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रणनीतिक रिजर्व एसेट के रूप में तेल: सप्लाई चेन जोखिम के खिलाफ भारत का संप्रभु सुरक्षा कवच

भारत के पास लगभग 700 अरब अमेरिकी डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार है, जो मुख्य रूप से अमेरिकी और गैर-अमेरिकी ट्रेजरी, सोना और IMF के स्पेशल ड्रॉइंग राइट्स से बना है. फिर भी देश की सबसे बड़ी व्यापक आर्थिक कमजोरी, कच्चे तेल, LNG और LPG पर निर्भरता के खिलाफ मौजूदा रिजर्व संरचना में कोई समान सुरक्षा मौजूद नहीं है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 5 months ago

भारत के पास लगभग 700 अरब अमेरिकी डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार (FCAs) है,  जिनमें मुख्य रूप से अमेरिकी/गैर-अमेरिकी ट्रेजरी (80%), सोना (17%), और SDRs + IMF रिजर्व (3%) शामिल हैं. लेकिन भारत का सबसे बड़ा मैक्रो-रिस्क मुद्रा संकट नहीं है, यह स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज संकट है.

भारत के 85% से अधिक कच्चे तेल, 50% से अधिक एलएनजी और 60% एलपीजी की आपूर्ति दुनिया के सबसे संवेदनशील ऊर्जा मार्ग से होकर गुजरती है. हॉर्मुज में हर तनाव भारत को कच्चे तेल की कीमतों में उछाल, एलएनजी की कमी, उर्वरक सब्सिडी के बढ़ते बोझ, महंगाई और रुपये पर दबाव के रूप में प्रभावित करता है.

फिर भी भारत की किसी भी रिजर्व एसेट में इस जोखिम के खिलाफ सुरक्षा नहीं है.

यह एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा करता है कि क्या भारत को कच्चे तेल को भी उसी तरह रिजर्व एसेट मानना चाहिए, जैसे वह सोने को मानता है?

500 मिलियन बैरल (~40 अरब अमेरिकी डॉलर) के बराबर रिजर्व हिस्सा भारत के कुल रिजर्व का केवल 5–6% होगा. लेकिन यह सीधे उसी झटके से सुरक्षा देगा, जो भारत को सबसे अधिक प्रभावित करता है. सोना एक सुरक्षित निवेश (सेफ-हेवन) एसेट है. कच्चा तेल एक रणनीतिक कमजोरी वाला एसेट है. और यहां एक दूसरा विचार भी है, जिस पर चर्चा की जा सकती है:

क्या भारत को अपनी विदेशी मुद्रा रिजर्व संरचना में दुर्लभ खनिजों (Rare Earths) और रणनीतिक मिनरल्स का भी एक छोटा हिस्सा शामिल करना चाहिए? उदाहरण के तौर पर, परिचालन उपयोग के लिए नहीं, बल्कि EV, मैग्नेट, इलेक्ट्रॉनिक्स और रक्षा क्षेत्रों में संभावित सप्लाई-चेन हथियारकरण से बचाव के लिए करीब 5 अरब अमेरिकी डॉलर का रणनीतिक भंडार बनाया जा सकता है.

यह कोई सिफारिश नहीं है. यह केवल एक वैचारिक मूल्यांकन है कि क्या भारत की रिजर्व संरचना को देश की वास्तविक रणनीतिक कमजोरियों को भी प्रतिबिंबित करना चाहिए, न कि सिर्फ वैश्विक वित्तीय परंपराओं का पालन करना चाहिए. 

वार्षिकीकृत इम्प्लाइड वोलैटिलिटी (IV) की तुलना इस बात को स्पष्ट करती है:

1. सोना IV (वार्षिकीकृत): 15–20%
2. ब्रेंट क्रूड IV (वार्षिकीकृत): 35–40%
3. अमेरिकी डॉलर एसेट्स: कम वोलैटिलिटी, लेकिन हॉर्मुज-जनित झटकों के खिलाफ शून्य सुरक्षा
4. Value-at-Risk (VaR) के आंकड़े इस अंतर को और स्पष्ट करते हैं:
5. क्रूड (40 अरब डॉलर का हिस्सा): ~2.0–2.3 अरब डॉलर 1-दिवसीय 99% VaR
6. सोना (40 अरब डॉलर का हिस्सा): ~0.9–1.2 अरब डॉलर 1-दिवसीय 99% VaR
7. USD एसेट्स: ~0.1–0.2 अरब डॉलर 1-दिवसीय 99% VaR

