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अहंकार का अंत: कमल मुस्कुरा रहा है

पश्चिम बंगाल का औद्योगिक केंद्र से आर्थिक ठहराव तक का सफर दशकों की नीतियों और राजनीतिक बदलावों के जरिए समझा जा सकता है, साथ ही इसके पुनरुत्थान की संभावनाओं पर भी बहस जारी है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 5 months ago

रतन टाटा ठीक 20 साल पहले आंसुओं भरी आंखों के साथ सिंगूर छोड़कर चले गए थे, अपनी पूरी फैक्ट्री को ट्रकों पर लादकर गुजरात के साणंद ले गए, क्योंकि दो साल के विरोध और राजनीतिक दबाव ने उस राज्य में कार बनाना असंभव कर दिया था, जो कभी पूरे उपमहाद्वीप की औद्योगिक धड़कन हुआ करता था, और जब लोगों ने उनसे पूछा कि वे क्यों जा रहे हैं, तो उन्होंने न तो गुस्सा जताया और न ही किसी पर आरोप लगाया, उन्होंने सिर्फ इतना कहा - “मुझे दुख है, मुझे बहुत दुख है,”

यह वही व्यक्ति थे जिन्होंने 21 जनवरी 2006 को सिंगूर को इसलिए चुना था क्योंकि उन्हें सच में विश्वास था कि वे उस राज्य में दुनिया की सबसे सस्ती कार बना सकते हैं जिसने कभी पूर्व में औद्योगिक क्रांति की नींव रखी थी, और उन्होंने शुरुआती विरोधों के बावजूद उम्मीद की कि हालात सुधर जाएंगे, जब तक कि 3 अक्टूबर 2008 को श्री नरेंद्र मोदी का फोन नहीं आया, जिन्होंने उन्हें वह सब ऑफर किया जो बंगाल नहीं दे पाया था, किसे पता था कि वही नरेंद्र मोदी एक दिन प्रधानमंत्री बनकर न सिर्फ सिंगूर बल्कि पूरे पश्चिम बंगाल को वापस हासिल करने की कोशिश करेंगे.

वह शहर जो कभी रफ्तार तय करता था

19वीं सदी में कोलकाता वह जगह था जहां पैसा था, जहां राष्ट्रीय सोच को आकार देने वाले अखबार छपते थे, और जहां पहली आधुनिक यूनिवर्सिटियां बनी थीं. हुगली नदी का किनारा एशिया के सबसे व्यस्त व्यावसायिक तटों में से एक था, और बंगाल का जूट, जिसे ‘गोल्डन फाइबर’ कहा जाता था, पूरे ब्रिटिश साम्राज्य के अनाज की बोरियों को ढकता था.

ब्रिटिशों ने कोलकाता को एक सदी तक अपनी राजधानी इसलिए नहीं चुना क्योंकि उन्हें यहां की नमी पसंद थी. उन्होंने इसे इसलिए चुना क्योंकि इस जगह की आर्थिक ताकत को नजरअंदाज करना असंभव था. यहां एक व्यापारिक इंजन था, एक पूरी बौद्धिक सभ्यता विकसित हुई, जहां टैगोर लिख रहे थे, विवेकानंद दुनिया से संवाद कर रहे थे, और बोस एक ऐसी ऊर्जा के साथ जल रहे थे जिसे साम्राज्य रोक नहीं पाया.

जंग कैसे लगी

आजादी के बाद बंगाल तेजी से वामपंथ की ओर मुड़ा, और विचारधारा खुद समस्या नहीं थी, लेकिन इसने यहां के व्यापारिक माहौल को प्रभावित किया. हड़तालें राजनीतिक जीवन का नियमित हिस्सा बन गईं, बंद के कारण शहर कई-कई दिनों तक ठप रहता था, और अगर आप 1980 के दशक में कोलकाता में फैक्ट्री मालिक थे, तो आपके खर्च अनिश्चित रहते थे. इसी बीच पुणे या अहमदाबाद जैसे शहरों में बिना इन समस्याओं के प्रतिस्पर्धी चुपचाप कीमतें कम कर रहे थे, हुगली के किनारे दशकों से चल रही फैक्ट्रियां बंद होने लगीं, जादवपुर के इंजीनियर और आईआईएम कोलकाता के मैनेजर बेंगलुरु और सिंगापुर में अपना सर्वश्रेष्ठ काम करने लगे, और जो चले गए, चाहे फैक्ट्री हों या लोग, वे वापस नहीं लौटे.

व्यस्त दिखने की कला

इसके बाद आने वाली सरकारें दिखावे को संभालने में माहिर हो गईं, इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स की घोषणाएं हुईं, ग्लोबल समिट आयोजित किए गए, दुनिया भर की कंपनियों के साथ समझौते किए गए, लेकिन असली समस्याएं जैसे जमीन अधिग्रहण का कठिन माहौल, श्रम बाजार की जटिलता, और एक ही शहर पर अत्यधिक निर्भरता, जस की तस बनी रहीं.

कोलकाता, जो कभी मुंबई और दिल्ली के साथ देश के शीर्ष शहरों में गिना जाता था, अब आर्थिक उत्पादन के मामले में शीर्ष छह शहरों में बने रहने के लिए संघर्ष कर रहा है, और राज्य की संपत्ति इतनी असंतुलित हो गई है कि अगर कोलकाता को हटा दें, तो बाकी बंगाल की समृद्धि लगभग 80 प्रतिशत तक गिर जाती है, जो यह दिखाता है कि राज्य ने अन्य क्षेत्रों में प्रयास करना लगभग बंद कर दिया.

