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विनेश फोगाट विवाद और खेल प्रशासन की खामियां

लेखक अतुल पांडे के अनुसार, विनेश फोगाट और भारतीय कुश्ती संघ के बीच जारी टकराव अब केवल एक खिलाड़ी और खेल प्रशासक के बीच का विवाद नहीं रह गया है. यह मामला अब भारतीय खेल प्रशासन की संरचना और उसकी पारदर्शिता पर बड़े सवाल खड़े कर रहा है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 4 months ago

विनेश फोगाट और भारतीय कुश्ती संघ (Wrestling Federation of India) के बीच जारी टकराव अब केवल एक खिलाड़ी और खेल प्रशासक के बीच का विवाद नहीं रह गया है. यह मामला अब भारतीय खेल प्रशासन की संरचना और उसकी पारदर्शिता पर बड़े सवाल खड़े कर रहा है. खिलाड़ी चयन, अनुशासनात्मक प्रक्रियाओं, पात्रता नियमों और प्रशासनिक पारदर्शिता को लेकर लगातार उठते विवाद भारतीय खेल संघों में गहरी संस्थागत समस्याओं की ओर इशारा करते हैं.

हालिया विवाद में विनेश फोगाट ने WFI के उस फैसले को चुनौती दी है, जिसमें उन्हें प्रतियोगिता में भाग लेने से रोका गया और उनकी वापसी से जुड़े नियमों की संघ द्वारा की गई व्याख्या पर सवाल उठाए गए. इससे यह साफ होता है कि भारतीय खिलाड़ी अक्सर योग्यता के आधार पर प्रतिस्पर्धा करने के बजाय अस्पष्ट प्रशासनिक व्यवस्थाओं से जूझते नजर आते हैं. सवाल सिर्फ यह नहीं है कि नियमों के अनुसार संघ सही है या गलत. बड़ा मुद्दा यह है कि क्या भारतीय खेल प्रशासन अत्यधिक व्यक्तिवादी और मनमाने ढंग से संचालित हो गया है.

किसी भी खेल व्यवस्था का मूल सिद्धांत यह होना चाहिए कि खिलाड़ी का प्रदर्शन और उसका हित सर्वोच्च प्राथमिकता हो. खेल संघों का उद्देश्य खेल उत्कृष्टता को बढ़ावा देना होना चाहिए, न कि नौकरशाही नियंत्रण का केंद्र बनना. लेकिन भारत के कई खेल संघों में खिलाड़ी आज भी अनौपचारिक सत्ता संरचनाओं, बदलते प्रशासनिक गुटों और अपारदर्शी चयन प्रक्रियाओं पर निर्भर रहते हैं. हाल ही में युवा कार्य एवं खेल मंत्रालय द्वारा भारतीय मुक्केबाजी महासंघ में कथित अपारदर्शी चयन प्रक्रियाओं को लेकर हस्तक्षेप करना यह दिखाता है कि समस्या केवल कुश्ती तक सीमित नहीं है.

एक संघ नहीं, व्यापक समस्या

ऐसी संस्थागत कमजोरियां अन्य खेलों में भी दिखाई देती हैं. भारतीय बैडमिंटन ने वैश्विक सफलता हासिल करने के बावजूद खुद को पूरी तरह व्यावसायिक रूप से विकसित नहीं किया है. प्रीमियर बैडमिंटन लीग (PBL) को लेकर लगातार बनी अनिश्चितता और इसके स्थगन ने यह दिखाया है कि खेल संघ स्थायी व्यावसायिक ढांचा तैयार करने में संघर्ष कर रहे हैं.

वॉलीबॉल ने अलग रास्ता अपनाया है, जहां निजी क्षेत्र द्वारा संचालित लीग पारंपरिक संघ मॉडल से बाहर उभर रही हैं. वहीं एथलेटिक्स फेडरेशन ऑफ इंडिया को लेकर भी समय-समय पर पारदर्शिता, खिलाड़ी प्रबंधन और संस्थागत जवाबदेही पर सवाल उठते रहे हैं.

खेल प्रशासन का पेशेवरकरण जरूरी

यही वजह है कि भारतीय खेल संघों में अब पेशेवर प्रबंधन संरचना की आवश्यकता महसूस की जा रही है. दुनिया के सफल खेल देशों में प्रशासन और संचालन को अलग रखा जाता है. अध्यक्ष और संचालन परिषद दीर्घकालिक नीतियां, नैतिकता और रणनीतिक दिशा तय करते हैं, जबकि खिलाड़ियों से जुड़ा प्रबंधन, लीग विकास, व्यावसायिक अधिकार, हाई-परफॉर्मेंस सिस्टम, डिजिटल संचालन, कानूनी अनुपालन और प्रायोजन जैसे कार्य पेशेवर अधिकारियों द्वारा संभाले जाते हैं.