हालांकि रिजर्व प्रबंधन Mark-to-Market (MTM) आधारित नहीं होता, लेकिन तनाव की स्थिति में वोलैटिलिटी बैलेंस शीट की संवेदनशीलता और बाहरी झटकों को झेलने की क्षमता का उपयोगी संकेत देती है. और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हॉर्मुज जैसे संकट में अधिक VaR और अधिक IV वास्तव में आपके पक्ष में काम करते हैं. वही, वोलैटिलिटी जो कागज पर कच्चे तेल को “ज्यादा जोखिमपूर्ण” बनाती है, भारत को सबसे अधिक जरूरत के समय MTM लाभ देती है. सोना और USD एसेट्स स्थिर रहते हैं जबकि कच्चे तेल की कीमतें उछलती हैं, जिससे कच्चा तेल एकमात्र ऐसा रिजर्व एसेट बन जाता है जिसकी तनाव-आधारित वोलैटिलिटी भारत के वास्तविक बाहरी झटकों के अनुरूप है.

तेल की कीमतों में 10% वृद्धि भारत के आयात बिल को लगभग 15 अरब डॉलर बढ़ा देती है. वही वृद्धि कच्चे तेल रिजर्व हिस्से का मूल्य लगभग 4 अरब डॉलर बढ़ा देती है. सोना इस झटके से सुरक्षा नहीं देता. USD एसेट्स भी नहीं.

ऑप्शंस मार्केट भी इस बात को मजबूत करते हैं: तेल का IV लगातार अधिक रहता है, जिसमें मजबूत अपसाइड स्क्यू होता है, यानी बाजार तेल की कीमतों में बड़े उछाल के जोखिम को अधिक महत्व दे रहा है, न कि सोने की कीमतों में उछाल को.

केवल तभी कच्चा तेल VaR, IV और MTM तनाव जैसे सख्त वित्तीय जोखिम मानकों पर सोने और USD एसेट्स की तुलना में बेहतर साबित होता है, तो अगला सवाल यह है कि भारत को इस रिजर्व हिस्से को वास्तव में कैसे रखना चाहिए.

इसके दो बिल्कुल अलग रास्ते हैं:

1. भौतिक रिजर्व हिस्सा (RBI स्वामित्व, ISPRL/SPV के माध्यम से संचालन)

500 मिलियन बैरल का भौतिक हिस्सा (तुलना में चीन के पास 1200 मिलियन बैरल से अधिक का SPR है), मौजूदा भूमिगत भंडारण क्षमता से अतिरिक्त, जिसे ISPRL या किसी विशेष SPV द्वारा संचालित किया जाए लेकिन आर्थिक स्वामित्व RBI के पास हो. इस क्षमता के निर्माण पर 20–25 अरब डॉलर की लागत आएगी, जिसे भारत सरकार द्वारा वित्तपोषित किया जाएगा. इससे भारत को मौजूदा और नियोजित SPR + व्यावसायिक स्टॉक के ऊपर लगभग 100 दिनों का अतिरिक्त कच्चा तेल सुरक्षा कवच मिलेगा.

40–50 अरब डॉलर को ब्याज देने वाली एसेट्स (US Treasuries/FCAs) से हटाकर बिना ब्याज वाले कच्चे तेल में लगाने का अर्थ वार्षिक ब्याज आय का नुकसान भी है. मौजूदा अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड पर यह छोड़ी गई आय महत्वपूर्ण है और इसे SPR के परिचालन खर्च, जैसे भंडारण रखरखाव, साइक्लिंग लागत और संचालन खर्च के साथ जोड़कर देखना होगा. यह वही समझौता है जो हर देश रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व बनाते समय करता है: आप रणनीतिक सुरक्षा, सप्लाई आश्वासन और संकट के समय विकल्प के बदले यील्ड का त्याग करते हैं.

इसका लाभ यह है कि हॉर्मुज संकट की स्थिति में भारत के पास वित्तीय सुरक्षा के साथ-साथ वास्तविक कच्चा तेल भी होगा, जिसे डीजल, पेट्रोल और ATF में बदला जा सकेगा.

