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नीतीश कुमार का राज्यसभा की ओर कदम: बिहार एक निर्णायक दौर पर विचार करता हुआ

नीतीश कुमार के राज्यसभा में जाने के साथ, यह केवल एक राजनीतिक परिवर्तन से अधिक महसूस होता है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 month ago

एक ऐसी पीढ़ी के लिए जो घर छोड़कर बड़ी हुई, शासन में हुए सुधारों ने धारणा को बदला, पहचान को रक्षात्मक झिझक से शांत आत्मविश्वास में परिवर्तित किया और एक बिखरे समुदाय को बिहार की दिशा में नए विश्वास के साथ फिर से जोड़ा, शर्मा और सूफी लिखते हैं.

नीतीश कुमार के राज्यसभा में जाने के साथ, यह केवल एक राजनीतिक परिवर्तन से अधिक महसूस होता है. हममें से कई लोगों के लिए, जो बिहार के बाहर बड़े हुए लेकिन उसकी पहचान से कभी बाहर नहीं रहे, यह एक बेहद व्यक्तिगत अध्याय के समापन जैसा लगता है.

हम यह सिर्फ संचार एवं मीडिया पेशेवरों या राजनीति के पर्यवेक्षकों के रूप में नहीं लिख रहे हैं, बल्कि बिहारी होने के नाते लिख रहे हैं जिन्होंने राज्य को दूर से अनुभव किया है.

बिहार के अंदर और बाहर शिक्षा प्राप्त की. पेशेवर रूप से बाहर आकार लिया. और हमारी पीढ़ी के कई लोगों की तरह, हमने बिहार को पूरी तरह अपनी पसंद से नहीं, बल्कि परिस्थितियों के कारण छोड़ा. क्योंकि जब हम बड़े हो रहे थे, बिहार पर्याप्त नहीं दे पा रहा था.

पर्याप्त संस्थान नहीं थे.

पर्याप्त अवसर नहीं थे.

अपने ही तंत्र में पर्याप्त विश्वास नहीं था.

बिहार छोड़ना विद्रोह नहीं था. यह सामान्य बात थी.

वह बिहार जिसे हम समझाते थे

एक समय था जब खुद को बिहारी बताने के साथ एक ठहराव आता था. एक ऐसा क्षण जब आप प्रतिक्रिया का अनुमान लगाते थे.

‘बिहारी किसको बोला?’ यह केवल एक स्लैंग नहीं था; यह इस बात का प्रतिबिंब था कि पहचान रक्षात्मक हो चुकी थी.

उन वर्षों में बिहार को संभावनाओं से अधिक धारणाओं ने परिभाषित किया. ‘जंगल राज’ जैसे शब्द किसी भी प्रतिवाद से तेज़ी से फैलते थे. और हममें से जो राज्य से बाहर थे, उस धारणा का बोझ हमारे साथ चिपका रहता था.

आप सिर्फ अपना नाम नहीं ढोते थे. आप बिहार की छवि भी ढोते थे.

जो बदलाव चुपचाप आया

जब 2005 में नीतीश कुमार ने सत्ता संभाली, बदलाव शोरगुल वाला नहीं था. यह धीरे-धीरे, लगभग शांत तरीके से हुआ. लेकिन यह वास्तविक था.

हमने इसे नीतिगत घोषणाओं से नहीं, बल्कि घर की बातचीतों से महसूस किया.

यात्रा अधिक सुरक्षित लगने लगी.

शासन दिखाई देने लगा.

राज्य धीरे-धीरे फिर से मौजूद महसूस होने लगा.

यह सुर्खियों में दिखने वाला परिवर्तन नहीं था. यह वास्तविकता की पुनर्स्थापना थी.

और समय के साथ, एक सूक्ष्म लेकिन शक्तिशाली बदलाव ने धारणा को बदलना शुरू किया.

एक अलग राजनीतिक व्याकरण

नीतीश कुमार कभी पारंपरिक राजनीतिक नेता नहीं रहे. समाजवादी पृष्ठभूमि से आते हुए, महत्वपूर्ण समय पर भारतीय जनता पार्टी के साथ गठबंधन, अलग होना, लालू प्रसाद यादव के साथ फिर जुड़ना, और फिर बदलाव, उनकी राजनीति अक्सर सरल श्रेणियों में नहीं बंधती.

आलोचकों ने इसे असंगति माना.

समर्थकों ने इसे व्यवहारिकता कहा.

संचार और मीडिया पेशेवरों के रूप में हमारे दृष्टिकोण से, जो बात प्रमुख रूप से सामने आती है वह है उनकी कथा को रीसेट करने और बदलते परिदृश्य में प्रासंगिक बने रहने की क्षमता. उन्होंने एक मूलभूत बात समझी: बिहार जैसे राज्य में शासन वैचारिक पूर्णता का इंतज़ार नहीं कर सकता.

