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भारत में AI सप्लाई चेन का दौर शुरू, क्या इसके लिए तैयार है देश का कार्यबल?

लेखिका मृणालिनी शाह के अनुसार,भारत इस दशक के भीतर लगभग निश्चित रूप से अत्यधिक स्वचालित, AI संचालित सप्लाई चेन चलाएगा. असली चुनौती यह है कि क्या कार्यबल, विशेष रूप से मिड-मैनेजमेंट स्तर इसके लिए तैयार होगा. निर्णय लेने की प्रक्रिया अब भी मशीनों पर हावी है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 2 hours ago

भारत की AI सप्लाई चेन अब कोई दूर का लक्ष्य नहीं रही, यह अधिकांश संगठनों की तैयारी से कहीं तेज़ी से आ रही है. आज अगर आप भारत के किसी बड़े वेयरहाउस में जाएं, तो ऐसा महसूस होता है जैसे भविष्य आ चुका हो. AI सिस्टम बढ़ती सटीकता के साथ मांग का पूर्वानुमान लगा रहे हैं, डिजिटल ट्विन पूरे लॉजिस्टिक्स नेटवर्क का सिमुलेशन कर रहे हैं और एल्गोरिद्म लगातार रूट, इन्वेंट्री और फुलफिलमेंट फैसलों को ऑप्टिमाइज कर रहे हैं. सतह पर ऐसा लगता है कि सप्लाई चेन पहले ही बुद्धिमान बन चुकी है. लेकिन जैसे ही हम निर्णय लेने की परत में प्रवेश करते हैं, यह दृष्टिकोण बदल जाता है. आप प्लानर के केबिन में जाते हैं और फैसले अब भी स्प्रेडशीट और व्हाट्सऐप ग्रुप्स पर लिए जा रहे हैं और मानवीय निर्णय अक्सर डेटा आधारित होने के बजाय सहज ज्ञान पर आधारित होते हैं. सिस्टम स्वायत्त होते जा रहे हैं, लेकिन उन्हें चलाने वाले लोग नहीं.

भारत इस दशक के भीतर लगभग निश्चित रूप से अत्यधिक स्वचालित, AI संचालित सप्लाई चेन चलाएगा. असली चुनौती यह है कि क्या कार्यबल, विशेष रूप से मिड-मैनेजमेंट स्तर इसके लिए तैयार होगा. निर्णय लेने की प्रक्रिया अब भी मशीनों पर हावी है.

क्यों यह भारत की अगली प्रतिस्पर्धात्मक परीक्षा है

अधिकांश मैक्रो संकेतकों के अनुसार भारत पहले से ही AI महाशक्ति बन चुका है. स्टैनफोर्ड ग्लोबल AI वाइब्रेंसी इंडेक्स में भारत तीसरे स्थान पर है और उससे आगे केवल अमेरिका और चीन हैं. भारत में AI स्किल पैठ समान भूमिकाओं में वैश्विक औसत से 2.5 गुना अधिक मानी जाती है. 2023 के बाद से AI से संबंधित नौकरी पोस्टिंग दोगुनी से अधिक हो चुकी हैं. AI आधारित भूमिकाएं पारंपरिक नौकरियों की तुलना में कहीं तेजी से बढ़ रही हैं और लगभग 28% तक वेतन वृद्धि दे रही हैं.

फिर भी इस प्रभावशाली वृद्धि के नीचे एक संरचनात्मक असंतुलन छिपा है. नीति आयोग के अनुसार, भारत की AI प्रतिभा आपूर्ति वर्तमान मांग का केवल आधा हिस्सा ही पूरा कर पा रही है. अनुमान बताते हैं कि AI से जुड़ी भूमिकाएं 2024 से 2026 के बीच लगभग 8 लाख–8.5 लाख से बढ़कर 12.5 लाख से अधिक हो सकती हैं. मांग हर साल लगभग 25% की दर से बढ़ रही है, जबकि आपूर्ति लगभग 15% की दर से पीछे चल रही है. इसका मतलब साफ है, यदि लक्षित हस्तक्षेप नहीं किया गया, तो भारत न केवल उत्पादकता लाभ से वंचित रह सकता है बल्कि पारंपरिक क्षेत्रों में रोजगार विस्थापन का भी सामना कर सकता है.

