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सेबी का सुजलॉन पर बड़ा प्रहार: 29 करोड़ रुपये का जुर्माना, पुरानी क्लीन चिट भी रद्द

खातों में कथित हेराफेरी, भ्रामक वित्तीय खुलासे और समूह कंपनियों के बीच फंड घुमाकर मुनाफा दिखाने के आरोपों पर सेबी ने सुजलॉन एनर्जी और उसके पूर्व शीर्ष अधिकारियों पर भारी जुर्माना लगाया है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 41 minutes ago

रिन्यूएबल एनर्जी सेक्टर की प्रमुख कंपनी सुजलॉन एनर्जी को बाजार नियामक सेबी (SEBI) से बड़ा झटका लगा है. सेबी ने कंपनी और उसके कई पूर्व अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करते हुए लगभग 29 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया है. यह मामला कंपनी के वित्तीय खातों में कथित अनियमितताओं, निवेशकों को भ्रामक तस्वीर पेश करने और समूह कंपनियों के बीच फंड ट्रांसफर के जरिए मुनाफा दिखाने से जुड़ा है.

किस पर कितना लगा जुर्माना?

सेबी के पूर्णकालिक सदस्य संदीप प्रधान द्वारा जारी निर्देश के अनुसार, सुजलॉन एनर्जी पर 15.95 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया गया है. इसके अलावा कंपनी के पूर्व वाइस चेयरमैन विनोद आर तंती पर 5.75 करोड़ रुपये, गिरीश आर तंती पर 5.45 करोड़ रुपये, पूर्व सीफओ कीर्ति जे वगाडिया पर 1.5 करोड़ रुपये और अमित अग्रवाल पर 30 लाख रुपये का जुर्माना लगाया गया है. नियामक ने सभी संबंधित पक्षों को 45 दिनों के भीतर जुर्माने की राशि जमा करने का निर्देश दिया है.

गुमनाम शिकायत से शुरू हुई जांच

इस मामले की शुरुआत दिसंबर 2019 में मिली एक गुमनाम शिकायत से हुई थी. शिकायत के बाद सेबी ने कंपनी के वित्तीय रिकॉर्ड की जांच के लिए फॉरेंसिक ऑडिट का आदेश दिया.

जांच के दायरे में वित्त वर्ष 2014-15 से 2020-21 तक के वित्तीय दस्तावेजों और समूह कंपनियों के बीच हुए लेनदेन को शामिल किया गया. जांच के दौरान कई ऐसे ट्रांजैक्शन सामने आए, जिन पर नियामक ने गंभीर सवाल उठाए.

77 करोड़ की संपत्ति से दिखाया 1,923 करोड़ रुपये का मुनाफा

सेबी की जांच के अनुसार, वर्ष 2014 में सुजलॉन ने अपना ऑपरेशंस एंड मेंटेनेंस सर्विसेज (OMS) कारोबार अपनी ही सहायक कंपनी सुजलॉन ग्लोबल सर्विसेज (SGSL) को 2,000 करोड़ रुपये में बेच दिया. दिलचस्प बात यह रही कि इस कारोबार की वास्तविक नेट बुक वैल्यू केवल 77 करोड़ रुपये थी. इस ट्रांजैक्शन के आधार पर कंपनी ने अपने खातों में करीब 1,923 करोड़ रुपये का मुनाफा दर्ज किया.

सेबी का आरोप है कि इस सौदे में दिखाए गए 1,300 करोड़ रुपये वास्तव में बाहरी स्रोतों से नहीं आए थे, बल्कि समूह कंपनियों के बीच ऋण और डिबेंचर के रूप में घुमाए गए थे.

फंड रोटेशन से दिखाया गया भुगतान

नियामक के मुताबिक, मार्च 2017 में 150 करोड़ रुपये की राशि को छह बार और 100 करोड़ रुपये को चार बार विभिन्न लेनदेन के जरिए घुमाया गया, ताकि भुगतान का आभास कराया जा सके. सेबी का मानना है कि इस तरह की व्यवस्था से कंपनी की वास्तविक वित्तीय स्थिति और नकदी प्रवाह की तस्वीर निवेशकों के सामने स्पष्ट रूप से नहीं आ पाई.

एक ही संपत्ति से दो बार मुनाफा कमाने का आरोप

जांच में यह भी सामने आया कि बाद में SGSL के शेयरों को समूह की ही दूसरी इकाई सुजलॉन स्ट्रक्चर्स लिमिटेड को ट्रांसफर कर दिया गया. इस आंतरिक सौदे के जरिए कंपनी ने 829.78 करोड़ रुपये का अतिरिक्त मुनाफा भी दर्ज किया. सेबी ने कहा कि एक ही परिसंपत्ति को समूह के भीतर विभिन्न स्तरों पर ट्रांसफर कर बार-बार लाभ दिखाना निवेशकों के लिए भ्रामक स्थिति पैदा कर सकता है.

सेबी ने क्यों पलटी अपनी पुरानी क्लीन चिट?

जून 2025 में नियुक्त अधिकारी ने यह कहते हुए कंपनी को राहत दी थी कि सभी लेनदेन स्वतंत्र वैल्यूएशन, बोर्ड की मंजूरी और शेयरधारकों की सहमति के बाद किए गए थे.

हालांकि नए आदेश में सेबी ने स्पष्ट किया कि केवल कानूनी प्रक्रिया का पालन कर लेना पर्याप्त नहीं है. यदि किसी लेनदेन का प्रभाव निवेशकों के सामने कंपनी की वास्तविक वित्तीय स्थिति को गलत तरीके से प्रस्तुत करता है, तो उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. सेबी ने कहा कि बाजार में पारदर्शिता और निवेशकों का विश्वास बनाए रखना सर्वोच्च प्राथमिकता है.

कंपनी ने आरोपों को किया खारिज

सुजलॉन एनर्जी ने इन आरोपों से असहमति जताई है. कंपनी का कहना है कि संबंधित पुनर्गठन उस समय की वित्तीय परिस्थितियों को देखते हुए किया गया था और इसका कंपनी के समेकित (Consolidated) खातों पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ा. हालांकि सेबी के ताजा आदेश के बाद यह मामला एक बार फिर निवेशकों और बाजार विशेषज्ञों के बीच चर्चा का विषय बन गया है.

निवेशकों के लिए क्या है संदेश?

यह मामला कॉरपोरेट गवर्नेंस, वित्तीय पारदर्शिता और निवेशकों को सही जानकारी उपलब्ध कराने के महत्व को रेखांकित करता है. सेबी की कार्रवाई यह संकेत देती है कि नियामक केवल कागजी अनुपालन नहीं, बल्कि लेनदेन के वास्तविक आर्थिक प्रभाव को भी गंभीरता से देख रहा है. विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला सूचीबद्ध कंपनियों के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश है कि निवेशकों को भ्रामक वित्तीय तस्वीर दिखाने वाले किसी भी कदम पर सख्त कार्रवाई की जा सकती है.
 


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