होम / सक्सेस स्टोरी / मुश्किलों भरे आसमान में ऐसे ही मजबूत नहीं हुई IndiGo, दिलचस्प है सफलता की कहानी
मुश्किलों भरे आसमान में ऐसे ही मजबूत नहीं हुई IndiGo, दिलचस्प है सफलता की कहानी
इंडिगो की शुरुआत ऐसे समय हुई थी जब इस सेक्टर में प्रवेश एयर टर्बुलेंस में फंसे विमान जितना ही जोखिमभरा था.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 year ago
भारत के एविएशन सेक्टर ने पिछले कुछ सालों में 360 डिग्री के उतार-चढ़ाव देखे हैं. शराब कारोबारी विजय माल्या की किंगफिशर एयरलाइन दिवालिया हुई. सहारा ग्रुप के चेयरमैन सुब्रत रॉय को नुकसान में चल रही अपनी एयरलाइन एयर सहारा को बेचना पड़ा. इसे खरीदने वाली नरेश गोयल की जेट एयरवेज ने खुद 2019 में दम तोड़ दिया. लो-बजट एयरलाइन स्पाइसजेट भी मुश्किलों में घिरी रही और हाल ही में गो फर्स्ट के विमानों के पहिये भी थम गए. लेकिन इन सबके बीच इंडिगो (IndiGO) मजबूती से उड़ान भरती रही और आज यह एक वित्त वर्ष में करीब 1 अरब डॉलर का प्रॉफिट कमाने वाली देश की पहली एयरलाइन बन गई है.
इतनी है बाजार हिस्सेदारी
इंडिगो आज जहां है, वहां से पीछे मुड़कर देखने पर पता चलता है कि कंपनी ने किस तरह छोटी-छोटी बातों को ध्यान में रखकर एक बड़ा लक्ष्य हासिल किया. इंडिगो देश की सबसे बड़ी एयरलाइन है. दिसंबर 2023 के आंकड़े के अनुसार, इंडिगो का मार्केट शेयर 60.5 प्रतिशत है. वहीं, टाटा समूह की एयर इंडिया का 9.7%, विस्तारा का 9.1%, एयर एशिया का 7.1%, स्पाइसजेट का 5.5%, दिवंगत निवेशक राकेश झुनझुनवाला की अकासा एयर का 4.2% और अन्य का 3.9 प्रतिशत है. इंडिगो का इतिहास उपलब्धियों से भरा पड़ा है. पिछले साल जून में कंपनी एक लाख करोड़ रुपए का मार्केट कैप हासिल करने वाली देश की पहली एयरलाइन बनी थी. एक साल में 10 करोड़ से ज्यादा पैसेंजर्स ले जाने का रेकॉर्ड भी इसी के नाम है. IndiGo के बेड़े में 370 विमान हैं और कंपनी रोजाना लगभग 2,000 फ्लाइट्स ऑपरेट करती है.
मुश्किल वक्त में हुई थी शुरुआत
इंडिगो का ऑन-टाइम परफॉरमेंस (OTP) रेट में दूसरी एयरलाइन के मुकाबले काफी बेहतर रहा है. इंडिगो की शुरुआत 2006 में राहुल भाटिया और राकेश गंगवाल ने की थी. हालांकि, बाद में दोनों के बीच मनमुटाव शुरू हो गया, लेकिन तब तक इंडिगो इतनी ऊंचाई पर पहुंच चुकी थी कि जमीन पर चल रहा यह विवाद उसकी उड़ान को प्रभावित नहीं कर पाया. गंगवाल कई बड़ी एयरवेज कंपनियों में काम कर चुके थे और उन्हें एविएशन सेक्टर की काफी नॉलेज थी. लिहाजा, भाटिया ने उनके सामने एयरलाइन शुरू करने का प्रस्ताव रखा. ये वो दौर था जब इस सेक्टर में प्रवेश एयर टर्बुलेंस में फंसे विमान जितना ही जोखिमभरा था. लेकिन इसके बावजूद दोनों ने एयरलाइन शुरू करने का निर्णय लिया. इंडिगो को 2004 में ही लाइसेंस मिल गया था, लेकिन इसकी सेवाएं 2006 तक शुरू हो सकीं क्योंकि उसके पास विमान नहीं थे.
'खास' से पहले 'आम' पर फोकस
राकेश गंगवाल ने अपने कांटेक्ट और अनुभव का इस्तेमाल करते हुए एयरबस से उधार पर 100 विमान हासिल किए और इस तरह चार अगस्त 2006 को इंडिगो ने अपनी पहली उड़ान भरी. हालांकि, नई-नवेली इंडिगो के सामने चुनौतियों का अंबार था. उसे ज्यादा से ज्यादा यात्रियों को अपनी तरफ आकर्षित करना था, ताकि आकाश में मौजूद दूसरी दिग्गज कंपनियों के बीच खुद को बचाए रखा जाए. नई एयरलाइन पर भरोसा एकदम से नहीं होता, इसलिए इसकी संभावना ज्यादा नहीं थी कि अमीर यात्री इंडिगो के लिए अपनी फेवरेट एयरलाइन से नाता तोड़ेंगे. ये वो दौर था जब हवाई सफर आज जितना आसान नहीं था. इसकी सबसे बड़ी वजह थी किराया. इसलिए इसे अमीरों का साधन करार दे दिया गया था. इसलिए इंडिगो ने पहले आम यात्रियों पर फोकस करने का निर्णय लिया.