बिहार के बाहर महसूस हुआ बदलाव

हममें से जो बिहार में नहीं रहते थे, उनके लिए सबसे बड़ा बदलाव मनोवैज्ञानिक था. एक समय था जब ‘मैं बिहार से हूँ’ कहना एक स्पष्टीकरण जैसा लगता था. आज यह एक बयान जैसा महसूस होता है. बिहार से जुड़े वायरल रील्स और स्टैंड-अप कॉमेडियंस की संख्या देखिए.

यह बदलाव रातोंरात नहीं हुआ. न ही यह पूरी तरह परिपूर्ण था. लेकिन यह हुआ.

और इस बदलाव का बड़ा हिस्सा उन वर्षों से जुड़ा है जब नीतीश कुमार के नेतृत्व में शासन स्थिर होना शुरू हुआ, तंत्र काम करने लगे, और बिहार एक खोया हुआ मामला लगना बंद हुआ.

प्रवासन से पहचान तक

सच यह है कि बिहारीयों की एक पूरी पीढ़ी ने राज्य छोड़ा क्योंकि उनके आसपास का तंत्र ढह चुका था. आज भी दिल्ली एनसीआर को बिहार का दूसरा सबसे बड़ा शहर माना जाता है, जहां बड़ी संख्या में बिहारी प्रवासी रहते हैं.

शिक्षा हमें बाहर ले गई. करियर ने हमें बाहर रखा. लेकिन पहचान कभी नहीं गई.

कई मायनों में, इसी साझा अनुभव ने BAJAKO - Bihar Jharkhand KOumUnity के निर्माण की नींव रखी, एक ऐसा मंच जिसे हमने बिहार और झारखंड से जुड़े पेशेवरों के लिए सह-स्थापित किया.

यह एक सरल समझ से जन्मा: कि हम जैसे लोगों को फिर से जुड़ने की ज़रूरत है—सिर्फ नॉस्टैल्जिया के कारण नहीं, बल्कि विकसित होते गर्व के कारण. क्योंकि कुछ बदल चुका था.

‘बिहारी किसको बोला?’ से ‘मैं बिहार से हूँ’—एक शांत आत्मविश्वास के साथ कहा गया.

स्वर और आत्म-धारणा में यह बदलाव अलग-थलग नहीं उभरा. यह ऐसे बिहार से आया जो अभी भी विकसित हो रहा है, लेकिन जिसने अपनी विश्वसनीयता को फिर से बनाना शुरू कर दिया है.

अब राज्यसभा का क्षण

बिहार को चलाने से उसे प्रतिनिधित्व करने तक, नीतीश कुमार का राज्यसभा में जाना एक संरचनात्मक बदलाव जैसा लगता है.

तो क्या यह नीतीश युग का अंत है?

मुख्यमंत्री के रूप में, शायद हाँ.

एक राजनीतिक शक्ति के रूप में, ऐसा कहना जल्दबाज़ी होगी.

क्योंकि अगर उनके करियर ने कुछ दिखाया है, तो वह यह है, उनमें खुद को पुनः गढ़ने की प्रवृत्ति है.

हमें उन्हें कैसे याद करना चाहिए?

एक परिपूर्ण नेता के रूप में नहीं.

एक वैचारिक स्थिरता के रूप में नहीं.

बल्कि ऐसे व्यक्ति के रूप में जिसने एक टूटी हुई व्यवस्था में कदम रखा और उसे फिर से कार्यशील बनाया.

ऐसे व्यक्ति के रूप में जिसने सिर्फ शासन ही नहीं, बल्कि धारणा को भी बदला.

हम जैसे लोगों के लिए, यही उनकी सबसे स्थायी विरासत हो सकती है.

सिर्फ सड़कें या नीतियां नहीं.

बल्कि पहचान में बदलाव.

झिझक से स्वामित्व की ओर एक यात्रा.

जैसे ही बिहार आगे बढ़ता है और अपना अगला अध्याय लिखता है, नीतीश कुमार एक अलग भूमिका में कदम रखते हैं.

लेकिन उस पीढ़ी के लिए जो बिहार छोड़कर बड़ी हुई और उसे समझाना सीखी, उनका कार्यकाल हमेशा एक मोड़ के रूप में याद किया जाएगा.

क्योंकि कहीं न कहीं, रास्ते में सवाल बदल गया.

‘बिहारी किसको बोला?’

से सीधे ‘हाँ, मैं बिहार से हूँ.’

(डिस्क्लेमर: इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं और आवश्यक नहीं कि वे प्रकाशन के विचारों को दर्शाते हों.)

अतिथि लेखक: अनूप शर्मा
(लेखक एक संचार एवं मीडिया पेशेवर हैं और BAJAKO - Bihar & Jharkhand KOumunity के सह-संस्थापक हैं.)

 


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