✕

होम / एक्सपर्ट ओपिनियन / ईरान को ‘अनफ्रीज’ करना: असली चुनौती अब शुरू होगी

ईरान को ‘अनफ्रीज’ करना: असली चुनौती अब शुरू होगी

सिद्धार्थ अरोड़ा लिखते हैं, 'अमेरिका-ईरान शांति समझौता अंतिम चरण की ओर बढ़ रहा है और रिपोर्टों के अनुसार 60 दिनों की अवधि में लगभग 24 अरब डॉलर जारी किए जा सकते हैं. ऐसे में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि यह पैसा जब ईरान पहुंचेगा, तब उसका क्या होगा?'

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 4 months ago

ईरान पर प्रतिबंध लगाना, भू-राजनीतिक रणनीतियों की परंपरा में, अपेक्षाकृत आसान काम था. उसकी संपत्तियों को फ्रीज कर देना, बैंकिंग चैनलों को बंद कर देना, तेल राजस्व पर रोक लगा देना और फिर इंतजार करना. आर्थिक दबाव बनाने की यह प्रक्रिया अच्छी तरह समझी जाती है और अमेरिका को इसका दशकों का अनुभव है.

दक्षिण कोरिया, चीन, इराक, लक्ज़मबर्ग और अन्य देशों में फैले तेल राजस्व, केंद्रीय बैंक भंडार और विभिन्न निवेशों को मिलाकर ईरान की लगभग 100 अरब डॉलर की संपत्तियां विदेशी खातों में वर्षों से जमी हुई हैं. यह राशि ईरान की कुल जीडीपी के लगभग एक-चौथाई और उसके वार्षिक हाइड्रोकार्बन राजस्व की लगभग तीन गुना है.

संपत्तियों को फ्रीज करना आसान था. उन्हें अनफ्रीज करना उतना आसान नहीं है.

ऐसी मुद्रा, जिसके लिए देश तैयार नहीं

अमेरिका-ईरान शांति समझौता अंतिम चरण की ओर बढ़ रहा है और रिपोर्टों के अनुसार 60 दिनों की अवधि में लगभग 24 अरब डॉलर जारी किए जा सकते हैं. ऐसे में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि यह पैसा जब ईरान पहुंचेगा, तब उसका क्या होगा?

ईरान पिछले लगभग चार दशकों से वैश्विक वित्तीय व्यवस्था से काफी हद तक अलग-थलग रहा है. उसकी बैंकिंग प्रणाली प्रभावी रूप से SWIFT नेटवर्क से बाहर है. उसकी मुद्रा रियाल ने प्रमुख वैश्विक मुद्राओं के मुकाबले भारी मूल्यह्रास झेला है. स्थिति इतनी गंभीर रही है कि आम ईरानी नागरिकों को वर्षों तक ऐसे आर्थिक माहौल में रोजमर्रा का कारोबार करना पड़ा, जहां समानांतर विनिमय दरें, आयात संबंधी विकृतियां और दबा हुआ उपभोग मौजूद रहा.

सामान्य परिस्थितियों में बड़े पूंजी प्रवाह को संभालने वाली संस्थाएं, जैसे अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग संबंधों वाला केंद्रीय बैंक, गहरा पूंजी बाजार और पारदर्शी निवेश ढांचा या तो कमजोर हो चुकी हैं, प्रतिबंधों के दायरे में हैं या फिर इतने बड़े फंड को संभालने में संरचनात्मक रूप से सक्षम नहीं हैं.

इतिहास देता है चेतावनी

इतिहास बताता है कि जब प्रतिबंधों से जूझ रही अर्थव्यवस्थाओं में अचानक बड़ी मात्रा में धन पहुंचता है, तो परिणाम अक्सर व्यवस्थित नहीं होते.

