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अब कागज नहीं, प्लास्टिक के हो सकते हैं भारतीय नोट, RBI कर रहा पॉलीमर करेंसी पर बड़ा विचार

पॉलीमर नोट सबसे पहले साल 1988 में ऑस्ट्रेलिया में शुरू किए गए थे. इसके बाद कनाडा, न्यूजीलैंड, सिंगापुर, मलेशिया, वियतनाम, रोमानिया और मॉरीशस समेत दुनिया के कई देशों ने इन्हें अपनाया.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 months ago

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) देश में करेंसी सिस्टम में बड़ा बदलाव करने की तैयारी कर सकता है. आने वाले समय में 100, 200 और 500 रुपये के नोट कागज की जगह प्लास्टिक जैसे मजबूत पॉलीमर मटेरियल में देखने को मिल सकते हैं. बढ़ती नोट छपाई लागत, जल्दी खराब होने वाले नोटों और नकली करेंसी की चुनौती को देखते हुए RBI पॉलीमर बैंक नोट शुरू करने की योजना पर गंभीरता से विचार कर रहा है. केंद्रीय बैंक जल्द ही पॉलीमर नोटों को लेकर पायलट प्रोजेक्ट शुरू कर सकता है. इस मुद्दे पर RBI की हालिया बोर्ड बैठकों में भी चर्चा हुई है.

क्यों बढ़ रही है पॉलीमर नोटों की जरूरत?
देश में हर साल बड़ी संख्या में नोट फटने, गंदे होने और खराब होने के कारण चलन से बाहर हो जाते हैं. RBI की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार वित्त वर्ष 2024-25 में करीब 23.8 अरब पुराने और क्षतिग्रस्त नोटों को नष्ट करना पड़ा. यह आंकड़ा पिछले साल के मुकाबले 12% ज्यादा रहा. सबसे ज्यादा खराब होने वाले नोटों में 500 रुपये और 100 रुपये के नोट शामिल रहे. नोटों की लगातार बढ़ती मांग के कारण छपाई लागत भी तेजी से बढ़ रही है. वित्त वर्ष 2024-25 में नोट छापने पर RBI का खर्च बढ़कर करीब ₹6,373 करोड़ पहुंच गया, जबकि एक साल पहले यह ₹5,101 करोड़ था.

क्या होते हैं पॉलीमर नोट?
पॉलीमर नोट एक खास तरह के प्लास्टिक आधारित मटेरियल से बनाए जाते हैं. ये सामान्य कागजी नोटों की तुलना में ज्यादा टिकाऊ और मजबूत माने जाते हैं. पानी, नमी, गंदगी और बार-बार इस्तेमाल का इन पर कम असर पड़ता है. विशेषज्ञों के मुताबिक पॉलीमर नोट सामान्य नोटों की तुलना में करीब ढाई गुना ज्यादा समय तक चल सकते हैं. लंबे समय तक उपयोग होने के कारण इनकी रिप्लेसमेंट लागत भी कम हो जाती है.

नकली नोटों पर भी लगेगी रोक
पॉलीमर नोटों में कई एडवांस सिक्योरिटी फीचर्स जोड़े जा सकते हैं. इनमें ट्रांसपेरेंट विंडो, माइक्रो प्रिंटिंग और विशेष सुरक्षा लेयर शामिल होती हैं, जिन्हें कॉपी करना काफी मुश्किल माना जाता है. RBI का मानना है कि इससे जाली नोटों की समस्या को काफी हद तक कम किया जा सकता है. हालांकि पहले भी सरकार ने स्पष्ट किया था कि पॉलीमर नोटों का मुख्य उद्देश्य नोटों की उम्र बढ़ाना है.

ATM और मशीनें भी होंगी तैयार
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार पहले पॉलीमर नोटों को लेकर तकनीकी चुनौतियां थीं, लेकिन अब ATM और करेंसी मशीनों को ऐसे नोटों के अनुकूल बनाने के समाधान तैयार कर लिए गए हैं. RBI का कहना है कि अब देश के पास जरूरी संसाधन और तकनीक उपलब्ध है.

दुनिया के कई देशों में पहले से चलन में हैं पॉलीमर नोट
पॉलीमर नोट सबसे पहले साल 1988 में ऑस्ट्रेलिया में शुरू किए गए थे. इसके बाद कनाडा, न्यूजीलैंड, सिंगापुर, मलेशिया, वियतनाम, रोमानिया और मॉरीशस समेत दुनिया के कई देशों ने इन्हें अपनाया. रिपोर्ट्स के अनुसार अब करीब 60 देशों में पॉलीमर नोट इस्तेमाल किए जा रहे हैं. इन नोटों की एक खास बात यह भी है कि खराब होने के बाद इन्हें रिसाइकिल कर दूसरी प्लास्टिक वस्तुएं बनाई जा सकती हैं.

पहले भी हो चुकी है कोशिश
भारत में पॉलीमर नोट लाने का विचार नया नहीं है. साल 2012 में तत्कालीन सरकार ने पांच शहरों में परीक्षण के तौर पर पॉलीमर से बने 10 रुपये के नोट जारी करने की योजना बनाई थी. हालांकि तकनीकी दिक्कतों के कारण यह परियोजना आगे नहीं बढ़ सकी. अब बदलती तकनीक और बढ़ती करेंसी लागत को देखते हुए RBI एक बार फिर इस दिशा में कदम बढ़ाने की तैयारी कर रहा है.


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