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भारत का विदेशी निवेश उछला, FY26 में 26.7 अरब डॉलर के पार
विशेषज्ञों का मानना है कि ODI में यह तेजी भारतीय कंपनियों के बढ़ते आत्मविश्वास को दर्शाती है. कंपनियां नए बाजारों और क्षेत्रों में अवसर तलाशते हुए वैश्विक स्तर पर अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज करा रही हैं.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 57 minutes ago
भारत की विदेशी निवेश गतिविधियों में वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान जोरदार तेजी देखने को मिली है. वित्त मंत्रालय के ताजा आंकड़ों के अनुसार, ओवरसीज डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट (ODI) आउटफ्लो बढ़कर 26.7 अरब डॉलर से अधिक हो गया, जो वित्त वर्ष 2023-24 की तुलना में करीब 84 प्रतिशत की वृद्धि दर्शाता है.
लगातार बढ़ रहा वैश्विक विस्तार
आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि भारतीय कंपनियों का वैश्विक विस्तार लगातार बढ़ रहा है. FY25 में ODI आउटफ्लो 24.2 अरब डॉलर रहा, जबकि FY24 में यह लगभग 14.5 अरब डॉलर था. यह रुझान बताता है कि भारत की कंपनियां अंतरराष्ट्रीय बाजारों में तेजी से अपनी मौजूदगी बढ़ा रही हैं.
इक्विटी निवेश का दबदबा
FY26 में कुल निवेश का बड़ा हिस्सा इक्विटी निवेश के रूप में रहा, जो 18.6 अरब डॉलर से अधिक था. वहीं, 8 अरब डॉलर से ज्यादा निवेश लोन के रूप में किया गया. इससे साफ है कि कंपनियां रणनीतिक हिस्सेदारी के साथ-साथ वित्तीय सहयोग का भी सहारा ले रही हैं.
सिंगापुर बना सबसे बड़ा गंतव्य
भौगोलिक रूप से सिंगापुर भारतीय निवेश के लिए सबसे बड़ा गंतव्य बना रहा, जहां FY26 में 7.6 अरब डॉलर से अधिक का निवेश गया. इसके बाद अमेरिका का स्थान रहा, जहां 4 अरब डॉलर से ज्यादा निवेश हुआ, जबकि मॉरीशस को 2.4 अरब डॉलर से अधिक का निवेश प्राप्त हुआ.
सेवाएं सेक्टर सबसे आगे
क्षेत्रवार आंकड़ों में वित्तीय, बीमा और व्यवसायिक सेवाएं सबसे आगे रहीं. इस सेक्टर में 11 अरब डॉलर से अधिक निवेश हुआ, जो कुल आउटफ्लो का करीब 45 प्रतिशत है. इसके बाद मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में 4.6 अरब डॉलर से अधिक और थोक-खुदरा व्यापार, रेस्तरां और होटल सेक्टर में करीब 3 अरब डॉलर का निवेश हुआ.
मासिक रुझानों में उतार-चढ़ाव
मासिक आंकड़ों में कुछ अस्थिरता भी देखी गई. सितंबर में सबसे ज्यादा 4 अरब डॉलर से अधिक का निवेश हुआ, जबकि नवंबर में यह घटकर करीब 0.8 अरब डॉलर रह गया.
ODI क्या है और क्यों अहम
ODI का मतलब है भारतीय कंपनियों द्वारा विदेशों में संयुक्त उपक्रम या पूरी तरह स्वामित्व वाली सहायक कंपनियों में किया गया निवेश. इससे कंपनियों को वैश्विक स्तर पर विस्तार करने और अंतरराष्ट्रीय वैल्यू चेन से जुड़ने में मदद मिलती है. सरकार की उदारीकृत नीति के तहत कंपनियां अपनी नेटवर्थ के चार गुना तक विदेश में निवेश कर सकती हैं. इसके अलावा, लिबरलाइज्ड रेमिटेंस स्कीम के तहत व्यक्तिगत निवेश की भी अनुमति है.
नीतिगत सुधार और आगे की राह
अधिकारियों के अनुसार, सरकार का उद्देश्य विदेशी निवेश से जुड़े नियमों को सरल बनाना और उन्हें वैश्विक कारोबारी जरूरतों के अनुरूप बनाना है. भारतीय कंपनियां अब तेजी से अंतरराष्ट्रीय बाजारों में विस्तार और विविधीकरण की ओर बढ़ रही हैं.
विशेषज्ञों का मानना है कि ODI में यह तेजी भारतीय कंपनियों के बढ़ते आत्मविश्वास को दर्शाती है. कंपनियां नए बाजारों और क्षेत्रों में अवसर तलाशते हुए वैश्विक स्तर पर अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज करा रही हैं.
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