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खाड़ी युद्ध की लागत: कहीं न पहुंचने वाली राह
लेखक हरदयाल कहते हैं, कहीं न पहुंचने वाली इस यात्रा में, अमेरिकी संघीय सरकार अब तक लगभग 29 अरब अमेरिकी डॉलर की प्रत्यक्ष परिचालन लागत वहन कर चुकी है; अमेरिका को हुए कुल आर्थिक नुकसान का अनुमान 631 अरब डॉलर से 1 ट्रिलियन डॉलर तक लगाया गया है.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 hour ago
कहीं न पहुंचने वाली इस यात्रा में, अमेरिकी संघीय सरकार अब तक लगभग 29 अरब अमेरिकी डॉलर की प्रत्यक्ष परिचालन लागत वहन कर चुकी है. अमेरिका को हुए कुल आर्थिक नुकसान का अनुमान 631 अरब डॉलर से 1 ट्रिलियन डॉलर तक लगाया गया है.
प्रसिद्ध इतिहासकार अर्नोल्ड टॉयनबी लिखते हैं कि महाशक्तियां नष्ट नहीं की जातीं, वे स्वयं को नष्ट कर लेती हैं. इस अवलोकन में एक प्रसिद्ध तथ्य निहित है: अत्यधिक अहंकार के कारण वे अनावश्यक युद्धों में उलझ जाती हैं; अपने और दूसरों के लोगों पर भारी लेकिन टाली जा सकने वाली लागत थोपती हैं; आर्थिक और सैन्य रूप से स्वयं को अत्यधिक फैलाव में ले जाती हैं; देश और विदेश दोनों में अलोकप्रिय हो जाती हैं; अपनी सॉफ्ट पावर खो देती हैं; और अंततः अपना सर्वोच्च दर्जा गंवा देती हैं.
और अमेरिका के साथ भी यही हो रहा है. ईरान भले ही बुरी तरह प्रभावित हुआ हो, लेकिन अमेरिका अपने किसी भी रणनीतिक उद्देश्य को हासिल करने के करीब नहीं है. लगभग 50 नेताओं के सफाए के बाद भी ईरानी शासन कायम है; उसके पास अब भी 60 प्रतिशत तक समृद्ध 440 किलोग्राम यूरेनियम का नियंत्रण है, और भले ही उसकी क्षमता कमजोर हुई हो, लेकिन पड़ोसी देशों पर मिसाइल दागने की उसकी क्षमता पूरी तरह खत्म नहीं हुई है. अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी के बावजूद, ईरान अब भी होर्मुज जलडमरूमध्य पर पर्याप्त नियंत्रण बनाए हुए है.
कहीं न पहुंचने वाली इस यात्रा में, अमेरिकी संघीय सरकार अब तक लगभग 29 अरब अमेरिकी डॉलर की प्रत्यक्ष परिचालन लागत वहन कर चुकी है; अमेरिका को हुए कुल आर्थिक नुकसान का अनुमान 631 अरब डॉलर से 1 ट्रिलियन डॉलर तक लगाया गया है. आज अमेरिका का अपने से कहीं छोटी शक्ति पर अपनी इच्छा थोप पाने में असमर्थ होना शायद इस बात का संकेत है कि दुनिया बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर बढ़ रही है. लंबे समय में, अमेरिका संभवतः कई वैश्विक शक्ति केंद्रों में से केवल एक रह जाएगा, जबकि अन्य संभावित शक्ति केंद्र रूस, चीन, यूरोप और शायद भारत हो सकते हैं.
विशाल आर्थिक लागत
नई व्यवस्था की ओर संक्रमण के दौर अराजक और पीड़ादायक हो सकते हैं; खाड़ी संकट भी इससे अलग नहीं है. इसने हर जगह आपूर्ति श्रृंखलाओं को बाधित किया है. अमेरिका में पेट्रोल की औसत कीमत लगभग दोगुनी होकर 4.23 डॉलर प्रति गैलन से ऊपर पहुंच गई है. यूरोप एक कठिन सर्दी का सामना कर रहा है, और गैस की कीमतों में 47 प्रतिशत की वृद्धि हुई है. विमानन ईंधन की कीमत दोगुनी हो गई है, जिसके कारण उड़ानों की रद्दीकरण और कुछ यूरोप-एशिया मार्गों पर हवाई किराए में 560 प्रतिशत तक की वृद्धि हुई है. इस युद्ध के कारण दुनिया को भारी आर्थिक नुकसान हुआ है और यदि यह जारी रहा तो यह और बढ़ेगा. भले ही यह तुरंत समाप्त हो जाए, सामान्य स्थिति लौटने में समय लगेगा. तब तक दुनिया चुपचाप पीड़ा सहती रहेगी.
