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इनोवेशन का मूल्यांकन उसके प्रभाव से होना चाहिए, वैल्यूएशन से नहीं: डॉ. प्रफुल आर. नाइक

आविष्कारक, उद्यमी और प्रौद्योगिकी विशेषज्ञ डॉ. प्रफुल रामचंद्र नाइक ने BW Businessworld से विशेष बातचीत में पेटेंट, भारत के नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र, स्वच्छ प्रौद्योगिकी और भविष्य में स्थिरता व मानव कल्याण की बढ़ती भूमिका पर अपने विचार साझा किए.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 4 months ago

रुहैल आमीन 

तीन दशकों से अधिक के औद्योगिक अनुभव और 50 से अधिक वैश्विक पेटेंट्स के साथ, डॉ. प्रफुल रामचंद्र नाइक ने फार्मास्यूटिकल्स, मेडिकल डिवाइसेज, एडवांस्ड मैटेरियल्स, सैनिटेशन टेक्नोलॉजी और क्लीन-टेक इनोवेशन जैसे क्षेत्रों में काम किया है. प्राशक टेक्नो एंटरप्राइजेज के संस्थापक और अमिदा क्लीनटेक के मुख्य प्रौद्योगिकी अधिकारी (CTO) नाइक ने अपने करियर का बड़ा हिस्सा विचारों को व्यावसायिक रूप से व्यवहार्य तकनीकों में बदलने और सामाजिक प्रभाव वाले नवाचारों को बढ़ावा देने में बिताया है. इस बातचीत में उन्होंने बौद्धिक संपदा, भारत की नवाचार संस्कृति, स्वच्छ प्रौद्योगिकी और टिकाऊ नवाचार के भविष्य पर अपने विचार साझा किए.

प्रश्न: आपके नाम 50 से अधिक पेटेंट दर्ज हैं. किसी विचार को पेटेंट योग्य क्या बनाता है?

किसी विचार को बौद्धिक संपदा में बदलने की प्रक्रिया में कई पहलू शामिल होते हैं. हर विचार बौद्धिक संपदा नहीं बनता. हालांकि, कुछ विचारों में व्यापक विस्तार और व्यावसायिक मूल्य सृजित करने की असाधारण क्षमता होती है. यदि ऐसे विचारों को पेटेंट के माध्यम से संरक्षित किया जाए, तो वे अधिक सार्थक और मूल्यवान बन जाते हैं.

बौद्धिक संपदा केवल व्यावसायीकरण तक सीमित नहीं है. यह किसी विचार की मौलिकता की रक्षा भी करती है. यदि मैंने कोई विचार विकसित किया है और उसे पेटेंट के माध्यम से संरक्षित किया है, तो एक निश्चित अवधि तक उसका उपयोग करने वालों को उस ढांचे का पालन करना होगा. इससे आपको अधिकार और सुरक्षा मिलती है, जो अत्यंत मूल्यवान है.

कई विचार केवल इसलिए गोपनीय रखे जाते हैं क्योंकि उनकी नकल का डर होता है. लेकिन मेरे विचार में, जितना अधिक आप एक मजबूत पेटेंट स्पेसिफिकेशन के माध्यम से जानकारी साझा करते हैं, सुरक्षा उतनी ही मजबूत होती जाती है.

पेटेंट कार्यालय भी नवीनता और आविष्कारशीलता को देखता है. ये दोनों अत्यंत महत्वपूर्ण कारक हैं. यदि कोई नवाचार किसी विशेष आवश्यकता को पूरा करता है और मूल्य सृजित करता है, भले ही वह किसी छोटे समुदाय के लिए ही क्यों न हो, तब भी वह एक मूल्यवान विचार है.

प्रश्न: भारत ने कई नवाचारक दिए हैं, फिर भी वैश्विक स्तर पर प्रभावशाली उत्पादों की कमी की बात अक्सर होती है. इसकी वजह क्या है?

सबसे बड़ी वजह हमारी संस्कृति है. भारत में साझा करने और देने की परंपरा रही है. ज्ञान को हमेशा साझा किया गया है, उसका व्यावसायीकरण कम हुआ है. दूसरी ओर, बौद्धिक संपदा मुख्य रूप से मूल्य सृजन और पूंजीकरण से जुड़ी होती है.

कई पश्चिमी देशों में जैसे ही कोई विचार जन्म लेता है, उसे संरक्षित और व्यावसायिक बनाने के प्रयास शुरू हो जाते हैं. भारत में यह एक बड़ा अंतर रहा है.

दूसरी वजह इकोसिस्टम है. अमेरिका जैसे देशों में नवाचार और बौद्धिक संपदा को समर्थन देने वाला मजबूत पारिस्थितिकी तंत्र मौजूद है. वहां बौद्धिक संपदा को महत्व दिया जाता है क्योंकि उसे प्रभावी ढंग से लागू और मुद्रीकृत किया जा सकता है.