हिसाब-किताब का समय

कमल सबसे गहरी कीचड़ में खिलता है, और कर्म, खासकर राजनीति में, हर चीज का हिसाब रखता है. 4 मई 2026 को मतगणना के दौरान जब भारतीय जनता पार्टी 293 सीटों में बहुमत की ओर बढ़ती दिख रही है, तो इतिहास एक ऐसे मोड़ पर पहुंचता दिखता है जिसकी कम ही लोगों ने कल्पना की थी. श्यामा प्रसाद मुखर्जी, जो बंगाल के ही थे और जनसंघ के संस्थापक थे, 1953 में रहस्यमय परिस्थितियों में हिरासत में उनकी मृत्यु हो गई थी. जवाहरलाल नेहरू ने उनकी मां की जांच की मांग को भी ठुकरा दिया था, और अब 73 साल बाद, स्वामी विवेकानंद की धरती पर, कर्म की स्मृति लंबी होती है. वही नरेंद्र मोदी जिन्होंने कभी रतन टाटा को गुजरात बुलाया था, आज देश का नेतृत्व कर रहे हैं, और उनकी पार्टी राइटर्स बिल्डिंग के दरवाजे पर खड़ी है. कमल वहीं खिलता है जहां कीचड़ सबसे गहरी होती है.

पुनर्निर्माण

बंगाल की चुनौतियां किस्मत या भूगोल का परिणाम नहीं हैं, बल्कि नीतिगत फैसलों का नतीजा हैं, और आगे बढ़ने का रास्ता यही है कि जो भी अगली सरकार हो, वह इसे ईमानदारी से स्वीकार करे और जवाबदेह बने.

कोलकाता पूरे राज्य का बोझ उठा रहा है, जबकि सिलीगुड़ी, दुर्गापुर, आसनसोल और खड़गपुर जैसे शहरों को नजरअंदाज किया जाता है, और इस असंतुलन को ठीक करने के लिए संरचनात्मक फैसले जरूरी हैं.

ग्रामीण समस्या दूर से कम दिखाई देती है लेकिन अधिक गंभीर है, क्योंकि बंगाल के आधे गरीब शहरों से दूर रहते हैं, उनके लिए बाजार किसी दूसरे देश जैसा है, ऐसे में कृषि-प्रसंस्करण, छोटे स्तर का ग्रामीण उद्योग और वास्तविक डिजिटल कनेक्टिविटी जरूरी है.

सीमावर्ती स्थिति, पूर्वोत्तर तक पहुंच और बंगाल की खाड़ी जैसे संसाधन कमजोरी नहीं बल्कि ताकत हैं, जिन्हें अब तक सही तरीके से इस्तेमाल नहीं किया गया.

जब सुबह आएगी

2026 का चुनाव बंगाल के इतिहास के सबसे कड़े मुकाबलों में से एक था, जिसमें रोजगार, औद्योगिक विकास, महिलाओं की सुरक्षा, नागरिकता जैसे मुद्दे केंद्र में रहे, और नई सरकार इन मुद्दों को नजरअंदाज नहीं कर सकती.

प्रवासी बंगालियों के मन में एक दर्द है कि उन्होंने एक ऐसी जगह छोड़ी जो बेहतर हो सकती थी, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि उनके मन में प्रेम कम हुआ है.

बंगाल में पुनर्जागरण की पूरी क्षमता है, बंदरगाह, यूनिवर्सिटी, और शहर इसे आगे ले जा सकते हैं, बस इसके लिए मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत है.

जैसे उत्तर प्रदेश ने औद्योगिक विकास में बड़ी प्रगति की है और इस महीने 10,000 करोड़ रुपये से ज्यादा जीएसटी कलेक्शन किया है, वैसे ही अच्छे शासन के साथ पश्चिम बंगाल का विकास भी संभव है.

टैगोर ने इसे अपना ‘सोनार बंगला’ कहा था. सोना हमेशा यहीं था.

(डिस्क्लेमर: इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं और जरूरी नहीं कि प्रकाशन के विचारों से मेल खाते हों.)

अतिथि लेखक सुधीर मिश्रा, नंदिनी श्रीवास्तव,शुभ्रांशु कुमार नियोगी और शताक्षी अग्रवाल

(लेखक सुधीर मिश्रा, लेखक ट्रस्ट लीगल के संस्थापक और प्रबंध साझेदार हैं.)

(लेखिका नंदिनी श्रीवास्तव ट्रस्ट लीगल में एसोसिएट हैं और कॉर्पोरेट व रेगुलेटरी क्षेत्रों में कानूनी सलाह और मुकदमेबाजी से जुड़े मामलों पर कार्य करती हैं.)

(लेखक शुभ्रांशु कुमार नियोगी एक बिजनेस थिंकर और रणनीतिकार हैं, जो कॉर्पोरेट ग्रोथ, मार्केट डायनेमिक्स और रणनीतिक परामर्श पर केंद्रित हैं.)

(लेखिका शताक्षी अग्रवाल ट्रस्ट लीगल में ट्रेनी एसोसिएट हैं और कानूनी शोध, ड्राफ्टिंग तथा मुकदमेबाजी एवं सलाहकारी कार्यों में सहयोग करती हैं.)


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