होम / एक्सपर्ट ओपिनियन / भारत की सॉफ्ट पावर का नया युग: 2047 तक वैश्विक नेतृत्व की ओर बड़ा कदम
भारत की सॉफ्ट पावर का नया युग: 2047 तक वैश्विक नेतृत्व की ओर बड़ा कदम
लेखक भुवन लाला लिखते हैं, एक ऐसी सभ्यता जिसने दुनिया को योग, ज्योतिष, बौद्ध धर्म, शतरंज, दशमलव प्रणाली, एल्गोरिद्म को संचालित करने वाली बाइनरी प्रणाली और मानवता की सबसे स्थायी दार्शनिक परंपराओं में से कुछ दीं, वह दशकों तक सॉफ्ट पावर के क्षेत्र में अपनी वास्तविक क्षमता से काफी कम प्रभाव डालती रही है.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 53 minutes ago
कोट द'आजूर बुला रहा है. रेड कार्पेट सज रहा है. सितारे पहुंच रहे हैं. स्क्रीनिंग रूम भर रहे हैं. कैमरे ऊपर उठ रहे हैं. होटल के कमरे पूरी तरह बुक हो चुके हैं. बैठकों की कतार लग चुकी है. स्क्रीनिंग, कॉकटेल, डिनर और यॉट पार्टियों के निमंत्रण आ रहे हैं. ट्रैफिक थम गया है. कान्स में दुनिया का सबसे बड़ा फिल्म महोत्सव सिनेमा के सबसे बड़े सपनों को आकार दे रहा है.
यह वही वैश्विक मंच है जहां भारत की सॉफ्ट पावर को अपनी उपस्थिति दर्ज करानी होगी.
भारत की वैश्विक स्थिति के केंद्र में एक विचित्र विरोधाभास मौजूद है. एक ऐसी सभ्यता जिसने दुनिया को योग, ज्योतिष, बौद्ध धर्म, शतरंज, दशमलव प्रणाली, एल्गोरिदम को संचालित करने वाली बाइनरी प्रणाली और मानवता की सबसे स्थायी दार्शनिक परंपराओं में से कुछ दीं, वह दशकों तक सॉफ्ट पावर के क्षेत्र में अपनी वास्तविक क्षमता से काफी कम प्रदर्शन करती रही है. लेकिन अब वह दौर शायद समाप्त होने जा रहा है. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और सोशल मीडिया का संगम एक अभूतपूर्व अवसर पैदा कर रहा है, जिसका भारत यदि रणनीतिक स्पष्टता के साथ उपयोग करे, तो वह अपनी वैश्विक छवि को नया रूप दे सकता है, अपनी सांस्कृतिक पहुंच को बढ़ा सकता है और इक्कीसवीं सदी की एक निर्णायक शक्ति के रूप में अपनी स्थिति मजबूत कर सकता है.
राजनीतिक वैज्ञानिक जोसेफ नाए का आकर्षण के जरिए दूसरों को प्रभावित करने का सिद्धांत अब वैश्विक नेतृत्व की मुद्रा बन चुका है. किसी भी पैमाने से देखें तो भारत के पास सॉफ्ट पावर के लिए असाधारण आधार मौजूद है. हमारे महाकाव्यों ने दक्षिण-पूर्व एशिया की कला, वास्तुकला और शासन व्यवस्था को प्रभावित किया. हमारी सांस्कृतिक परासरण की यह विरासत शांतिपूर्ण, अनुकूलनशील और समावेशी रही है, जो औपनिवेशिक या वैचारिक थोपने से बिल्कुल अलग है. भारत का फिल्म उद्योग अपनी अलग स्टार प्रणाली के साथ दुनिया में सबसे अधिक फिल्में बनाता है. भारतीय सिनेमा का गीत, संगीत, नृत्य, नाटक और पारिवारिक मूल्यों का मिश्रण भाषा की सीमाओं को पार कर लागोस से लीमा तक दर्शकों को आकर्षित करता है. इसके फिल्म सितारों और खेल चैंपियनों का जीवन सोशल मीडिया पर छाया रहता है. इसके लेखक स्वयं में एक ब्रांड हैं. भारतीय संगीत और फैशन ने वैश्विक स्तर पर अपनी गहरी पहचान बनाई है. प्राचीन व्यापार मार्गों पर बिकने वाले मसाले अब सांस्कृतिक मेलजोल के प्रतीक बन चुके हैं और भारतीय रेस्तरां स्वाद और आतिथ्य के अनौपचारिक दूतावास की तरह काम कर रहे हैं. दुनिया भर में फैले 3.2 करोड़ से अधिक भारतीय प्रवासी समुदाय दुनिया के सबसे शिक्षित और आर्थिक रूप से प्रभावशाली समुदायों में से एक हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 2014 में प्रस्तावित और 2015 में पहली बार मनाया गया संयुक्त राष्ट्र का अंतरराष्ट्रीय योग दिवस अब हर साल करोड़ों लोगों को आकर्षित करता है. योग और ध्यान, जिन्हें अब दुनिया भर में करोड़ों लोग अपनाते हैं, आधुनिक इतिहास में किसी भी राष्ट्र के सबसे सफल सांस्कृतिक निर्यातों में गिने जा सकते हैं.