यह धन उत्पादक निवेश में आसानी से नहीं जाता. इसके बजाय यह रियल एस्टेट में जमा होता है, परिसंपत्ति कीमतों को बढ़ाता है, मुद्रा सट्टेबाजी को प्रोत्साहित करता है और उन मध्यस्थों अक्सर सरकार के निकट संस्थाओं को लाभ पहुंचाता है जो सबसे पहले इस धन तक पहुंच बना लेते हैं.

2003 के बाद का इराक और गद्दाफी के बाद का लीबिया इसके उदाहरण हैं. पैटर्न लगभग एक जैसा रहा है,  संस्थागत क्षमता के बिना नकदी विकास नहीं, बल्कि आर्थिक विकृतियां पैदा करती है.

बाजार कितना संभाल पाएगा?

वैश्विक स्तर पर भी इस मुद्दे पर पर्याप्त चर्चा नहीं हुई है. यदि ईरान इन निधियों तक प्रभावी पहुंच हासिल कर लेता है, तो वह दशकों में पहली बार बड़े पैमाने पर निवेशक और आयातक बन सकता है.

उसके तेल बुनियादी ढांचे को निवेश की जरूरत है. विनिर्माण क्षेत्र को आधुनिकीकरण की आवश्यकता है. बड़ी युवा आबादी उपभोग की भारी संभावनाएं रखती है.

लेकिन वैश्विक बाजार की ईरानी निवेश को समाहित करने की क्षमता उसी वित्तीय ढांचे से सीमित है जिसने इन संपत्तियों को फ्रीज किया था. पश्चिमी वित्तीय संस्थान तब तक ईरानी पूंजी प्रवाह को सहज बनाने में जल्दबाजी नहीं करेंगे, जब तक प्रतिबंध औपचारिक और व्यापक रूप से नहीं हटाए जाते. और ईरान से जुड़े पिछले समझौतों का इतिहास बताता है कि "व्यापक" राहत शायद ही कभी पूरी तरह लागू होती है.

आंशिक राहत, आंशिक पहुंच

आंशिक प्रतिबंध राहत का मतलब है आंशिक वित्तीय पहुंच. इससे अनौपचारिक चैनल विकसित होते हैं और वही अपारदर्शी वित्तीय प्रवाह पैदा होते हैं, जिन्हें रोकने के लिए मूल रूप से प्रतिबंध लगाए गए थे.

विडंबना यह है कि यदि संपत्तियों को अनफ्रीज करने की प्रक्रिया सही ढंग से नहीं की गई, तो इससे वित्तीय प्रशासन की स्थिति फ्रीजिंग के दौर से भी अधिक खराब हो सकती है.

कट्टरपंथी नेतृत्व की चुनौती

इसके बाद आता है राजनीतिक प्रश्न, जो पूरे आर्थिक विश्लेषण को सशर्त बना देता है.

वर्तमान समय में ईरान का शासन ऐसे व्यवहारिक नेताओं के हाथ में नहीं है जो पश्चिमी देशों की शर्तों पर वैश्विक अर्थव्यवस्था में शामिल होने के इच्छुक हों.

तेहरान में सत्ता पर मजबूत पकड़ बनाने वाले कट्टरपंथी गुटों की प्राथमिकताएं अलग हैं, घरेलू वैधता, क्षेत्रीय प्रभाव, सहयोगी नेटवर्क का संरक्षण और ईरानी शक्ति की ऐसी अवधारणा, जो सहयोग के बजाय प्रतिस्पर्धा और टकराव पर आधारित है.

उनके लिए 100 अरब डॉलर मुख्य रूप से आर्थिक पुनर्निर्माण कोष नहीं, बल्कि एक रणनीतिक संसाधन है.

पैसा किस दिशा में जाएगा?

चिंता यह नहीं है कि ईरान इस धन को आर्थिक दृष्टि से गलत तरीके से खर्च करेगा. चिंता यह है कि तेहरान की नजर में "सही खर्च" की परिभाषा में हिज़्बुल्लाह जैसे संगठनों को समर्थन बढ़ाना, बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रमों को आगे बढ़ाना, इराक और सीरिया में प्रभाव मजबूत करना और क्षेत्र में सक्रिय गैर-राज्य समूहों को वित्तीय सहायता देना शामिल हो सकता है.