इंडिया स्किल्स रिपोर्ट 2025 इस तस्वीर को और स्पष्ट करती है. जहां “AI-ready” पेशेवरों की संख्या 2023 में लगभग 4.16 लाख से बढ़कर 2026 तक करीब 10 लाख होने की उम्मीद है, वहीं भर्ती का पैटर्न अलग है. एंट्री-लेवल भर्ती धीमी हो रही है और मांग एक से पांच साल के अनुभव वाले पेशेवरों पर केंद्रित होती जा रही है. यह दिखाता है कि असली बाधा अब नई प्रतिभा नहीं बल्कि मिड-मैनेजमेंट क्षमता है.

सप्लाई चेन में यह अंतर और भी गंभीर हो जाता है. AI और जेनरेटिव AI के भारत में लगभग 3.8 करोड़ संगठित क्षेत्र के कर्मचारियों को प्रभावित करने की उम्मीद है, जिससे 2030 तक उत्पादकता में 2.6% तक वृद्धि हो सकती है. लेकिन ये लाभ अपने आप नहीं मिलेंगे. यह इस बात पर निर्भर करेगा कि संगठन तकनीक अपनाने को कार्यबल क्षमता और ऑपरेटिंग मॉडल पुनःडिजाइन के साथ कितना जोड़ पाते हैं.

एक सरल 2×2: आज भारत की सप्लाई चेन कहां खड़ी है?

भारत की सप्लाई चेन को 2×2 फ्रेमवर्क में समझा जा सकता है, जहां AI अपनाने और कार्यबल की तैयारी को मैप किया गया है:

1. X-axis: सप्लाई चेन संचालन में AI अपनाने का स्तर (कम → अधिक)
2. Y-axis: AI के लिए कार्यबल की तैयारी (कम → अधिक)

AI अपनाना × कार्यबल तैयारी

एक तरफ हैं “एनालॉग सर्वाइवर्स”, वे संगठन जिनमें AI अपनाना और कार्यबल तैयारी दोनों कम हैं. ये कंपनियां अब भी मैनुअल प्रक्रियाओं, बिखरे डेटा और स्प्रेडशीट आधारित प्लानिंग पर निर्भर हैं. डिजिटलीकरण इनके संचालन का हिस्सा हो सकता है, लेकिन यह शायद ही कभी वास्तविक परिवर्तन लाता है. जैसे-जैसे प्रतिस्पर्धी ऑटोमेशन की ओर बढ़ते हैं, ये कंपनियां लागत और दक्षता दोनों में पिछड़ने का जोखिम उठाती हैं.

फिर आता है “ऑटोपायलट इल्यूजन”, जो शायद सबसे चिंताजनक स्थिति है. इन संगठनों ने AI सिस्टम, कंट्रोल टावर, रोबोटिक्स और एडवांस प्लानिंग टूल्स में भारी निवेश किया है, लेकिन उनका कार्यबल इन्हें पूरी तरह उपयोग करने में सक्षम नहीं है. डैशबोर्ड पेशेवर दिखते हैं, लेकिन निर्णय अब भी काफी हद तक अंतर्ज्ञान पर आधारित होते हैं. किसी व्यवधान या समस्या की स्थिति में प्रबंधक अक्सर रियल-टाइम डेटा के बजाय पुराने अनुभव के आधार पर एल्गोरिद्म को ओवरराइड कर देते हैं. परिणामस्वरूप, तकनीक में बड़ा निवेश होने के बावजूद व्यावसायिक मूल्य नहीं बन पाता.