फिर भी इन सभी संपत्तियों के बावजूद भारत ऐतिहासिक रूप से अपनी सांस्कृतिक समृद्धि को भू-राजनीतिक प्रभाव में बदलने के लिए संघर्ष करता रहा है. ब्रांड फाइनेंस के ग्लोबल सॉफ्ट पावर इंडेक्स 2026 के अनुसार भारत 48.0 अंकों के साथ कुल मिलाकर 32वें स्थान पर है और 2025 की तुलना में दो स्थान नीचे खिसक गया है, हालांकि परिचितता में 13वां, प्रभाव में 17वां और संस्कृति एवं विरासत में 19वां स्थान हासिल किया है. इसके बावजूद इसकी वास्तविक क्षमता का अभी भी बहुत कम उपयोग हो पाया है. इसके पीछे कई जटिल कारण हैं. दशकों तक चली गुटनिरपेक्ष नीति जिसने कथा निर्माण से ज्यादा तटस्थता को प्राथमिकता दी, सार्वजनिक कूटनीति में कम निवेश, भाषाई विखंडन, अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सवों और खेल आयोजनों के महत्व को कम आंकना और एक घरेलू मीडिया व्यवस्था जो काफी हद तक भीतर की ओर केंद्रित रही. इस पीढ़ी के सामने सवाल यह नहीं है कि भारत के पास सामग्री है या नहीं, क्योंकि वह स्पष्ट रूप से है, बल्कि सवाल यह है कि क्या उसके पास उसे दुनिया तक पहुंचाने की रणनीति और उपकरण हैं.
सोशल मीडिया के उदय ने वैश्विक सूचना व्यवस्था को मूल रूप से लोकतांत्रिक बना दिया है. अब सरकारों का कथा पर एकाधिकार नहीं रहा. कारगिल का कोई संगीतकार, कन्याकुमारी का कोई शेफ, कोहिमा का कोई फिल्मकार या कच्छ का कोई फैशन डिजाइनर राष्ट्रीय प्रसारकों से भी बड़े दर्शक वर्ग बना सकता है. भारत अब इस बदलाव को समझने लगा है. भारतीय कंटेंट क्रिएटर्स ने यूट्यूब, इंस्टाग्राम और टिकटॉक पर दुनिया के सबसे ज्यादा फॉलो किए जाने वाले अकाउंट्स में अपनी जगह बनाई है. भारतीय कहानियों को भारतीय आवाजों में सुनने की भूख पहले से मौजूद है.
जो अब भी गायब है, वह है संगठित संस्थागत समर्थन. दक्षिण कोरिया जैसे देशों ने दिखाया है कि योजनाबद्ध सॉफ्ट पावर निवेश क्या हासिल कर सकता है. कोरियन वेव, के-पॉप, के-ड्रामा और कोरियन भोजन अपने आप नहीं उभरे. इन्हें सरकारी एजेंसियों, निर्यात बोर्डों और रणनीतिक सार्वजनिक-निजी साझेदारियों ने विकसित किया, जिन्होंने संस्कृति को राष्ट्रीय शक्ति के साधन के रूप में पहचाना. तुलना करें तो भारत की सांस्कृतिक कूटनीति और विरासत प्रचार व्यवस्था बिखरी हुई और सीमित है. भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद सीमित पहुंच और अपने अंतरराष्ट्रीय समकक्षों की तुलना में बेहद कम बजट के साथ काम करती है. यही कारण है कि ब्रिटिश काउंसिल या अलायंस फ्रांसेज़ जैसी वैश्विक पहुंच रखने वाली कोई भारतीय संस्था मौजूद नहीं है. यह एक संरचनात्मक कमी है, जिसे AI और डिजिटल प्लेटफॉर्म भर सकते हैं, लेकिन केवल तब जब उन्हें उपयोग करने की राजनीतिक इच्छाशक्ति मौजूद हो.
