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बंगाल के जनादेश का सम्मान जरूरी: भरोसा लौटे, गौरव पुनर्जीवित हो, सम्मान स्थापित हो

प्रबल बसु रॉय लिखते हैं, शासन का अगला चरण, चाहे स्थानीय स्तर पर इसका नेतृत्व कोई भी करे, भाषण या इरादों के आधार पर नहीं आंका जाएगा, इसे परिणामों के आधार पर परखा जाएगा.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 5 months ago

आज भारतीय राजनीति में चल रहे बड़े राजनीतिक उथल-पुथल से दूर, मैं स्वीडन के शांत द्वीप गोटलैंड पर बाल्टिक सागर की हवाओं को अपने चेहरे पर महसूस कर रहा हूं. फिर भी मेरे विचार मेरे प्रिय राज्य पश्चिम बंगाल में बदलाव की हवाओं पर केंद्रित हैं.

एक बार फिर संभावना की एक हल्की सी आहट है.

एक ऐसी संभावना कि बंगाल, पाँच दशकों से अधिक के भटकाव के बाद, आखिरकार उस लंबी यात्रा की शुरुआत कर सकता है, जहाँ वह कभी था: भारत का बौद्धिक, सांस्कृतिक और आर्थिक केंद्र. एक ऐसा स्थान जिसने राष्ट्रीय विमर्श को आकार दिया, न कि वह जो केवल अतीत और इतिहास की यादों के सहारे पीछे मुड़कर देखता है.

मेरी पीढ़ी के लिए यह गिरावट केवल एक अवधारणा नहीं रही है. यह एक धीमी, स्पष्ट और गहराई से निराश करने वाली वास्तविकता रही है. लेकिन गिरावट से अधिक पीड़ादायक बात यह रही है, जनादेशों का राजनीतिक दलों द्वारा बार-बार किया गया विश्वासघात.

एक राज्य जो बार-बार उम्मीद करता है और बार-बार इंतजार करता है

वाम मोर्चा ने तीन दशकों से अधिक शासन किया, जिसकी शुरुआत पुनर्वितरण की मजबूत मंशा से हुई थी, लेकिन अंत औद्योगिक ठहराव, पूंजी पलायन और वित्तीय संकट में हुआ. 2011 तक राज्य की वित्तीय स्थिति गंभीर रूप से दबाव में थी, औद्योगिक आधार कमजोर हो चुका था और निवेशकों का भरोसा पूरी तरह टूट चुका था.

उस वर्ष ममता बनर्जी को मिला जनादेश साधारण नहीं था, यह परिवर्तनकारी था. उनकी स्वच्छ छवि के कारण इसमें साफ-सुथरे शासन, प्रशासनिक गरिमा और आर्थिक पुनरुद्धार की उम्मीद थी.

लगभग 15 साल बाद, यह वादा केवल आंशिक रूप से ही पूरा हुआ है.

हालांकि मुख्यमंत्री की व्यक्तिगत लोकप्रियता बनी हुई है, लेकिन शासन के परिणामों पर लगातार सवाल उठते रहे हैं. भ्रष्टाचार के आरोप, जमीनी स्तर पर “तोलबाजी” (वसूली) का फैलाव और स्थानीय प्रशासन का राजनीतिकरण जनता की धारणा को प्रभावित कर रहा है. आम नागरिकों के लिए राज्य से जुड़ाव विशेषकर नगरपालिका और जमीनी स्तर पर अक्षमता, अस्पष्टता और कभी-कभी धमकी से भरा अनुभव बन गया है.

आरजी कर मेडिकल कॉलेज की घटना सार्वजनिक बहस में एक निर्णायक मोड़ बन गई, न केवल अपराध की वजह से, बल्कि इसलिए कि इसने राज्य की जवाबदेही, संस्थागत विश्वसनीयता, कानून-व्यवस्था और सरकार की प्रतिक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े किए.

छोटे कस्बों और अर्ध-शहरी बंगाल में यात्रा करने पर प्रतिक्रिया बेहद समान मिलती है. ऑटो चालक, छोटे व्यापारी, घरेलू कामगार, रिक्शा चालक, राजनीतिक भाषणों से दूर लोग—एक ही बात कहते हैं: कानून-व्यवस्था की चिंता, रोजमर्रा का भ्रष्टाचार, स्थानीय स्तर पर दबाव और कमजोर नागरिक सेवाएं.

यह वैचारिक असंतोष नहीं है. यह आम नागरिक के सम्मानजनक जीवन की व्यावहारिक चिंता है.

गहरी समस्या: आर्थिक प्रदर्शन की विफलता

शासन की कहानी के पीछे एक अधिक गंभीर विफलता छिपी है, अर्थव्यवस्था.