इसके विपरीत कुछ संगठन “रेडी बट अंडर-टूल्ड” श्रेणी में आते हैं. इन कंपनियों के पास मजबूत डोमेन विशेषज्ञता और डेटा साक्षरता होती है, लेकिन पर्याप्त AI इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं होता. कई भारतीय IT सेवा कंपनियां और ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर इसी श्रेणी में आते हैं. वे AI को गहराई से समझते हैं और वैश्विक संचालन को समर्थन देते हैं, लेकिन उनके अपने आंतरिक सिस्टम पुराने बने हुए हैं. यह अवसरों से भरी लेकिन कम उपयोग की गई स्थिति है.

अंतिम श्रेणी “ऑगमेंटेड चैंपियंस” का प्रतिनिधित्व करती है. यहां AI सिस्टम और मानवीय विशेषज्ञता तालमेल में काम करते हैं. AI एजेंट प्लानिंग, प्रोक्योरमेंट और लॉजिस्टिक्स में बुद्धिमान समन्वयक की भूमिका निभाते हैं, जबकि AI साक्षर कार्यबल लगातार सवाल पूछकर और सुधार करके इन सिस्टम्स को बेहतर बनाता है. यह इंसानों की जगह ऑटोमेशन नहीं बल्कि उनका संवर्धन है.

यह फ्रेमवर्क एक डायग्नोस्टिक टूल की तरह काम करता है, कंपनियां दोनों अक्षों पर खुद का मूल्यांकन कर सकती हैं और समझ सकती हैं कि उनके लिए कौन-सा परिवर्तन मार्ग सबसे उपयुक्त है.

ध्यान देने योग्य तनाव क्वाड्रेंट ② और ③ के बीच है, वे कंपनियां जिन्होंने लोगों की क्षमता बनाए बिना AI टूल्स में तेजी से निवेश किया (ऑटोपायलट इल्यूजन) और वे जिनका कार्यबल तैयार है लेकिन सही निवेश का इंतजार कर रहा है (रेडी बट अंडर-टूल्ड). दोनों अस्थिर स्थितियां हैं, लेकिन इनके लिए बिल्कुल अलग हस्तक्षेप की जरूरत है.

लक्ष्य क्वाड्रेंट ④ यानी “ऑगमेंटेड चैंपियंस” है — जहां AI टूल्स और मानवीय निर्णय एक-दूसरे को मजबूत करते हैं. ये वे संगठन हैं जहां फ्रंटलाइन टीमें सिस्टम के आउटपुट पर भरोसा भी करती हैं और सवाल भी पूछती हैं, न कि उन्हें अनदेखा करती हैं या आंख बंद कर उनका पालन करती हैं.

आज अधिकांश भारतीय सप्लाई चेन संभवतः ① और ② के बीच बंटी हुई हैं: पारंपरिक क्षेत्र (कृषि, असंगठित लॉजिस्टिक्स, छोटा विनिर्माण) “एनालॉग सर्वाइवर्स” में केंद्रित हैं, जबकि बड़े ई-कॉमर्स और रिटेल खिलाड़ी जिन्होंने डिमांड फोरकास्टिंग या वेयरहाउस ऑटोमेशन लागू किया है, अक्सर “ऑटोपायलट इल्यूजन” में आ जाते हैं क्योंकि रिस्किलिंग निवेश तकनीकी खर्च के साथ कदम नहीं मिला पाया.

भारतीय व्यवसायों के सामने चुनौती स्पष्ट है. जबकि कई “ऑगमेंटेड चैंपियंस” बनना चाहते हैं, मौजूदा संकेतक “ऑटोपायलट इल्यूजन” की ओर झुकाव दिखाते हैं. तकनीक अपनाना मानवीय क्षमता से तेज हो रहा है, जिससे ऐसे सिस्टम बन रहे हैं जो दिखने में उन्नत हैं लेकिन लचीले नहीं.

हालिया वैश्विक ढांचे इस चिंता को और मजबूत करते हैं. AI अब केवल एक उपकरण नहीं रहा, यह एक ऑपरेटिंग लेयर बनता जा रहा है. EY के अनुसार AI एजेंट डिमांड फोरकास्टिंग, सप्लायर मैनेजमेंट और इन्वेंट्री ऑप्टिमाइजेशन में निर्णयों का समन्वय कर सकते हैं. सही तरीके से लागू होने पर ये लागत घटाते हैं, मार्जिन बढ़ाते हैं और प्रतिक्रिया क्षमता सुधारते हैं.