भारत भी इससे अछूता नहीं है. वह अपने कच्चे तेल का लगभग 42-45 प्रतिशत और एलपीजी की जरूरत का लगभग 90 प्रतिशत खाड़ी देशों से आयात करता है. इसलिए उसकी अर्थव्यवस्था इस संकट के प्रति बेहद संवेदनशील है. इसके बावजूद, केंद्र सरकार ने तेल और गैस के आयात में विविधता लाकर तथा सब्सिडी और उत्पाद शुल्क में कटौती के माध्यम से उपभोक्ताओं पर असर को कम करके संकट को काफी हद तक संभाल लिया है. लेकिन यह कब तक संभव होगा? ब्रेंट क्रूड की वर्तमान कीमत 104 डॉलर है, और तेल कंपनियां प्रतिदिन 1600 से 1700 करोड़ रुपये का नुकसान उठा रही हैं. प्रधानमंत्री को मितव्ययिता योजना पेश करने के लिए मजबूर होना पड़ा है. जहां भी मेट्रो उपलब्ध हो, उससे यात्रा करें; कार पूल बनाएं; विदेश की अनावश्यक यात्राओं से बचें; यदि संभव हो तो घर से काम करें, वे हम सभी से ऊर्जा संसाधनों को बचाने की अपील कर रहे हैं.
इसके प्रभाव
आर्थिक सर्वेक्षण ने वित्त वर्ष 2026 के लिए भारत की जीडीपी वृद्धि दर 7.4 प्रतिशत आंकी है. वित्त वर्ष 2027 में यह आरबीआई के अनुसार 6.9 प्रतिशत और मूडीज़ के अनुसार 6 प्रतिशत तक घट सकती है. इस गिरावट के बावजूद, देश की अर्थव्यवस्था संभवतः अब भी अन्य बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में तेजी से बढ़ेगी, लेकिन इससे ज्यादा राहत नहीं मिलेगी.
तेल और गैस की कीमतों में वृद्धि और आपूर्ति की कमी का असर पहले ही कुछ उद्योगों और व्यवसायों पेंट, कांच, कीटनाशक और उर्वरक, छोटे रेस्तरां और ढाबों आदि पर पड़ना शुरू हो गया है. इनमें से कुछ बंद हो चुके हैं, जिससे रोजगार का नुकसान हुआ है, जबकि अन्य को कीमतों में वृद्धि का बोझ अपने ग्राहकों पर डालना पड़ा है, जिनमें से कई दिहाड़ी मजदूर हैं और भोजन के लिए अधिक कीमत चुकाने की स्थिति में नहीं हैं.
यह संकट केंद्र सरकार की वित्तीय स्थिति पर दबाव डालेगा, और उसके लिए 4.4 प्रतिशत के राजकोषीय घाटे के बजटीय लक्ष्य को हासिल करना कठिन हो सकता है. उर्वरक सब्सिडी बढ़ना तय है. अर्थव्यवस्था में धीमी वृद्धि का मतलब कम कर संग्रह होगा. निकट भविष्य में महंगाई बढ़ने की उम्मीद है, हालांकि यह आग की तरह नहीं फैलेगी, लेकिन वर्तमान 2.8 प्रतिशत से बढ़कर 4.8 प्रतिशत तक पहुंच सकती है. इसी तरह, चालू खाता घाटा, जो वस्तुओं और सेवाओं के आयात पर होने वाले व्यय तथा निर्यात और विदेशी प्रेषण के बीच का अंतर है, लगभग 1 प्रतिशत बढ़कर 0.5 प्रतिशत से 1.5 प्रतिशत तक पहुंच सकता है.
भारत अकेला उदाहरण नहीं है. कोविड जैसी इस स्थिति में, एक के बाद एक देशों ने एक सनकी राष्ट्रपति के विदेश नीति संबंधी फैसलों का असर झेला है कुछ ने दूसरों की तुलना में अधिक. उन्होंने कई देशों के साथ अपने संबंधों को खतरे में डाल दिया है, जिनमें से कुछ को दशकों की मेहनत से विकसित किया गया था.
किस उद्देश्य के लिए, श्री ट्रंप?
(डिस्क्लेमर: इस कॉलम में व्यक्त विचार लेखक के हैं और जरूरी नहीं कि वे BW Businessworld या उसकी संपादकीय टीम के विचारों को प्रतिबिंबित करते हों.)
अतिथि लेखक: हरदयाल सिंह
(लेखक आयकर विभाग के मुख्य आयुक्त रह चुके हैं और "द मॉरल कम्पास - फाइंडिंग बैलेंस एंड पर्पस इन एन इम्परफेक्ट वर्ल्ड", हार्पर कॉलिन्स इंडिया, 2022 के लेखक हैं.)
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