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दिल्ली में मार्को रुबियो, मेरी मां की Alexa पर गूंजे राजा राम

हंस चुगेगा दाना-दुनका... कौवा मोती खाएगा और भारत सबको उलझन में रखेगा. बैकग्राउंड में बज रहा वह पुराना भजन आधुनिक भू-राजनीति को किसी भी संयुक्त बयान से बेहतर समझता था.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 2 weeks ago

पलक शाह

“रामचंद्र कह गए सिया से, ऐसा कलजुग आएगा…” भजन मेरी मां की एलेक्सा पर बजना शुरू ही हुआ था कि अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो टीवी पर दिखाई दिए. वह नई दिल्ली की झुलसा देने वाली गर्मी में नेवी-ब्लू सूट पहनकर एक काली एसयूवी से उतर रहे थे, चेहरे पर वही भाव था जो राजनयिक उन देशों के लिए रखते हैं जिनकी उन्हें बेहद जरूरत होती है, लेकिन जिन्हें वे पूरी तरह समझ नहीं पाते. उस समय टीवी म्यूट था. भजन नहीं.

“हे.... रामचंद्र कह गए सिया से…”

रुबियो ने अपनी जैकेट ठीक की. कैमरे चमके. जैसे ही मैंने टीवी की आवाज बढ़ाई, जोशीले भारतीय एंकर तीन अलग-अलग सुरों में एक साथ बोलने लगे, एक इसे ऐतिहासिक रणनीतिक साझेदारी बता रहा था, दूसरा चीन की चेतावनी दे रहा था, तीसरा पहले से ही इस बहस में जुट गया था कि क्या भारत आखिरकार अमेरिका का सबसे महत्वपूर्ण सहयोगी बन चुका है.

और उस शोर के पीछे कहीं वह पुराना भजन अब भक्ति गीत कम और इस सदी के लिए बैकग्राउंड म्यूजिक ज्यादा लगने लगा था.

“हंस चुगेगा दाना-दुनका… कौवा मोती खाएगा…”

अमेरिका ने तीस साल वैश्विक व्यवस्था बनाने में लगाए. चीन ने चुपचाप उसके नीचे सप्लाई चेन खड़ी कर दी.

वॉशिंगटन ने नौवहन की स्वतंत्रता पर भाषण लिखे. बीजिंग ने बंदरगाह खरीद लिए. वॉशिंगटन ने देशों पर प्रतिबंध लगाए. बीजिंग ने उन्हीं देशों में हाईवे बनवा दिए. अमेरिका दुनिया का सैन्य मुख्यालय बन गया. चीन दुनिया का गोदाम.

और भारत वह देश बन गया जिसे दोनों पक्ष डिनर पर बुलाते हैं, जबकि मन ही मन यह जांचते रहते हैं कि कहीं वह पहले ही कहीं और खाना तो नहीं खा चुका.

रुबियो दिल्ली आए थे आधुनिक कूटनीतिक थाली लेकर सेमीकंडक्टर सहयोग, इंडो-पैसिफिक स्थिरता, भरोसेमंद सप्लाई चेन, समुद्री साझेदारी, लोकतांत्रिक मूल्य, एआई सहयोग और इन सभी चमकदार शब्दों के नीचे छिपा था वह असली वाक्य, जिसे अब कोई सीधे नहीं कहता.

कृपया चीन को संभालने में हमारी मदद कीजिए.

साउथ ब्लॉक ने उनका गर्मजोशी से स्वागत किया. मुस्कानें. हाथ मिलाना. बेहद सावधानी से तैयार किए गए दृश्य. कहीं एयर-कंडीशंड मीटिंग रूम्स के भीतर “साझा रणनीतिक हित” जैसे वाक्य चमकती टेबलों पर तैर रहे थे.

और कहीं दूसरी स्क्रीन पर शायद भारतीय अधिकारी अब भी रियायती रूसी कच्चे तेल की खेपों पर नजर रखे हुए थे, जो भारतीय बंदरगाहों में पहुंच रही थीं.

“कदम कदम पर करेंगे दोनों अपनी-अपनी मनमानी…”

हर कदम पर हर कोई अपना-अपना एजेंडा चला रहा है.

इस भजन की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह कभी गुस्से में नहीं लगता. यह मुस्कुराता हुआ लगता है. जैसे राजा रामचंद्र जी ने यह सब पहले ही देख लिया हो और तय कर लिया हो कि इसका सबसे समझदारी भरा जवाब हल्की-सी निराशा ही हो सकता है.