हालांकि, अपनाने की गति असमान बनी हुई है. भारत की केवल लगभग 15% कंपनियां ही जेनरेटिव AI वर्कलोड को सफलतापूर्वक उत्पादन स्तर तक पहुंचा पाई हैं और केवल 8% कंपनियां AI लागत को पूरी तरह माप और आवंटित कर पाती हैं. बढ़ते निवेश के बावजूद बड़े पैमाने पर AI को औद्योगिक रूप देने की क्षमता सीमित बनी हुई है.

इसी तरह, Gartner “ऑगमेंटेड कनेक्टेड वर्कफोर्स” की अवधारणा पेश करता है, जहां AI और मानवीय क्षमता को एकल ऑपरेटिंग मॉडल में जोड़ा जाता है. यह दृष्टिकोण उत्पादकता बढ़ाने, निर्णय लेने में तेजी लाने और दैनिक कार्यप्रवाह में निरंतर सीखने को शामिल करने पर केंद्रित है. Gartner का अनुमान है कि 2026 तक वैश्विक स्तर पर लगभग आधे ऑफिस कर्मचारी किसी न किसी रूप में AI-ऑगमेंटेड होंगे.

भारत की नीतिगत पहल: अनुकूल माहौल

नीतिगत स्तर पर भारत तेजी से आगे बढ़ रहा है. IndiaAI Mission डेटा प्लेटफॉर्म, कंप्यूट और जिम्मेदार AI के लिए 10,000 करोड़ रुपये से अधिक का निवेश कर रहा है. AI@Work नोट में SOAR, YUVAi, FutureSkills Prime और IndiaAI FutureSkills जैसे कई स्किलिंग प्रोग्राम का उल्लेख है, जो पहले से ही लाखों छात्रों और पेशेवरों को AI की बुनियादी शिक्षा दे रहे हैं.

इंडिया स्किल्स रिपोर्ट 2025 इसे वैश्विक प्रतिभा गतिशीलता के लिए “भारत का दशक” बताती है और अनुमान लगाती है कि 2025 तक वैश्विक कुशल कार्यबल में भारत की हिस्सेदारी 40% से अधिक हो सकती है, जबकि AI-ready पेशेवरों की संख्या 2026 तक लगभग 10 लाख तक पहुंच सकती है.

नीति आयोग की “AI Economy में Job Creation Roadmap” एक India AI Talent Mission की मांग करती है ताकि बिखरे हुए स्किलिंग प्रयासों का समन्वय किया जा सके, शिक्षा में AI साक्षरता को शामिल किया जा सके और मौजूदा कार्यबल को बड़े पैमाने पर रिस्किल किया जा सके. दिशा स्पष्ट है. खुला सवाल यह है कि क्या कंपनियां भी उतनी ही तेजी से कदम उठाएंगी.

फिर भी केवल नीतिगत गति पर्याप्त नहीं है. वास्तविक परिवर्तन कंपनियों के भीतर होना चाहिए.

क्वाड्रेंट बदलने के लिए तीन कदम

भारतीय बोर्ड और सप्लाई चेन लीडर्स को “ऑटोपायलट इल्यूजन” से “ऑगमेंटेड चैंपियंस” बनने के लिए क्या करना चाहिए?

1. मानव–AI क्षमता को बोर्ड स्तर का मापदंड बनाएं

सबसे पहले, मानव–AI क्षमता को बोर्ड स्तर की प्राथमिकता बनाना होगा. यदि AI से मापने योग्य उत्पादकता लाभ की उम्मीद है, तो कार्यबल की तैयारी को द्वितीयक मुद्दा नहीं माना जा सकता. संगठनों को स्पष्ट मेट्रिक्स चाहिए, कर्मचारी AI टूल्स पर कितनी तेजी से दक्ष होते हैं, कितनी बार निर्णय AI इनसाइट्स से प्रभावित होते हैं और कितने प्रबंधकों के पास AI साक्षरता है.