2011 में पश्चिम बंगाल संरचनात्मक कमजोरियों के साथ आगे बढ़ा, लेकिन अगले डेढ़ दशक में यह निवेश-आधारित विकास मॉडल की ओर निर्णायक बदलाव नहीं कर सका. इसके बजाय यह वित्तीय रूप से सीमित रहा, जहाँ संसाधनों का बड़ा हिस्सा कर्ज चुकाने और बढ़ते कल्याण खर्चों में चला गया.

वित्तीय वास्तविकता

पश्चिम बंगाल का कर्ज उसके आर्थिक आकार के मुकाबले सबसे अधिक स्तरों में बना हुआ है. वार्षिक बजट का एक बड़ा हिस्सा पहले से ही इन पर खर्च हो जाता है:

1. ब्याज भुगतान
2. वेतन और प्रशासनिक खर्च
3. कल्याण योजनाएं और सब्सिडी

इससे पूंजीगत व्यय के लिए बहुत सीमित स्थान बचता है, जो दीर्घकालिक विकास का सबसे महत्वपूर्ण कारक है.

पूंजीगत व्यय का अंतर

अन्य बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों के मुकाबले स्थिति स्पष्ट है.

पश्चिम बंगाल का पूंजीगत व्यय लगभग 1.2–1.5 प्रतिशत GSDP है

तमिलनाडु और गुजरात जैसे राज्य लगभग 2.5–3.5 प्रतिशत GSDP खर्च करते हैं

कुल खर्च में पश्चिम बंगाल लगभग 8 प्रतिशत पूंजीगत व्यय करता है, जबकि अग्रणी राज्य 15–18 प्रतिशत तक करते हैं.

लगभग 18 लाख करोड़ रुपये की अर्थव्यवस्था में यह अंतर हर साल 25,000–35,000 करोड़ रुपये के निवेश घाटे के बराबर है.

यह क्यों महत्वपूर्ण है

पूंजीगत व्यय का गुणक प्रभाव बहुत मजबूत होता है. आरबीआई के अनुमान के अनुसार इसका प्रभाव 2.5x–3x तक हो सकता है.

इसका अर्थ है कि बंगाल के इस अंतर को भरने से:

1. मध्यम अवधि में 3–5 प्रतिशत अतिरिक्त वृद्धि हो सकती है
2. निजी निवेश आकर्षित हो सकता है
3. बड़े पैमाने पर रोजगार उत्पन्न हो सकता है

फिर भी बंगाल कम निवेश वाले संतुलन में फंसा हुआ है.

विकास का अंतर

इसके परिणाम स्पष्ट हैं पश्चिम बंगाल की वृद्धि दर लगभग 5–6 प्रतिशत रही है, जबकि तमिलनाडु और गुजरात जैसे औद्योगिक राज्य 7–9 प्रतिशत वृद्धि बनाए रखते हैं. यह अंतर संयोग नहीं है. यह नीति प्राथमिकताओं का परिणाम है.

संरचनात्मक जाल

पश्चिम बंगाल आज एक दुष्चक्र में फंसा है:

उच्च कर्ज → उच्च ब्याज भार → सीमित वित्तीय स्थान → कम पूंजी निवेश → कमजोर औद्योगिक विकास → सीमित राजस्व → लगातार कर्ज

इसके साथ उपभोग-आधारित मॉडल की ओर झुकाव भी स्थिति को और बिगाड़ता है, जहाँ कल्याण खर्च उत्पादक निवेश पर प्राथमिकता ले लेता है.

कल्याण जरूरी है, लेकिन यह विकास का विकल्प नहीं हो सकता.

वे राज्य जिन्होंने कल्याण और निवेश के बीच संतुलन बनाया है, उन्होंने मजबूत औद्योगिक प्रणाली विकसित की है. बंगाल, अपने मजबूत मानव संसाधन, बड़े बाजार और भौगोलिक लाभ के बावजूद, ऐसा नहीं कर पाया है.

औद्योगिक इंजन की कमी

पश्चिम बंगाल स्वाभाविक रूप से एक औद्योगिक और सेवा केंद्र हो सकता था. इसमें है:

- बंदरगाहों तक पहुंच
- पूर्व और पूर्वोत्तर बाजारों की निकटता
- मजबूत शैक्षणिक संस्थान
- बड़ा श्रम बल

फिर भी बड़े औद्योगिक इकोसिस्टम विकसित नहीं हो पाए.

आईटी, लॉजिस्टिक्स, टेक्सटाइल, चमड़ा और हल्की इंजीनियरिंग जैसे क्षेत्र मौजूद हैं, लेकिन वे बिखरे हुए हैं. एकीकृत क्लस्टर, मजबूत बुनियादी ढांचे और नीति निरंतरता की कमी ने विकास को सीमित किया है.

