्रीय मुद्दा नहीं, बल्कि भारत के एक बड़े हिस्से के लिए सामाजिक और आर्थिक स्थिरता का आधार बनी हुई है.
2014 के बाद की नीतिगत दिशा तकनीक और कल्याणकारी योजनाओं के बीच संबंधों में व्यापक बदलाव को भी दर्शाती है. प्रत्यक्ष लाभ अंतरण, डिजिटल किए गए भूमि और लाभार्थी रिकॉर्ड, उपग्रह और मौसम आधारित फसल आकलन, ऑनलाइन बाजार मंच और तकनीक-सक्षम बीमा निपटान धीरे-धीरे सरकारी कार्यक्रम और व्यक्तिगत किसान के बीच की दूरी कम कर रहे हैं. राज्यों में व्यवस्था अभी भी विकसित हो रही है, लेकिन संस्थागत दिशा स्पष्ट है: कृषि प्रशासन अधिक डेटा-आधारित, लक्षित और मापने योग्य बन रहा है.
भारत जब विकसित भारत 2047 की ओर देख रहा है, तब कृषि नीति के अगले चरण में अधिक मूल्य वाली फसलों, मजबूत खाद्य प्रसंस्करण, बेहतर भंडारण, निर्यात प्रतिस्पर्धा, जलवायु अनुकूलता और कृषि में महिलाओं तथा युवा उद्यमियों की व्यापक भागीदारी के जरिए इस आधार को मजबूत करना होगा. पिछले बारह वर्षों की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि नीतिगत चर्चा का दायरा खुद विस्तृत हुआ है. किसान को अब केवल उत्पादन के नजरिए से नहीं देखा जाता. आय, जोखिम, मिट्टी, पानी, ऋण, तकनीक और बाजार को तेजी से एक ही नीतिगत समस्या के हिस्सों के तौर पर देखा जा रहा है.
पहली हरित क्रांति ने भारत को खाद्य सुरक्षा प्रदान की. उभरता हुआ नीतिगत ढांचा इससे आगे की व्यापक दिशा तलाश रहा है: ऐसी कृषि अर्थव्यवस्था, जिसमें देश का खाद्य सुरक्षित करने वाला व्यक्ति भी अधिक आर्थिक सुरक्षा, लचीलापन और अवसर हासिल कर सके. यही बदलाव आने वाले दशकों में ग्रामीण भारत की मजबूती तय करेगा.
(डिस्क्लेमर: इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं और जरूरी नहीं कि प्रकाशन के विचारों को दर्शाते हों.)
अतिथि लेखक: बंशीलाल गुर्जर, राज्यसभा सांसद व राष्ट्रीय अध्यक्ष, भाजपा किसान मोर्चा
अतिथि लेखक: पायलट नीरज सहरावत, राष्ट्रीय प्रभारी- अनुसंधान एवं नीति, भाजपा किसान मोर्चा
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