2. केवल कोर्स नहीं, AI-नेटिव सीखने का माहौल बनाएं

दूसरा, कंपनियों को पारंपरिक प्रशिक्षण मॉडल से आगे बढ़ना होगा. स्थिर कोर्स और सैद्धांतिक शिक्षा AI आधारित गतिशील वातावरण के लिए पर्याप्त नहीं हैं. बिजनेस स्कूल, कॉर्पोरेट यूनिवर्सिटी और सेक्टर स्किल काउंसिल को स्थिर केस स्टडी से आगे बढ़ना होगा.

उन्हें ऐसे सिमुलेशन तैयार करने चाहिए जहां प्लानर AI-सक्षम कंट्रोल टावर के जरिए व्यवधान स्थितियों को संभालें, प्लांट और लॉजिस्टिक्स मैनेजर अपूर्ण एल्गोरिद्म के साथ काम करें और टीमें यह निर्णय लेने की समझ विकसित करें कि मशीन आउटपुट पर कब भरोसा करना है और कब उसे चुनौती देनी है.

MSME और टियर-2 तथा टियर-3 क्लस्टर्स के लिए यह साझा लैब और डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए संभव हो सकता है, जिन्हें उद्योग संगठनों और सरकार द्वारा संयुक्त रूप से वित्त पोषित किया जाए.

3. समावेशन और MSME मजबूती के लिए AI रणनीति बनाएं

तीसरा, AI रणनीतियां समावेशी होनी चाहिए, विशेष रूप से MSME के लिए जो भारत की सप्लाई चेन की रीढ़ हैं. छोटे व्यवसायों के पास अक्सर स्वतंत्र रूप से AI में निवेश करने के संसाधन नहीं होते. साझा प्लेटफॉर्म, सहयोगी प्रशिक्षण पहल और सरकारी समर्थित इंफ्रास्ट्रक्चर इस अंतर को पाट सकते हैं. अन्यथा AI के लाभ केवल बड़ी कंपनियों तक सीमित रह सकते हैं.

भारत के सामने विकल्प

अंततः भारत एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है. देश के पास AI आधारित सप्लाई चेन में नेतृत्व करने के लिए प्रतिभा, नीतिगत समर्थन और तकनीकी गति मौजूद है. लेकिन सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह मानवीय क्षमता और मशीन इंटेलिजेंस को कितनी प्रभावी तरह से जोड़ पाता है.

2×2 मैट्रिक्स रणनीतिक विकल्प को सरल बनाता है. भारत की AI सप्लाई चेन या तो एक मजबूत प्रतिस्पर्धात्मक दीवार बनेंगी यदि हम लोगों, ऑपरेटिंग मॉडल और गवर्नेंस में उतना ही निवेश करें जितना एल्गोरिद्म में करते हैं या फिर वे केवल एक “ऑटोपायलट इल्यूजन” बनकर रह जाएंगी, जो स्क्रीन पर प्रभावशाली दिखती हैं लेकिन वास्तविकता में कमजोर हैं.

तकनीक तो हर हाल में आ रही है. सवाल यह है कि क्या कार्यबल इसके लिए तैयार है. यही वह प्रतिस्पर्धात्मक परीक्षा है जिसे भारत नजरअंदाज नहीं कर सकता.

(डिस्क्लेमर: इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं और जरूरी नहीं कि वे प्रकाशन के विचारों को दर्शाते हों.)

अतिथि लेखक: मृणालिनी शाह

(मृणालिनी शाह, PhD, पोस्टडॉक्टोरल फेलो (EU), CSCP Fellow) IMT गाजियाबाद में ऑपरेशंस एवं सप्लाई चेन मैनेजमेंट विभाग की प्रोफेसर और चेयरपर्सन हैं.)
 


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