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस बड़े पैमाने पर सॉफ्ट पावर प्रोजेक्शन के लिए परिवर्तनकारी क्षमताएं लेकर आया है. AI आधारित अनुवाद और डबिंग टूल अब भारतीय कंटेंट, फिल्मों, डॉक्यूमेंट्री, पॉडकास्ट और शैक्षणिक कार्यक्रमों को कुछ ही घंटों में दर्जनों भाषाओं में बदल सकते हैं और वह भी पारंपरिक लागत के एक छोटे हिस्से में. इससे भारत की वैश्विक सांस्कृतिक पहुंच की सबसे बड़ी बाधाओं में से एक दूर हो सकती है. यानी उसकी बहुभाषी रचनात्मकता और वैश्विक दर्शकों के बीच मौजूद भाषाई अंतर.
कल्पना कीजिए कि AI आधारित भारतीय सिनेमा कंटेंट पश्चिम अफ्रीका, लैटिन अमेरिका या दक्षिण-पूर्व एशिया जैसे क्षेत्रों तक पहुंचे, जहां भारतीय संस्कृति के प्रति पहले से ही सकारात्मक भावना मौजूद है, और वह भी स्थानीय भाषाओं में उच्च गुणवत्ता वाली डबिंग और सांस्कृतिक रूप से अनुकूलित सबटाइटल्स के साथ. या फिर AI आधारित प्लेटफॉर्म भारतीय शास्त्रीय संगीत, आयुर्वेद ट्यूटोरियल या दार्शनिक व्याख्यानों को उन वैश्विक दर्शकों तक पहुंचाएं जो आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विकल्पों की तलाश में हैं. ये काल्पनिक संभावनाएं नहीं हैं. ये तकनीकी रूप से अभी संभव हैं.
भारत के पास AI युग में एक और अनूठा लाभ है, जिसे अक्सर नजरअंदाज किया जाता है. तकनीकी उद्योग में भारतीय प्रवासियों की मजबूत मौजूदगी. भारतीय मूल के पेशेवर दुनिया की कई सबसे प्रभावशाली AI कंपनियों का नेतृत्व कर रहे हैं. इससे तकनीकी प्रभाव के अनौपचारिक लेकिन शक्तिशाली नेटवर्क बनते हैं, जिन्हें बेहतर समन्वय के साथ भारत के सांस्कृतिक और बौद्धिक निर्यात को बढ़ाने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है.
प्रभावी सॉफ्ट पावर के लिए केवल सांस्कृतिक उत्पादन ही नहीं, बल्कि यह भी जरूरी है कि आपके पास यह स्पष्ट कथा हो कि आप कौन हैं और किन मूल्यों का प्रतिनिधित्व करते हैं. भारत के पास फिलहाल एक साथ कई शक्तिशाली कथाओं का स्वामित्व हासिल करने का असाधारण अवसर है. दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र और ध्यान, पर्यावरण दर्शन तथा सामुदायिक जीवन की प्राचीन परंपराओं वाले देश के रूप में भारत उस वैश्विक पीढ़ी से सीधे संवाद करता है, जो तकनीकी अलगाव और पारिस्थितिक संकट को लेकर चिंतित है.
भारत का डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, आधार, UPI और डिजिटल फ्रेमवर्क अब उन विकासशील देशों के बीच तेजी से सराहा जा रहा है, जो सस्ती और संप्रभु तकनीकी व्यवस्थाओं की तलाश में हैं. यदि भारत सक्रिय रूप से इस विशेषज्ञता को साझा करता है और इसे व्यावसायिक उत्पाद के बजाय सार्वजनिक हित के रूप में प्रस्तुत करता है, तो वह खुद को ग्लोबल साउथ के लिए एक भरोसेमंद तकनीकी साझेदार के रूप में स्थापित कर सकता है. यही वह मूल्य-आधारित प्रभाव है जो स्थायी सॉफ्ट पावर बनाता है.