दूसरे शब्दों में, यह धन राजनीतिक रूप से तटस्थ रूप में नहीं आएगा. इसके साथ पहले से जुड़ा एक वैचारिक एजेंडा भी मौजूद रहेगा.

वह सवाल जो कोई नहीं पूछ रहा

ईरान समझौते पर चर्चा स्वाभाविक रूप से परमाणु कार्यक्रम, यूरेनियम संवर्धन, निरीक्षण व्यवस्था और परमाणु क्षमता हासिल करने की समयसीमा जैसे मुद्दों पर केंद्रित रही है. ये सभी महत्वपूर्ण विषय हैं.

लेकिन कुछ मायनों में जमी हुई संपत्तियों का सवाल उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है.

प्रतिबंध इस सिद्धांत पर आधारित थे कि आर्थिक पीड़ा राजनीतिक बदलाव लाएगी. यह सिद्धांत अब तक पूरी तरह सिद्ध नहीं हुआ है.

अब जिस सिद्धांत की परीक्षा हो रही है, वह इसका उलटा है, क्या वित्तीय राहत राजनीतिक नरमी ला सकती है? ईरान के मामले में इस धारणा के समर्थन में उपलब्ध प्रमाण काफी सीमित हैं.

निष्कर्ष

संपत्तियों को फ्रीज करने का आसान चरण कूटनीतिक गठबंधन और दशकों के धैर्य से पूरा किया गया था. लेकिन कठिन प्रश्न अभी बाकी है, 100 अरब डॉलर जैसी विशाल राशि एक अलग-थलग अर्थव्यवस्था, अपारदर्शी वित्तीय व्यवस्था और क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं वाली कट्टरपंथी सरकार को किस दिशा में ले जाएगी?

यह वह प्रश्न है, जिस पर अभी पर्याप्त चर्चा ही नहीं हुई है.

(डिस्क्लेमर: इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं और आवश्यक नहीं कि वे प्रकाशन के विचारों को प्रतिबिंबित करें.)

अतिथि लेखक: सिद्धार्थ अरोड़ा
(सिद्धार्थ अरोड़ा एक मैकेनिकल इंजीनियर हैं. उन्होंने मैनेजमेंट डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट से एमबीए की पढ़ाई भी की हैं. वह वर्तमान में डेलॉइट में एआई/एमएल प्रोडक्ट मैनेजर के रूप में कार्यरत हैं और अंतरराष्ट्रीय संबंधों तथा विदेश नीति में गहरी रुचि रखते हैं.)

 


टैग्स
सम्बंधित खबरें

कविता में एक शोकगीत: मेरे मित्र और बैचमेट, हेमचंद सिरोही, IAS

केजे अल्फोंस लिखते हैं, सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी और बिहार के पूर्व राज्य चुनाव आयुक्त के रूप में, हेमचंद सिरोही को प्रशासनिक कुशलता, जन-केंद्रित शासन और जनसेवा में योगदान के लिए व्यापक सम्मान प्राप्त था. उनके योगदानों में महाबोधि मंदिर को यूनेस्को की विश्व धरोहर की मान्यता दिलाना और जमीनी स्तर पर विकास की पहल शामिल थीं.

4 days ago

दो दुनियाओं के बीच जिंदगी: उथल-पुथल भरे समय की चुनौती

लेखक के अनुसार, हमारे आसपास की दुनिया उतनी नहीं बदली है, जितनी हमारे दिमाग के भीतर की दुनिया बदल गई है. लगातार आती खबरों, सोशल मीडिया और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से पैदा होने वाली चिंताओं के इस दौर में चुनौती है अपना ध्यान फिर से अपने नियंत्रण में लेना और उन चीजों पर फोकस करना, जिन्हें हम नियंत्रित कर सकते हैं.