मुझे याद है कि एक बार मैं फाइजर के एक वरिष्ठ बौद्धिक संपदा विशेषज्ञ के साथ मंच साझा कर रहा था. उन्होंने एक दिलचस्प उदाहरण दिया. भारत में कोई बच्चा अपने मित्र से गेम उधार लेकर पिता से उसे इंस्टॉल करने के लिए कह सकता है. वहीं अमेरिका में बच्चा अपने पिता से वह गेम खरीदने के लिए कहेगा. यह अंतर बौद्धिक संपदा के प्रति सोच को दर्शाता है.

प्रश्न: आप कैसे तय करते हैं कि किस समस्या पर वर्षों तक काम करना उचित है?

आजकल हर विचार को इस नजरिए से देखा जाता है कि क्या वह अरबों डॉलर का अवसर बन सकता है.

मैं इस सोच से सहमत नहीं हूं. हर विचार का अपना मूल्य होता है. यदि वह सामाजिक प्रभाव पैदा कर सकता है, यदि वह किसी एक व्यक्ति के जीवन को भी सकारात्मक रूप से प्रभावित कर सकता है, तो उस पर काम करना सार्थक है. नवाचार का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि वह कितना पैसा कमा सकता है.

कई नवाचारक अपने विचारों से भावनात्मक रूप से जुड़े होते हैं और यह स्वाभाविक भी है. यदि कोई विचार समाज के लिए उपयोगी है या किसी महत्वपूर्ण चुनौती का समाधान करता है, तो वह ध्यान देने योग्य है, चाहे उसका व्यावसायिक पैमाना कुछ भी हो.

प्रश्न: तकनीक विकसित करना कठिन है या उसका व्यावसायीकरण?

दोनों ही समान रूप से चुनौतीपूर्ण हैं. उद्यमी को अक्सर लगता है कि व्यावसायीकरण अधिक कठिन है और तकनीक बनाना अपेक्षाकृत आसान है. वहीं आविष्कारक मानते हैं कि विचार और तकनीक विकसित करना अत्यधिक रचनात्मकता और मेहनत की मांग करता है.

मेरे दृष्टिकोण से दोनों की अपनी चुनौतियां हैं और दोनों समान रूप से महत्वपूर्ण हैं.

आज व्यावसायीकरण अधिक कठिन हो गया है क्योंकि बाजार में पहले से ही अनेक प्रतिस्पर्धी उत्पाद और तकनीकें मौजूद हैं. ऐसे में किसी नए उत्पाद का महत्व लोगों तक पहुंचाना आसान नहीं है.

साथ ही, सार्थक नवाचार विकसित करना भी लगातार चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है.

प्रश्न: आपके सभी नवाचारों में से किस पर आपको सबसे अधिक गर्व है?

मेरे शुरुआती करियर का एक अनुभव मेरे लिए बेहद महत्वपूर्ण रहा. मुझे एक बहुराष्ट्रीय कंपनी द्वारा लगभग 50 वर्ष पहले तैयार की गई एक पुरानी प्रक्रिया का दस्तावेज मिला.

मैंने उस दस्तावेज का उपयोग करके एक बिल्कुल अलग उत्पाद विकसित किया, जो एक विशिष्ट उपयोग के लिए था.

इस अनुभव ने मुझे दस्तावेजीकरण के महत्व का एहसास कराया. 50 वर्ष पुरानी जानकारी का इतनी प्रभावी तरह से उपयोग किया जाना यह दिखाता है कि ज्ञान को संरक्षित करना कितना आवश्यक है.

आज भी मैं अपने विचारों को तुरंत लिख लेता हूं. विचार अमूर्त होते हैं और जल्दी गायब हो सकते हैं. यदि आप उन्हें दर्ज नहीं करते, तो संभव है कि वे हमेशा के लिए खो जाएं.

प्रश्न: भारत की नवाचार चुनौती प्रतिभा, पूंजी या मानसिकता से जुड़ी है?

यह निश्चित रूप से प्रतिभा की समस्या नहीं है. भारत में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है. छोटे-छोटे नवाचार आपको हर जगह दिखाई देंगे, यहां तक कि ग्रामीण क्षेत्रों और सड़कों पर भी. कई जमीनी स्तर के नवाचार वास्तव में अद्भुत हैं.

मुख्य चुनौती मानसिकता की है. हम अक्सर त्वरित लाभ चाहते हैं. हम चाहते हैं कि नवाचार जल्दी से पैसा कमाना शुरू कर दे. जबकि परिपक्व नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र लंबी अवधि के निवेश पर भरोसा करते हैं.

हमें अधिक धैर्य और दीर्घकालिक दृष्टिकोण की आवश्यकता है. भारत में प्रतिभा प्रचुर मात्रा में है. चुनौती यह है कि हम उसे कैसे विकसित करें, समर्थन दें और बड़े स्तर तक पहुंचाएं.

प्रश्न: अमिदा क्लीनटेक में किस तरह का काम हो रहा है?

इस यात्रा की शुरुआत 2012 के आसपास हुई, जब हमारे चेयरमैन डॉ. धर्मवीर कपूर ने प्रदूषण से जुड़ी समस्याओं के समाधान तलाशने की पहल की.