सॉफ्ट पावर का क्षेत्र स्थिर नहीं है. कई देशों की परिष्कृत सांस्कृतिक कूटनीति मशीनरी एशिया, अफ्रीका और अन्य क्षेत्रों में धारणा निर्माण के लिए लगातार काम कर रही है. दूसरी ओर पश्चिमी मनोरंजन प्लेटफॉर्म अब भी वैश्विक सांस्कृतिक मानदंड तय कर रहे हैं, जिससे गैर-पश्चिमी आवाजें दब जाती हैं. यदि भारत इस माहौल में रणनीतिक रूप से सक्रिय नहीं हुआ, तो AI और सोशल मीडिया युग द्वारा खोला गया अवसर का यह द्वार बंद हो जाएगा और भारत एक बार फिर समृद्ध सांस्कृतिक सभ्यता होने के बावजूद सीमित वैश्विक कथा प्रभाव वाला देश बनकर रह जाएगा.
घरेलू स्तर पर भी आंतरिक सामंजस्य की चुनौती मौजूद है. भारत की सॉफ्ट पावर तब सबसे प्रभावशाली होती है, जब वह उसकी विविधता को प्रतिबिंबित करती है. भाषाओं, व्यंजनों, आस्थाओं और कलात्मक परंपराओं की बहुलता भारत को दुनिया की किसी भी अन्य सभ्यता से अलग बनाती है. ऐसी कथाएं जो इस विविधता को सपाट या एकरूप बनाती हैं, वे भारतीय संस्कृति की उसी प्रामाणिकता को कमजोर कर सकती हैं, जो उसकी वैश्विक अपील की असली ताकत है. भारत की सभ्यतागत कहानी दुनिया की सबसे आकर्षक कहानियों में से एक है. सवाल अब यह नहीं है कि दुनिया इसे सुनने के लिए तैयार है या नहीं. सवाल यह है कि क्या भारत इसे सुनाने के लिए तैयार है. सबसे सफल सॉफ्ट पावर रणनीतियों को विश्व मंच पर भारत की विशिष्टता का उत्सव मनाना होगा.
भारत एक ऐसे दुर्लभ मोड़ पर खड़ा है, जहां उसके पास अपनी संस्कृति, मूल्यों और विचारों को उस स्तर और गति से दुनिया तक पहुंचाने के साधन मौजूद हैं, जिसकी कल्पना पिछली पीढ़ियां भी नहीं कर सकती थीं. गैर-पश्चिमी दृष्टिकोणों, वैकल्पिक विकास मॉडलों और प्राचीन ज्ञान प्रणालियों के प्रति वैश्विक रुचि वास्तव में बढ़ रही है. वहीं भारत का प्रवासी समुदाय, उसका तकनीकी क्षेत्र और उसकी रचनात्मक इंडस्ट्री पहले से कहीं बेहतर स्थिति में हैं, जो इस प्रभाव को दुनिया तक पहुंचाने का माध्यम बन सकते हैं.
अब जरूरत एक रणनीतिक सोच की है, ऐसी राष्ट्रीय सॉफ्ट पावर नीति की जो नीति निर्माताओं, हितधारकों, प्रवासी भारतीयों की भागीदारी और सार्वजनिक कूटनीति को एक संगठित ढांचे में जोड़ सके. अन्य देशों ने यह दिखाया है कि इस तरह का निवेश केवल प्रतिष्ठा ही नहीं बढ़ाता, बल्कि व्यापारिक संबंधों, कूटनीतिक प्रभाव और अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के नियम तय करने की क्षमता को भी मजबूत करता है.
2047 तक, जब भारत अपनी आजादी के 100 वर्ष पूरे करेगा, तब जनसांख्यिकीय लाभ, तकनीकी प्रगति और प्रवासी भारतीयों की ताकत उसे दुनिया के सबसे प्रभावशाली देशों की शीर्ष श्रेणी में पहुंचा सकती है. टकराव से थकी हुई दुनिया में भारत की प्राचीन ज्ञान और आधुनिक व्यावहारिकता का मेल एक आकर्षक विकल्प प्रस्तुत करता है, जो समावेशी और सहानुभूतिपूर्ण शक्ति के मॉडल के जरिए दुनिया को समृद्ध बना सकता है. AI और सोशल मीडिया के दौर में भारतीय सॉफ्ट पावर की संभावनाएं असीमित हैं. यदि भारत इसे सही तरीके से अपनाने का फैसला करता है, तो वह एक सॉफ्ट पावर सुपरपावर बनकर उभर सकता है.
अतिथि लेखक: भुवन लाल
(भुवन लाल, सुभाष बोस, हरदयाल और वल्लभभाई पटेल के जीवनीकार हैं. वह Namaste Cannes और India on the World Stage के लेखक हैं. उनसे [writerlall@gmail.com]पर संपर्क किया जा सकता है.)
टैग्स