काम कर गया भाटिया-गंगवाल का दांव
कहने का मतलब है कि इंडिगो ने सस्ते हवाई टिकट पर जोर दिया. महंगे पेशे में सस्ते की पेशकश जोखिम भरा काम तो था, लेकिन राहुल भाटिया और राकेश गंगवाल ने दांव खेला और उनका ये दांव काम कर गया. इंडिगो के टिकट हाथों बिकने लगे और कंपनी जोखिम की आशंका को दूर छोड़ती हुई आगे निकल गई. इंडिगो ने बड़ी छलांग लगाने के लिए छोटे-छोटे मुद्दों पर भी गौर किया. उदाहरण के तौर पर कंपनी ने अपने टर्नअराउंड समय को कम करने के लिए कई ऐसे कदम उठाए, जिनकी बदौलत उसके विमानों के फेरे बढ़ गए. जाहिर है जब फेरे बढ़ेंगे तो मुनाफा भी होगा. Turnaround टाइम में कंपनी लाने का श्रेय 2018 में कंपनी के CIO रहे सौरव सिन्हा को जाता है.
ऐसे कम किया टर्नअराउंड समय
एक दिन सौरव सिन्हा इंडिगो के विमान से सफर कर रहे थे. लैंडिंग के बाद उन्होंने देखा कि केबिन क्रू के सदस्य जल्दी-जल्दी कागज पर कुछ लिख रहे थे. उस समय सिन्हा को नहीं पता था कि ये क्या हो रहा है, लेकिन ऑफिस पहुंचकर उन्होंने इस बारे में पूछताछ की. उन्हें पता चला कि यह सभी इंडिगो विमानों में एक मानक गतिविधि थी, जहां लैंडिंग के बाद केबिन क्रू विमान में नकदी, क्रेडिट कार्ड रसीदें और F&B सेवाओं की सूची का मिलान करता था. लो-कॉस्ट लाइट में खान-पान की व्यवस्था करना मुश्किल भरा काम था और केबिन क्रू के लिए यह और भी मुश्किल हो जाता था. विमान से उतरने के बाद उन्हें पूरे हिसाब-किताब के मिलान करना पड़ता था. जैसे कि कितना कैश आया, फूड कार्ट में क्या बचा है, कितने ऑर्डर आए थे आदि. इन सबमें काफी समय लग जाता था. इस प्रक्रिया को पूरा करने के बाद ही केबिन क्रू अगली फ्लाइट के लिए रवाना होते थे.
जल्दी टेकऑफ में मिली मदद
सौरव सिन्हा इस व्यवस्था में बदलाव के लिए एक नए इन्वेंटरी सिस्टम के साथ सामने आए. उनकी पहल पर इंडिगो ने अपनी फूड कार्ट पर QR कोड लगाना शुरू किया. इस कोड को स्कैन करने के लिए Android आधारित डिवाइसेस भी पेश की गईं. इसका फायदा ये हुआ कि लैंडिंग की तैयारी के समय ही केबिन क्रू इन्वेंटरी से जुड़ा वो हर काम पूरा करने लगा, जिसके लिए उसे नीचे उतरने के बाद कागज-पेन उठाकर मशक्कत करनी पड़ती थी. इंडिगो के इस कदम से केबिन क्रू के साथ-साथ इस प्रक्रिया में जुड़े हर शख्स का काम आसान हुआ और इसमें लगे वाले समय में 20 मिनट से अधिक की बचत हुई. समय की इस बचत के साथ इंडिगो को दूसरी फ्लाइट के जल्दी टेकऑफ में मदद मिली.
और बढ़ेगा कंपनी का दायरा
आज इंडिगो में करीब 25,000 कर्मचारी काम करते हैं और दुनियाभर के 60 शहरों में इसके 126 ऑफिस हैं. पिछले साल इंडिगो ने एयरबस को 500 विमानों का ऑर्डर दिया था, जो एविएशन इतिहास का सबसे बड़ा ऑर्डर है. इससे पहले भी कंपनी ने 480 विमानों का ऑर्डर दिया है. इस तरह देखें तो अगले दशक तक उसे करीब 1000 विमान मिलेंगे. यानी आकाश में उसका दायरा और बढ़ सकेगा. 2020 में राकेश गंगवाल और राहुल भाटिया के बीच विवाद की बात सामने आई थी. फरवरी 2022 में गंगवाल ने कंपनी के बोर्ड से इस्तीफा दे दिया. दिसंबर, 2023 तक गंगवाल की इंडिगो में 11.42 फीसदी हिस्सेदारी थी जबकि उनके फैमिली ट्रस्ट की 13.5% हिस्सेदारी. इसी साल मार्च में गंगवाल ने 5.8% फीसदी हिस्सेदारी बेच दी थी. वहीं, राहुल भाटिया की इंडिगो में 38% हिस्सेदारी है.
टैग्स