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मई में 49 लाख बैरल प्रतिदिन पहुंचा भारत का क्रूड आयात, रूस बना सबसे बड़ा सप्लायर

पश्चिम एशिया में जारी तनाव और आपूर्ति संबंधी अनिश्चितताओं के बीच भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए आयात रणनीति में महत्वपूर्ण बदलाव किए हैं.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 months ago

भू-राजनीतिक तनाव और ऊर्जा आपूर्ति को लेकर बढ़ती चिंताओं के बीच भारत ने अपने आयात स्रोतों में बड़ा बदलाव किया है. मई में देश का कच्चे तेल का आयात बढ़कर 49 लाख बैरल प्रतिदिन पहुंच गया, जबकि रूस से तेल और अमेरिका से एलएनजी-एलपीजी की खरीद रिकॉर्ड स्तर पर दर्ज की गई. सरकार और रिफाइनरियां ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पारंपरिक आपूर्तिकर्ताओं के साथ-साथ नए स्रोतों पर भी दांव लगा रही हैं.

अमेरिका से एलएनजी और एलपीजी की खरीद में वृद्धि दर्ज
पश्चिम एशिया में जारी तनाव और आपूर्ति संबंधी अनिश्चितताओं के बीच भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए आयात रणनीति में महत्वपूर्ण बदलाव किए हैं. पिछले कुछ महीनों में देश ने रूस से कच्चे तेल की खरीद बढ़ाने के साथ-साथ ब्राजील, वेनेजुएला और अंगोला जैसे वैकल्पिक स्रोतों से भी आयात बढ़ाया है. वहीं गैस की जरूरतों को पूरा करने के लिए अमेरिका से एलएनजी और एलपीजी की खरीद में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है.

मई में 10% बढ़ा कच्चे तेल का आयात

समुद्री परिवहन डेटा उपलब्ध कराने वाली कंपनी केप्लर के अनुसार, मई में भारत का कच्चे तेल का आयात अप्रैल के मुकाबले 10 प्रतिशत बढ़कर 49 लाख बैरल प्रतिदिन पहुंच गया. इस दौरान रूस भारत का सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता बना रहा. कुल आयात में उसकी हिस्सेदारी 38.6 प्रतिशत रही. 28 मई तक रूस से कच्चे तेल का आयात बढ़कर 19 लाख बैरल प्रतिदिन हो गया, जो इस वर्ष जनवरी के स्तर की तुलना में करीब 80 प्रतिशत अधिक है.

रूस से बढ़ी खरीद के पीछे क्या है वजह?

विशेषज्ञों के अनुसार, अमेरिकी प्रतिबंधों में कुछ राहत मिलने के बाद भारतीय रिफाइनरियों ने रूस से तेल खरीद बढ़ा दी है. इसके तहत उन रूसी तेल खेपों की खरीद की अनुमति मिली है जो पहले प्रतिबंधों के कारण समुद्र में अटकी हुई थीं.

इससे पहले अमेरिका और यूरोपीय संघ के प्रतिबंधों तथा भारत-अमेरिका व्यापार समझौते पर चल रही बातचीत के कारण रूस से तेल आयात में कमी आई थी. हालांकि पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बाद भारतीय कंपनियों ने फिर से रूसी तेल पर निर्भरता बढ़ा दी है.

ब्राजील और वेनेजुएला जैसे नए स्रोतों पर भी जोर

ऊर्जा आपूर्ति को सुरक्षित बनाए रखने के लिए भारत ने गैर-पारंपरिक आपूर्तिकर्ताओं से भी खरीद बढ़ाई है. मई में संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) से 5.42 लाख बैरल प्रतिदिन, सऊदी अरब से 3.81 लाख बैरल प्रतिदिन, ब्राजील से 3.14 लाख बैरल प्रतिदिन और वेनेजुएला से 2.90 लाख बैरल प्रतिदिन कच्चे तेल का आयात किया गया.

वहीं इराक से आयात अपेक्षाकृत सीमित रहा. गौरतलब है कि पश्चिम एशिया में संकट से पहले इराक भारत का दूसरा सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता हुआ करता था.

अमेरिका बना भारत का सबसे बड़ा LPG सप्लायर

खाना पकाने में इस्तेमाल होने वाली एलपीजी के आयात में भी मई के दौरान बढ़ोतरी दर्ज की गई. मासिक आधार पर एलपीजी आयात 11 प्रतिशत बढ़कर 10.8 लाख टन तक पहुंच गया.

इस वृद्धि में सबसे बड़ी भूमिका अमेरिका की रही, जिसने अकेले 5 लाख टन एलपीजी की आपूर्ति की. यह भारत के कुल एलपीजी आयात का आधे से अधिक हिस्सा है.

हालांकि होर्मुज जलडमरूमध्य में बाधाओं के कारण एलपीजी आयात अब भी युद्ध-पूर्व स्तर की तुलना में 50 प्रतिशत से अधिक नीचे बना हुआ है.

पारंपरिक आपूर्तिकर्ताओं की हिस्सेदारी घटी

मई में एलपीजी आपूर्ति के मामले में अमेरिका के बाद ईरान और यूएई क्रमशः 1.4 लाख टन और 1.1 लाख टन आपूर्ति के साथ दूसरे और तीसरे स्थान पर रहे. दूसरी ओर, यूएई, कतर, सऊदी अरब और कुवैत जैसे पारंपरिक आपूर्तिकर्ताओं से आयात अपेक्षाकृत सीमित रहा. इससे स्पष्ट है कि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए नए स्रोतों की ओर तेजी से रुख कर रहा है.

LNG आयात में भी अमेरिका नंबर-1

तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) के क्षेत्र में भी अमेरिका भारत का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता बनकर उभरा है. मई में भारत के कुल एलएनजी आयात में अमेरिकी हिस्सेदारी 38 प्रतिशत से अधिक रही.

अमेरिका के बाद नाइजीरिया और ओमान प्रमुख आपूर्तिकर्ता रहे. वहीं, पारंपरिक रूप से भारत के सबसे बड़े एलएनजी सप्लायर रहे कतर से मई में कोई आयात दर्ज नहीं किया गया.

ऊर्जा सुरक्षा पर भारत का बड़ा फोकस

विशेषज्ञों का मानना है कि पश्चिम एशिया में जारी अस्थिरता ने भारत को अपनी ऊर्जा आपूर्ति रणनीति में विविधता लाने के लिए प्रेरित किया है. रूस, अमेरिका, ब्राजील और वेनेजुएला जैसे देशों से बढ़ती खरीद इस बात का संकेत है कि भारत केवल पारंपरिक स्रोतों पर निर्भर रहने के बजाय बहुआयामी ऊर्जा आपूर्ति नेटवर्क तैयार कर रहा है.

ऊर्जा मांग में लगातार वृद्धि और वैश्विक भू-राजनीतिक जोखिमों को देखते हुए आने वाले महीनों में भी भारत की यह रणनीति जारी रहने की संभावना है.
 


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