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प्रसार भारती में प्रसून होने का महत्व

टाटा मोटर्स के सीएमओ शुभ्रांशु सिंह लिखते हैं, विज्ञापन ने प्रसून जोशी को सटीकता और जटिलता को कुछ यादगार शब्दों में समेटने की क्षमता दी.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 4 months ago

बहुमुखी प्रतिभा उस युग में एक कम आंकी गई बढ़त बन गई है जो विशेषज्ञता का उत्सव मनाता है. हमें यह विश्वास करने के लिए प्रशिक्षित किया गया है कि उत्कृष्टता केवल एक ही क्षेत्र पर ध्यान केंद्रित करने से आती है. इस तर्क के अनुसार, विज्ञापन पेशेवरों को विज्ञापन में, कवियों को कविता में, फिल्म निर्माताओं को सिनेमा में ही रहना चाहिए और इसी तरह आगे.

फिर भी, कभी-कभी एक ऐसा व्यक्तित्व सामने आता है जो इन श्रेणियों को चुनौती देता है और ठीक इसलिए अधिक प्रासंगिक हो जाता है क्योंकि वह इनके बीच आवाजाही करता है.

प्रसून ऐसे ही व्यक्तियों में से एक हैं.

वे केवल कई योग्यताओं वाले एक रचनात्मक पेशेवर नहीं हैं. वे आधुनिक भारत में एक ऐसे विचार का प्रतिनिधित्व करते हैं जो लगातार महत्वपूर्ण हो रहा है लेकिन अभी पूरी तरह विकसित नहीं हुआ है, जिसे ‘ट्राई-सेक्टर एथलीट’ कहा जा सकता है, , ऐसा व्यक्ति जो सामाजिक क्षेत्र, वाणिज्य और सार्वजनिक जीवन में समान दक्षता से काम कर सकता है.

यह क्यों महत्वपूर्ण है?

सबसे बड़े प्रभाव को अनुवाद योग्य होना चाहिए. दुर्भाग्य से, संस्थानों को भावनाओं से जोड़ने, बाजारों को अर्थ से और संचार को स्मृति से जोड़ने की क्षमता हमारे समय में दुर्लभ होती जा रही है, जहाँ कृत्रिम उत्पादन की कोई सीमा नहीं है.

भारत एक ऐसा देश है जहाँ कहानियाँ केवल मनोरंजन नहीं करतीं. भारत में वे सार्वजनिक चेतना को संगठित करती हैं. यहाँ भाषा पहचान वहन करती है. संगीत सामाजिक स्मृति वहन करता है. प्रतीकात्मकता जुड़ाव और पहचान को आकार देती है. ऐसे वातावरण में, सांस्कृतिक सूक्ष्मताओं को समझने वाले संचारक अत्यधिक मूल्यवान हो जाते हैं.

विज्ञापन ने प्रसून को सटीकता दी और जटिल विचारों को कुछ यादगार शब्दों में ढालने की क्षमता दी. कविता ने उन्हें भावनात्मक गहराई दी. सिनेमा ने उनकी रचनाओं को व्यापक पहुंच दी. सार्वजनिक सेवा भूमिकाओं ने उन्हें विविध लोकतंत्र में सत्ता की जिम्मेदारियों और तनावों के करीब लाया.

लेकिन परिणाम कोई बिखरा हुआ करियर नहीं है. इसके विपरीत, यह एक क्रमबद्ध यात्रा है जहाँ एक अनुभव दूसरे को गति देता है.

यह बहुमुखी प्रतिभा पहले से अधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि हम आज ऐसे विश्व में रहते हैं जो सूचना से भरा है लेकिन अर्थ से खाली है.
प्रौद्योगिकी ने वितरण को लोकतांत्रिक बना दिया है. हर कोई प्रकाशित कर सकता है. हर कोई बोल सकता है. लेकिन बहुत कम लोग प्रभाव पैदा कर पाते हैं.

अक्सर सांस्कृतिक जुड़ाव को सजावटी समझ लिया जाता है, जहाँ रणनीति के बाद एक सौंदर्य परत जोड़ दी जाती है. वास्तव में संस्कृति ही रणनीति है. यह तय करती है कि लोग सुनेंगे, भरोसा करेंगे, याद रखेंगे या अस्वीकार करेंगे.

वे संगठन जो संस्कृति को नहीं समझते, वे तेजी से प्रासंगिकता खो देते हैं, चाहे उनका आकार या क्षमता कुछ भी हो. संस्थाएँ केवल बुनियादी ढांचे पर जीवित नहीं रह सकतीं, उन्हें भावनात्मक वैधता की आवश्यकता होती है.

इसी कारण से प्रसार भारती जैसी सार्वजनिक संस्थाओं के भविष्य पर फिर से ध्यान देने की आवश्यकता है. यहाँ भी प्रसून की भूमिका आशावाद का कारण है.

सार्वजनिक प्रसारण पारंपरिक रूप से पहुंच से जुड़ा रहा है. लेकिन डिजिटल युग में, जहाँ एल्गोरिद्म संचालित हैं, पहुंच का मूल्य कम हो गया है जबकि सार्थक जुड़ाव अधिक महत्वपूर्ण हो गया है.

प्रसार भारती का अवसर निजी मीडिया की नकल करने में नहीं है, बल्कि उन चीज़ों को अपनाने में है जिन्हें निजी मीडिया आसानी से नहीं दोहरा सकता, भाषाई गहराई, सांस्कृतिक स्मृति, क्षेत्रीय विविधता और राष्ट्रीय निरंतरता.

भारत के सार्वजनिक प्रसारक के पास सामूहिक चेतना का एक अभिलेख भी है.

इस मूल्य को खोलने के लिए ऐसे लोगों की आवश्यकता है जो कहानी कहने और समाज दोनों को समझते हों. जो संस्थागत उद्देश्य और सांस्कृतिक प्रासंगिकता के बीच सेतु बना सकें. जो समझते हों कि संचार केवल सूचना का प्रसारण नहीं है.

आधुनिक नेतृत्व तेजी से उन लोगों का हो रहा है जो अलग-अलग विषयों को जोड़ सकते हैं, न कि केवल अपने क्षेत्र में सीमित रहना जानते हैं. प्रसून निजी क्षेत्र की लाभ की चाह और राष्ट्रीय एजेंडे को जोड़ सकते हैं.

प्रसून केवल इसलिए सफल नहीं हैं कि वे कई दुनियाओं में चलते हैं, बल्कि इसलिए अधिक सफल हैं क्योंकि वे उन दुनियाओं को एक-दूसरे से संवाद करना सिखा रहे हैं.

मैं उन्हें शुभकामनाएँ देता हूँ.

अतिथि लेखक-सीएमओ, टाटा मोटर्स


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