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IBC ने मजबूत की वित्तीय व्यवस्था, संकटग्रस्त कंपनियों के पुनरुद्धार को मिली रफ्तार: निर्मला सीतारमण
वित्त मंत्री ने कहा कि IBC अब भारत के वित्तीय सुधार ढांचे का एक महत्वपूर्ण स्तंभ बन चुका है. यह सरकार की मजबूत आर्थिक संस्थाएं बनाने की प्रतिबद्धता को भी दर्शाता है.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 2 hours ago
केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा है कि दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (IBC) ने पिछले एक दशक में भारत की वित्तीय व्यवस्था को मजबूत करने और संकटग्रस्त कंपनियों के तेजी से पुनरुद्धार में अहम भूमिका निभाई है. उन्होंने कहा कि इस कानून ने भारत की दिवाला समाधान प्रणाली को पूरी तरह बदल दिया है.
IBC के 10 साल पूरे होने पर कही बात
दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता, 2016 के लागू होने के 10 साल पूरे होने के मौके पर वित्त मंत्री ने कहा कि IBC ने पुराने बिखरे हुए और देनदार-आधारित सिस्टम की जगह समयबद्ध और लेनदार-आधारित समाधान प्रक्रिया को स्थापित किया. इससे कंपनियों के मामलों का तेजी से निपटारा संभव हुआ है.
‘देरी और अनिश्चितता’ से ‘समाधान और पुनरुद्धार’ की ओर बदलाव
सोशल मीडिया पर किए गए अपने पोस्ट में निर्मला सीतारमण ने कहा कि IBC ने कारोबारी संकट से निपटने के भारत के तरीके को “देरी और अनिश्चितता” से निकालकर “समाधान और पुनरुद्धार” की दिशा में बदल दिया है. इससे लेनदारों, निवेशकों और उद्योग जगत का भरोसा भी मजबूत हुआ है.
आर्थिक सुधारों का अहम स्तंभ बना IBC
वित्त मंत्री ने कहा कि IBC अब भारत के वित्तीय सुधार ढांचे का एक महत्वपूर्ण स्तंभ बन चुका है. यह सरकार की मजबूत आर्थिक संस्थाएं बनाने की प्रतिबद्धता को भी दर्शाता है.
क्या है IBC
साल 2016 में लागू किया गया IBC भारत का प्रमुख दिवाला कानून है. यह कंपनियों, साझेदारी फर्मों और व्यक्तियों से जुड़े दिवाला मामलों के समाधान के लिए एकीकृत ढांचा प्रदान करता है. इसके तहत तय समयसीमा में मामलों के निपटारे का प्रावधान है.
समय-समय पर हुए कई संशोधन
IBC लागू होने के बाद से इसमें कई बदलाव किए गए हैं ताकि रिकवरी प्रक्रिया को बेहतर बनाया जा सके, मामलों के समाधान में तेजी लाई जा सके और लागू करने में आने वाली कमियों को दूर किया जा सके. हाल ही में सरकार ने दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (संशोधन) अधिनियम, 2026 के जरिए नए संशोधन भी किए हैं.
बैंकों को मिला बड़ा सहारा
सरकार लगातार यह कहती रही है कि IBC ने अर्थव्यवस्था में क्रेडिट अनुशासन को मजबूत किया है और बैंकों को बढ़ते फंसे हुए कर्ज यानी स्ट्रेस्ड एसेट्स से निपटने में मदद मिली है. इससे बैंकिंग सेक्टर की स्थिति भी पहले की तुलना में अधिक मजबूत हुई है.
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