हमने कई वर्षों तक तकनीक विकसित करने पर काम किया. शुरुआती सफलता तब मिली जब हमारी तकनीक को फ्रेंच रेलवे की एक वैश्विक पहल के तहत चुना गया. चयनित होने वाली यह एकमात्र गैर-यूरोपीय तकनीक थी.

पेरिस मेट्रो स्टेशन और रेलवे स्टेशन पर विस्तृत परीक्षणों के बाद इस तकनीक ने कई मानकों पर उत्कृष्ट प्रदर्शन किया.

आज हमारे पास भारत, अमेरिका और यूरोप सहित कई बाजारों में पेटेंट हैं.

यह तकनीक वायु शुद्धिकरण पर केंद्रित है और बंद, अर्ध-बंद तथा खुले स्थानों में उपयोग की जा सकती है. हमारे प्रमुख प्रोजेक्ट्स में से एक काशी विश्वनाथ धाम था, जहां इसका उपयोग वायु गुणवत्ता से जुड़ी चुनौतियों के समाधान के लिए किया गया. हम लगातार इस तकनीक का विस्तार और नवाचार कर रहे हैं.

प्रश्न: अगला बड़ा विचार खोज रहे युवा संस्थापकों को आप क्या सलाह देंगे?

मैं उन्हें यही सलाह दूंगा कि वे किसी विचार का मूल्यांकन केवल उसके व्यावसायिक परिणामों के आधार पर न करें.

कई लोग अपने विचारों को इसलिए छोड़ देते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि वे पर्याप्त राजस्व नहीं ला पाएंगे. यह एक गलती है.

आविष्कारकों को अपने विचारों के सामाजिक प्रभाव से भावनात्मक रूप से जुड़े रहना चाहिए. यदि कोई विचार समुदायों की मदद कर सकता है और महत्वपूर्ण समस्याओं का समाधान कर सकता है, तो वह ध्यान देने योग्य है.

व्यावसायिक सफलता महत्वपूर्ण है, लेकिन प्रभाव प्राथमिक प्रेरणा बना रहना चाहिए.

प्रश्न: भारत के अगले दशक को क्या परिभाषित करेगा—AI, क्लीन-टेक, बायोटेक या कुछ और?

मेरे विचार में मानव स्वास्थ्य और कल्याण सबसे महत्वपूर्ण विषय बने रहेंगे.

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस निश्चित रूप से बड़ी भूमिका निभाएगा. स्थिरता का महत्व भी लगातार बढ़ेगा क्योंकि जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय चुनौतियां गंभीर होती जा रही हैं.

कोई भी नवाचार जो स्थिरता को बेहतर बनाए और साथ ही मानव स्वास्थ्य व कल्याण में योगदान दे, वह अत्यधिक मूल्य सृजित करेगा.

अगले दशक में सबसे बड़े अवसर मुझे इसी क्षेत्र में दिखाई देते हैं.

प्रश्न: क्या आधुनिक विज्ञान और प्राचीन ज्ञान मिलकर स्वास्थ्य संबंधी बड़ी चुनौतियों का समाधान कर सकते हैं?

एक ऐसा क्षेत्र है जिसे अभी भी कम आंका जाता है और वह है प्रकृति.

मेरा शैक्षणिक आधार फार्मास्यूटिकल विज्ञान और आधुनिक चिकित्सा में है, लेकिन मेरा मानना है कि मानवता के सामने मौजूद कई स्वास्थ्य चुनौतियों के समाधान प्रकृति में मौजूद हैं.

प्रकृति में ऐसे अनेक संसाधन हैं जो उन बीमारियों के समाधान में मदद कर सकते हैं, जिनसे आधुनिक स्वास्थ्य प्रणाली आज भी जूझ रही है. यदि हम वैज्ञानिक दृष्टिकोण को पारंपरिक ज्ञान और प्राकृतिक संसाधनों के साथ जोड़ दें, तो मानव स्वास्थ्य और कल्याण के लिए बड़े लाभ संभव हैं.

हम कई मायनों में प्रकृति से दूर हो गए हैं. उसकी ओर लौटना और उसकी क्षमता को समझना आने वाले वर्षों में महत्वपूर्ण मूल्य सृजित कर सकता है.

रुहैल आमीन, BW रिपोर्टर्स

(रुहैल अमीन, BW Businessworld में सीनियर एडिटर हैं और नई दिल्ली में आधारित एक अनुभवी पत्रकार हैं. वे अपने गहन विश्लेषण और विस्तृत रिपोर्टिंग के लिए जाने जाते हैं. उनका कार्य पत्रकारिता की निष्पक्षता और उत्कृष्ट कहानी कहने की प्रतिबद्धता को दर्शाता है, जिसने उन्हें उद्योग में एक विश्वसनीय आवाज के रूप में स्थापित किया है. उनके योगदान विभिन्न प्लेटफॉर्म्स पर फैले हुए हैं, जहां वे लगातार ऐसी सामग्री प्रस्तुत करते हैं जो पाठकों को जानकारी देने के साथ-साथ उन्हें जोड़कर भी रखती है.)
 


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