क्योंकि आखिर भारत-अमेरिका संबंध अब हैं क्या?

यह पुराने जमाने वाली दोस्ती तो बिल्कुल नहीं है. दोस्त चुनावी वर्षों में टैरिफ की धमकी नहीं देते और खामोश तख्तापलट की योजना नहीं बनाते. दोस्त आपसे रूसी तेल खरीद कम करने को नहीं कहते, जबकि उन्हें खुद चीन पर निर्भरता कम करने के लिए आपकी जरूरत हो.

यह कुछ और है. शायद इसे रणनीतिक डेटिंग कहा जा सकता है.

अमेरिका बार-बार कहता है “साझा लोकतांत्रिक मूल्य.” भारत बार-बार कहता है “रणनीतिक स्वायत्तता.” दोनों शालीनता से सिर हिलाते हैं, जबकि दोनों का मतलब पूरी तरह अलग होता है.

अमेरिका चाहता है कि भारत चीन को संतुलित करने लायक करीब रहे.

भारत चाहता है कि अमेरिका इतना उपयोगी रहे कि वह सबको संतुलित कर सके.

“हे जी रे…”

टीवी पर कैमरे रुबियो के काफिले का पीछा कर रहे थे, जो दिल्ली की सड़कों से गुजर रहा था. हेडलाइंस चिल्ला रही थीं, ALLIANCE, PIVOTAL MOMENT, NEW ERA.

और फिर भी दिल्ली खुद इस पूरे घटनाक्रम को लेकर पूरी तरह शांत दिख रही थी. मेरे लिए सबसे दिलचस्प बात यही थी.

क्योंकि भारत धीरे-धीरे यह खेल बहुत अच्छी तरह खेलने लगा है.

रूसी तेल खरीदो. QUAD में शामिल हो. BRICS में जाओ. वॉशिंगटन के साथ रक्षा सौदे करो. तेहरान से बातचीत करो. मॉस्को को आंख मारो. यूरोप से हाथ मिलाओ. इसे “मल्टी-अलाइनमेंट” कहो और आगे कुछ भी समझाने से इनकार कर दो.

अमेरिकी अब भी कभी-कभी ऐसे व्यवहार करते हैं जैसे भारत भविष्य का सहयोगी हो. दिल्ली ऐसे व्यवहार करती है जैसे वह एक ऐसी सभ्यता हो जिसने पुर्तगालियों, ब्रिटिशों, सोवियतों और अब  शानदार ब्रांडिंग के साथ अमेरिकियों को विश्व-व्यवस्था के सिद्धांतों के साथ आते-जाते देखा हो.

फिर बातचीत का रुख अनिवार्य रूप से डोनाल्ड ट्रंप की ओर मुड़ गया. क्योंकि आधुनिक भू-राजनीति अब ट्रंप पैकेज के साथ ही आती है, चाहे किसी को पसंद हो या नहीं.

अगर रुबियो संस्थागत अमेरिका का प्रतिनिधित्व करते हैं, तो ट्रंप उस स्थिति का प्रतिनिधित्व करते हैं जब वही संस्थान रात 2 बजे ट्विटर खोलकर तय कर ले कि ईमानदारी शायद कूटनीति से ज्यादा मनोरंजक है.

पिछले अमेरिकी राष्ट्रपति नैतिक गंभीरता के साथ साम्राज्य चलाते थे. ट्रंप ने NATO, यूक्रेन, जलवायु समझौतों और व्यापार गठबंधनों को देखा और मूल रूप से वही सवाल पूछा जो हर महाशक्ति बहुत ज्यादा युद्धों और बहुत ज्यादा कर्ज के बाद पूछती है.

“आखिर हमें इससे मिल क्या रहा है?”

और अचानक पूरी वैश्विक व्यवस्था को भरोसे की समस्या हो गई.

ट्रंप के दौर में गठबंधन अब सब्सक्रिप्शन सर्विस जैसे लगते हैं. यूरोप घबरा गया, जैसे कोई पुराना ग्राहक यह सुन ले कि कंपनी बंद होने वाली है. चीन चुप रहा और उत्पादन करता रहा. भारत शांत बैठा रहा, जैसे बाजार की उथल-पुथल में कोई अनुभवी स्टॉक ट्रेडर.

क्योंकि दिल्ली एक ऐसी बात समझती है, जिसे वॉशिंगटन अब भी पूरी तरह नहीं समझ पाया.

पूर्वानुमेय देश निर्भरता बन जाते हैं. अप्रत्याशित देश आवश्यकता बन जाते हैं.