4 days ago

कलाकार की अनंत रेखाएं: जोगेन चौधरी को श्रद्धांजलि

87 वर्ष की उम्र में दुनिया को अलविदा कहने वाले प्रख्यात कलाकार अपने पीछे ऐसी विशिष्ट कला छोड़ गए हैं, जो उनकी खास क्रॉस-हैचिंग शैली, असामान्य रेखाओं और गहराई से मानवीय चित्रों के लिए पहचानी जाती है.

5 days ago

समुद्र मंथन का अर्थशास्त्र: समृद्धि के लिए विरोधी शक्तियों की जरूरत क्यों है

लेखिका प्रियंका शर्मा कैंतुरा इस लेख में बताती हैं कि देवताओं, असुरों और लक्ष्मी के प्राकट्य की प्राचीन कथा प्रतिस्पर्धा, सहयोग और धन सृजन के बारे में क्या सीख देती है.

1 week ago

जेमी बीटन: असाधारण दिमाग और अरबों डॉलर के कारोबार के पीछे ज्योतिषीय गणना

क्रिमसन एजुकेशन के संस्थापक की शैक्षणिक महत्वाकांक्षा, उद्यमशीलता में उभार और 2027 की संभावनाओं का ज्योतिषीय विश्लेषण

1 week ago


बड़ी खबरें

दिल्ली में 1 नवंबर से BS-6 से पुराने वाहनों की नो एंट्री, जानें किन गाड़ियों को मिलेगी छूट

इस फैसले का असर दिल्ली से सटे हरियाणा के शहरों से आने वाले वाहनों पर भी पड़ेगा. खासतौर पर गुरुग्राम और फरीदाबाद से दिल्ली आने वाले वाहन चालकों को इस नियम का ध्यान रखना होगा.

1 day ago

सरदार पटेल के विचारों पर आगे बढ़ रहा भारत, रक्षा उत्पादन 1.80 लाख करोड़ रुपये के पार: राजनाथ सिंह

सरदार पटेल की 151वीं जयंती पर भारत-भारती ने दिल्ली में आयोजित किया राष्ट्रीय समारोह, रक्षा मंत्री ने कहा- राष्ट्रीय एकता और अखंडता को चुनौती देने वाली ताकतों के खिलाफ देश एकजुट रहेगा

18 hours ago

तमिलनाडु में 5 लाख से अधिक ग्रामीण घरों को मिलेगा ब्रॉडबैंड कनेक्शन, केंद्र ने दी सब्सिडी को मंजूरी

संशोधित भारतनेट कार्यक्रम के तहत तमिलनाडु के 4,767 गांवों तक मांग के आधार पर ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी पहुंचाई जाएगी. केंद्र की वित्तीय सहायता से ग्रामीण इलाकों में इंटरनेट नेटवर्क का विस्तार और डिजिटल सेवाओं तक पहुंच आसान होगी.

1 day ago

सोना 4,200 रुपये और चांदी 10 हजार रुपये टूटी, एक साल के निचले स्तर पर पहुंचे भाव; जानें गिरावट की वजह

MCX पर चांदी करीब 5 फीसदी और सोना 3 फीसदी तक टूट गया. अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी दोनों कीमती धातुओं की कीमतों में बड़ी गिरावट दर्ज की गई.

1 day ago

IDBI बेच रही थी LIC, उसी दौरान Fairfax की कंपनी के बोर्ड में भी रहे LIC के निदेशक

पूर्व नीति आयोग प्रमुख, RBI के डिप्टी गवर्नर, SEBI बोर्ड के सदस्य, रक्षा सचिव और LIC के चेयरमैन जैसे सार्वजनिक पदों पर रह चुके लोगों को Fairfax की भारतीय कंपनियों ने अपने साथ जोड़ा.

1 day ago