2. ICE Brent में 500 मिलियन बैरल की लॉन्ग पोजिशन रखने वाला वित्तीय SPV

एक अलग SPV, जो ICE Brent फ्यूचर्स में 500 मिलियन बैरल के बराबर स्थायी लॉन्ग पोजिशन रखे, जिसमें मार्जिन कॉल, मासिक सेटलमेंट और P&L वोलैटिलिटी जैसी सभी जटिलताएं शामिल हों. लेकिन इस मॉडल में कई संरचनात्मक कमजोरियां हैं, जो इसे इस पैमाने पर संप्रभु सुरक्षा कवच के रूप में अनुपयुक्त बनाती हैं:

- मार्केट साइज सीमा: ICE Brent OI (ओपन इंटरेस्ट) आमतौर पर 2.2–2.8 अरब बैरल होता है. 500 मिलियन बैरल की लॉन्ग पोजिशन कुल OI का 18–22% होगी. कोई भी संप्रभु इकाई पूरे बाजार के पांचवें हिस्से को लंबे समय तक नहीं रख सकती, बिना खुद बाजार बन जाए.

- पूर्वानुमानित रोल = निश्चित फ्रंट-रनिंग: हर महीने इस पैमाने की रोलिंग स्पष्ट, पूर्वानुमेय और अपरिहार्य होगी. बैंक, हेज फंड और फिजिकल ट्रेडर्स इस रोल को पहले से भांपकर स्प्रेड बढ़ाएंगे और व्यवस्थित रूप से मूल्य निकालेंगे.

- कॉनटैंगो नुकसान: केवल लॉन्ग फ्यूचर्स पोजिशन कॉनटैंगो बाजार (बढ़ती कीमत संरचना) में संरचनात्मक रूप से पैसा गंवाती हैं. इस पैमाने पर SPV को हर साल सैकड़ों मिलियन डॉलर का रोलओवर नुकसान होगा, यह सुरक्षा कवच नहीं बल्कि संरचनात्मक टैक्स जैसा होगा.

- बेसिस रिस्क: पेपर ब्रेंट ≠ फिजिकल ब्रेंट ≠ मुर्बन ≠ बॉनी लाइट ≠ अरब लाइट. हॉर्मुज संकट में फिजिकल ग्रेड्स की कीमतें पेपर ब्रेंट से अधिक बढ़ती हैं. फ्यूचर्स बुक लाभ दिखा सकती है, लेकिन भारत का वास्तविक कच्चा तेल बास्केट और महंगा हो जाएगा.

- कोई वास्तविक आपूर्ति नहीं: जब भौतिक आपूर्ति हॉर्मुज बाधा के पीछे फंस जाए, तब केवल लॉन्ग ब्रेंट फ्यूचर्स भारतीय उपभोक्ताओं के लिए डीजल, पेट्रोल या ATF नहीं बना सकते. कागज पर लाभ हो सकता है, लेकिन रिफाइनरी गेट पर तेल नहीं होगा.

- नियामकीय और एकाग्रता जोखिम: ICE कभी भी किसी एक इकाई को अनिश्चितकाल तक 20% ओपन इंटरेस्ट रखने की अनुमति नहीं देगा. पोजिशन-लिमिट छूट, रिपोर्टिंग आवश्यकताएं और बाजार हेरफेर की चिंताएं तुरंत सामने आएंगी.

निष्कर्ष 

500 मिलियन बैरल की स्थायी लॉन्ग फ्यूचर्स पोजिशन न तो व्यावहारिक है, न ही प्रभावी और न ही रणनीतिक रूप से मजबूत. यह किसी सुरक्षा कवच की तरह काम करने के बजाय एक बड़ा वित्तीय जोखिम बन सकती है.

यहीं सबसे बड़ा रणनीतिक सवाल खड़ा होता है.

अगर भारत के लिए सबसे बड़ा आर्थिक जोखिम तेल है, तो फिर देश की रिजर्व संरचना में तेल ही क्यों शामिल नहीं है? और क्या दुर्लभ खनिजों (Rare Earths) व रणनीतिक मिनरल्स में छोटे स्तर पर निवेश की संभावना का गंभीरता से मूल्यांकन नहीं होना चाहिए, खासकर तेल, सोना और डॉलर से जुड़े जोखिमों के साथ?

अब समय आ गया है कि भारत अपनी रिजर्व रणनीति पर नए सिरे से विचार करे. 

(डिस्क्लेमर: इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं और जरूरी नहीं कि वे प्रकाशन के विचारों को प्रतिबिंबित करें.)

अतिथि लेखक: महेंद्र के. श्रीखंडे

(लेखक हेलिकॉन कंसल्टिंग में एसोसिएट पार्टनर हैं. उनसे [info@heliconconsulting.com] पर संपर्क किया जा सकता है.)

 


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