आज भारत के कई खेल संघ आधुनिक खेल संगठनों के बजाय व्यक्तित्व-आधारित संस्थाओं की तरह काम करते हैं. अरबों डॉलर की वैश्विक खेल अर्थव्यवस्था में यह मॉडल अब पुराना पड़ चुका है. भारत तब तक खेल महाशक्ति बनने का सपना पूरा नहीं कर सकता जब तक उसकी प्रशासनिक संरचनाएं शौकिया क्लबों जैसी बनी रहें.

खेल मंत्रालय की भूमिका भी अहम

युवा कार्य एवं खेल मंत्रालय को भी केवल समय-समय पर हस्तक्षेप करने से आगे बढ़ना होगा. उसके निगरानी अधिकार अधिक स्पष्ट, तेज और जरूरत पड़ने पर दंडात्मक होने चाहिए. सार्वजनिक धन प्राप्त करने वाले और भारत का प्रतिनिधित्व करने वाले खेल संघ बिना जवाबदेही के काम नहीं कर सकते.

मंत्रालय के पास यह वैधानिक अधिकार होना चाहिए कि वह वित्तीय दंड लगा सके, पदाधिकारियों को निलंबित कर सके, स्वतंत्र ऑडिट अनिवार्य कर सके या प्रशासनिक विफलता की स्थिति में अस्थायी प्रशासक नियुक्त कर सके. नियामक निगरानी केवल जनआक्रोश या अदालतों पर निर्भर नहीं रह सकती.

व्यापक सुधार की जरूरत

भारत के खेल प्रशासन ढांचे की भी व्यापक समीक्षा जरूरी है. राष्ट्रीय खेल संहिता (National Sports Code) में प्रभावी लागू करने की कमी रही है और कई संघ अब भी असंगत मानकों पर काम कर रहे हैं. अब संसद के जरिए एक व्यापक स्पोर्ट्स गवर्नेंस एक्ट लाने की जरूरत महसूस हो रही है.

ऐसा कानून कार्यकाल सीमा, खिलाड़ियों का प्रतिनिधित्व, वित्तीय पारदर्शिता, हितों के टकराव के नियम, स्वतंत्र नैतिक तंत्र और प्रशासनिक मानकों को स्पष्ट रूप से परिभाषित कर सकता है.

निजी भागीदारी का विकल्प

भारत को सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) मॉडल और लीग संचालन के आंशिक निजीकरण पर भी गंभीरता से विचार करना चाहिए. इंडिया प्रीमियर लीग (IPL) की सफलता ने दिखाया है कि पेशेवर प्रबंधन, व्यावसायिक अनुशासन और निजी निवेश किसी खेल के पूरे इकोसिस्टम को बदल सकते हैं.

कुश्ती, मुक्केबाजी, एथलेटिक्स, बैडमिंटन और वॉलीबॉल को भी इसी तरह की संस्थागत सोच की जरूरत है. निजी भागीदारी पूंजी, मार्केटिंग विशेषज्ञता, खेल विज्ञान और वैश्विक संचालन मानक ला सकती है, जबकि सरकार नियामक निगरानी और खिलाड़ियों की सुरक्षा सुनिश्चित कर सकती है.

विनेश फोगाट का मामला केवल एक खिलाड़ी की पात्रता का मुद्दा नहीं है. यह इस बात का संकेत है कि क्या भारतीय खेल प्रशासन खिलाड़ी-केंद्रित व्यवस्था की ओर बढ़ने के लिए तैयार है या नहीं. जब तक प्रशासनिक ढांचे में मूलभूत बदलाव नहीं किए जाते, तब तक ऐसे विवाद लगातार सामने आते रहेंगे. इससे खिलाड़ियों का नुकसान होगा, जनता का भरोसा कमजोर पड़ेगा और अंततः भारत की खेल महत्वाकांक्षाओं को भी झटका लगेगा.

(डिस्क्लेमर: इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं और जरूरी नहीं कि वे BW Businessworld या उसकी संपादकीय टीम के विचारों को दर्शाते हों.)

अतिथि लेखक: अतुल पांडे

(लेखक अतुल पांडे भारत के खेल मीडिया और ब्रॉडकास्टिंग उद्योग के अनुभवी विशेषज्ञ हैं. उन्होंने Ten Sports जैसे प्रमुख प्लेटफॉर्म का नेतृत्व किया है और SportzLive के माध्यम से नए खेल प्रॉपर्टीज़ को विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.)
 

 


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