“राजा और प्रजा दोनों में होगी निस दिन खींचातानी…”

ज्ञानी रामचंद्र जी ने कहा था, लगातार खींचतान चलती रहेगी.

सिर्फ शासकों और जनता के बीच नहीं. सहयोगियों के बीच. बाजारों के बीच. मूल्यों और हितों के बीच. भाषणों और शिपिंग रूट्स के बीच, खासकर शिपिंग रूट्स के बीच.

ट्रंप युग में आधुनिक नैतिकता और भू-राजनीति अब तेल की कीमतों के हिसाब से बदलती है. रूसी कच्चा तेल तब तक अस्वीकार्य है, जब तक महंगाई नहीं बढ़ती. चीनी तकनीक तब तक खतरनाक है, जब तक तिमाही मुनाफा उसी पर निर्भर न हो जाए. खाड़ी देशों की राजशाहियां हर बार रणनीतिक साझेदार बन जाती हैं जब संप्रभु संपत्ति का पैसा कमरे में प्रवेश करता है और लोकतंत्र पीछे की सीट पर चला जाता है. नॉर्वे के किसी पत्रकार के लिए भारत की प्रेस स्वतंत्रता मुद्दा रहती है, जब तक प्रधानमंत्री मोदी ऊर्जा गठबंधन पर सहमति न दे दें.

दुनिया अब विचारधारा पर नहीं चलती. दुनिया अपवादों पर चलती है.

“हे जी रे… हे जी रे…”

और इस सबके बीच चीन बहुत कम बोलता है. यही बात बीजिंग को असहज रूप से ताकतवर बनाती है. अमेरिका प्रेस कॉन्फ्रेंस करता है. चीन फैक्ट्रियां बनाता है.

जब वॉशिंगटन लोकतंत्र और गठबंधनों पर बहस करता है, तब बीजिंग चुपचाप बैटरियां, सोलर पैनल, टेलीकॉम उपकरण, ईवी कंपोनेंट्स और आधुनिक सभ्यता को चलाने वाली आधी चीजें नाश्ते से पहले बना चुका होता है.

अमेरिका महासागरों को नियंत्रित करता है. चीन उन कंटेनरों के भीतर मौजूद चीजों को नियंत्रित करता है जो उन महासागरों को पार करते हैं. और भारत नियंत्रित करता है अनिश्चितता को.

और अनिश्चितता अब भू-राजनीति की सबसे महंगी वस्तु बन चुकी है.

शाम तक रुबियो की बैठकें खत्म हो चुकी थीं. एक और संयुक्त बयान जारी हुआ, जिसमें “गहरे होते सहयोग”, “भरोसेमंद साझेदारी” और “मुक्त एवं खुले इंडो-पैसिफिक के प्रति साझा प्रतिबद्धता” जैसे वाक्य भरे हुए थे.

टीवी स्टूडियो एक और कूटनीतिक जीत का जश्न मना रहे थे. विशेषज्ञ डिजिटल नक्शों पर तीर बनाना शुरू कर चुके थे.

बाहर दिल्ली का ट्रैफिक हमेशा की तरह चल रहा था, आक्रामक, रहस्यमय, और उपलब्ध सभी सबूतों के बावजूद किसी तरह काम करता हुआ.

भजन अब भी मेरे मन में धीमे-धीमे बज रहा था.

“धरम भी होगा, करम भी होगा, परंतु शर्म नहीं होगी…”

नैतिकता भी होगी. धर्म भी होगा. लेकिन शर्म नहीं होगी. वह चुपचाप भू-राजनीति से निकल चुकी है.

अरब सागर के ऊपर कहीं तेल टैंकर अब भी भारत की ओर बढ़ रहे थे. बीजिंग में कहीं एक और फैक्ट्री लाइन शुरू हो चुकी थी. अमेरिका में कहीं ट्रंप शायद गोल्फ की उपमाओं में वैश्विक व्यापार समझा रहे थे.

और कहीं राजा रामचंद्र जी शायद इस सारे शोर, इन सम्मेलनों, इन रणनीतिक साझेदारियों, मेज के नीचे ताकत का हिसाब लगाते हुए एक-दूसरे पर मुस्कुराते देशों को देख रहे थे और धीरे से सिया से कह रहे थे.

“ऐसा कलयुग आएगा...” (मैंने तुम्हें कलयुग के बारे में पहले ही चेतावनी दी थी).

पलक शाह, BW रिपोर्टर्स

(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
 


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