साथ ही निवेशकों की धारणा भी महत्वपूर्ण है, कानून-व्यवस्था, नीति स्थिरता और प्रशासनिक निष्पक्षता को लेकर चिंता बनी रहती है.

नया जनादेश, सीमित समय

जैसे ही पश्चिम बंगाल एक नए राजनीतिक चरण में प्रवेश कर रहा है, विशेषकर भाजपा के लिए जिम्मेदारी बहुत बड़ी है. यह केवल चुनावी अवसर नहीं है, बल्कि एक संरचनात्मक परीक्षा है. पांच प्राथमिकताएं अनिवार्य हैं:

1. निवेश आधारित विकास

उपभोग आधारित ढांचे से हटकर पूंजी निवेश और उत्पादक संपत्ति निर्माण पर ध्यान देना होगा.

2. औद्योगिक इकोसिस्टम बनाना

बिखरे हुए क्षेत्रों से आगे बढ़कर एकीकृत औद्योगिक और सेवा केंद्र विकसित करने होंगे.

3. वित्तीय अनुशासन

राज्य के कर्ज को नियंत्रित करना और खर्च को संतुलित करना जरूरी है.

4. विश्वास बहाल करना

निवेशकों को स्थिर शासन, मजबूत कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक पारदर्शिता चाहिए. बिना इसके कोई नीति सफल नहीं होगी.

5. स्थानीय शासन सुधार

नागरिकों के लिए शासन का अनुभव स्थानीय स्तर पर होता है, इसलिए नगरपालिकाओं और स्थानीय प्रशासन में जवाबदेही जरूरी है.

क्या नहीं करना चाहिए

पश्चिम बंगाल एक सांस्कृतिक रूप से जागरूक समाज है. बाहरी सांस्कृतिक या आहार संबंधी मानकों को थोपने की कोशिशें अस्वीकार की जाएंगी.

नेतृत्व स्थानीय रूप से विश्वसनीय होना चाहिए. शासन पेशेवर और गैर-पक्षपाती होना चाहिए. और जीत को छोटी राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता में नहीं बदलना चाहिए.

एक गहरी संरचनात्मक समस्या भी है, दशकों से बंगाल की राजनीति में स्थानीय दबाव नेटवर्क को सामान्य बना दिया गया है. इसे तोड़ना जरूरी है, वरना यह गिरावट को जारी रखेगा.

विश्वास, एक बार टूट जाए तो फिर से बनाना कठिन होता है

आज पश्चिम बंगाल फिर एक चौराहे पर खड़ा है. जनता ने बार-बार निर्णायक जनादेश दिए हैं, लेकिन अब वे प्रदर्शनहीनता को स्वीकार नहीं करेंगे.

अगला चरण, चाहे जो भी नेतृत्व करे, भाषण या इरादों के आधार पर नहीं, बल्कि ठोस परिणामों के आधार पर आंका जाएगा. भाजपा को यह साबित करना होगा कि वह सिर्फ विचारधारा में नहीं, बल्कि शासन के तरीके, कामकाज और जनता के प्रति जवाबदेही में भी वाम और टीएमसी दोनों से अलग है.

यह पहली बार है जब बंगाल का नेतृत्व राज्य के बाहर के नेताओं के हाथ में होगा. यह इस बात का संकेत है कि यहां के लोग, जो अत्यंत विकसित और सांस्कृतिक रूप से गर्वित हैं, बदलाव की गहरी आवश्यकता महसूस कर रहे हैं. इस भरोसे को तोड़ा नहीं जाना चाहिए.

क्योंकि बंगाल की चुनौती अब अतीत की महिमा वापस पाने की नहीं है.

बल्कि यह साबित करने की है कि वह देश के साथ मिलकर भविष्य बना सकता है.

और भाजपा का “डबल इंजन” सरकार का वादा शायद उसी “परिवर्तन” के जनादेश का कारण बना है.

और दशकों की चूकी हुई संभावनाओं के बाद, यह शायद सबसे महत्वपूर्ण परीक्षा है. मैं आशा करने का साहस रखता हूं.

(डिस्क्लेमर: इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं और प्रकाशन के विचारों को आवश्यक रूप से प्रतिबिंबित नहीं करते.)

अतिथि लेखक: प्रबल बसु रॉय

(प्रबल बसु, लंदन बिजनेस स्कूल के स्लोन फेलो, कॉरपोरेट बोर्ड्स के चेयरमैन के निदेशक और सलाहकार और पूर्व में विभिन्न कंपनियों में ग्रुप सीएफओ रह चुके हैं.)

 


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