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GDP से आगे: क्यों भारत की प्रगति का पैमाना सिर्फ आर्थिक वृद्धि नहीं, बल्कि खुशहाली और जीवन गुणवत्ता भी होना चाहिए

पूर्व उत्तर प्रदेश मुख्य सचिव और लेखक आलोक रंजन का मानना है कि भारत की विकास यात्रा को केवल आर्थिक उत्पादन तक सीमित नहीं रहना चाहिए. उनके अनुसार, खुशहाली, जीवन की गुणवत्ता, शिक्षा, स्वास्थ्य और समावेशी विकास को भी प्रगति का महत्वपूर्ण पैमाना बनाया जाना चाहिए.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 months ago

दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होने के बावजूद, खुशहाली और कल्याण से जुड़े वैश्विक सूचकांकों में भारत की रैंकिंग अपेक्षाकृत कम बनी हुई है. अपनी नई पुस्तक 'बियॉन्ड जीडीपी' में पूर्व आईएएस अधिकारी और लेखक आलोक रंजन इस धारणा को चुनौती देते हैं कि केवल आर्थिक वृद्धि ही किसी देश की प्रगति को परिभाषित कर सकती है. लगभग चार दशकों के सार्वजनिक प्रशासनिक अनुभव, जिसमें उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव के रूप में उनका कार्यकाल भी शामिल है, के आधार पर रंजन एक ऐसे व्यापक ढांचे की वकालत करते हैं, जिसमें मानव विकास, जीवन की गुणवत्ता और सतत विकास को नीति-निर्माण के केंद्र में रखा जाए.

BW Businessworld को दिए एक साक्षात्कार में उन्होंने इस बात पर चर्चा की कि भारत को GDP से आगे क्यों देखना चाहिए, लोगों के कल्याण को बेहतर बनाने में सरकारों और व्यवसायों की क्या भूमिका हो सकती है, और किस प्रकार खुशहाली विकास का एक सार्थक पैमाना बन सकती है. संपादित अंश.

प्रश्न: आपकी पुस्तक का तर्क है कि मजबूत GDP वृद्धि जरूरी नहीं कि बेहतर जीवन गुणवत्ता भी सुनिश्चित करे. आपको राष्ट्रीय प्रगति के सबसे व्यापक रूप से स्वीकार किए गए पैमानों में से एक को चुनौती देने की प्रेरणा क्या मिली, और आज भारत के लिए यह चर्चा क्यों महत्वपूर्ण है?

GDP को पूरी दुनिया में प्रगति के एक महत्वपूर्ण पैमाने के रूप में स्वीकार किया जाता है और मैं इसके महत्व से इनकार नहीं करता. यह आर्थिक प्रदर्शन का एक उत्कृष्ट संकेतक है. यह बताता है कि कोई अर्थव्यवस्था कितनी संपत्ति पैदा कर रही है, विभिन्न क्षेत्र किस गति से बढ़ रहे हैं और आर्थिक गतिविधियों की समग्र स्थिति क्या है.

हालांकि, GDP पूरी कहानी नहीं बताता. अक्सर यह मान लिया जाता है कि यदि GDP वृद्धि मजबूत होगी तो उसका लाभ स्वतः समाज के सभी वर्गों तक पहुंच जाएगा. मेरा तर्क है कि विभिन्न सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक कारणों से ऐसा हमेशा नहीं होता.

GDP यह नहीं बता सकता कि लोगों को कैसी शिक्षा मिल रही है या ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता कैसी है. यह जीवन की गुणवत्ता को नहीं मापता. भारत का लक्ष्य 2047 तक एक विकसित राष्ट्र बनना है और इसके लिए ऐसी वृद्धि की आवश्यकता है जो समावेशी और सतत दोनों हो. हमें GDP से आगे जाकर यह देखना होगा कि क्या लोग वास्तव में बेहतर जीवन जी रहे हैं.

प्रश्न: भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में से एक है, फिर भी खुशहाली और कल्याण के कई सूचकांकों में इसकी रैंकिंग कम है. नीति-निर्माता आर्थिक विकास और नागरिकों की जीवन संतुष्टि के बीच संतुलन कैसे स्थापित करें?

यही मेरी पुस्तक का केंद्रीय तर्क है. ऐतिहासिक रूप से अर्थशास्त्र का संबंध दर्शनशास्त्र से रहा है और इसका मुख्य उद्देश्य मानव खुशहाली और कल्याण था. एडम स्मिथ, अल्फ्रेड मार्शल, जॉन मेनार्ड कीन्स और साइमन कुजनेट्स जैसे अर्थशास्त्रियों ने भी अपने लेखन में मानव कल्याण पर जोर दिया है.

हालांकि 20वीं सदी के दौरान अर्थशास्त्र का ध्यान धीरे-धीरे वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन पर केंद्रित हो गया. उत्पादन महत्वपूर्ण है, लेकिन नीति-निर्माताओं को इससे आगे भी देखना होगा.

भारत दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हो सकता है, लेकिन वैश्विक खुशहाली सूचकांकों में हमारी रैंकिंग लगातार कम बनी हुई है. ये सूचकांक लोगों की जीवन के प्रति संतुष्टि पर आधारित सर्वेक्षणों से तैयार होते हैं. यदि बड़ी संख्या में लोग असंतोष व्यक्त कर रहे हैं, तो नीति-निर्माताओं को यह समझना होगा कि ऐसा क्यों हो रहा है. केवल आर्थिक वृद्धि पर्याप्त नहीं है, यदि वह लोगों के जीवन में बेहतर अनुभव और संतुष्टि नहीं ला रही.

प्रश्न: अपनी पुस्तक में आपने मानव विकास सूचकांक (HDI), सतत विकास लक्ष्य (SDGs) और भूटान के ग्रॉस नेशनल हैप्पीनेस मॉडल जैसे ढांचों का उल्लेख किया है. इनमें से कौन-से तत्व भारत अपनी नीतियों में शामिल कर सकता है?

GDP से प्रति व्यक्ति आय की ओर बढ़ना भी यह समझने में मदद करता है कि लोग किस स्तर का जीवन जी रहे हैं. इसके अलावा मानव विकास सूचकांक विशेष रूप से उपयोगी है क्योंकि यह शिक्षा, स्वास्थ्य और आय को एक साथ मापता है.

भारत को विकास का मूल्यांकन करते समय GDP के साथ इन तीन संकेतकों को भी शामिल करना चाहिए. हर वर्ष प्रकाशित होने वाली मानव विकास रिपोर्टें इन क्षेत्रों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी देती हैं.

भूटान का ग्रॉस नेशनल हैप्पीनेस मॉडल भी महत्वपूर्ण है, हालांकि यह अपेक्षाकृत अधिक व्यक्तिपरक है और इसे मापना कठिन है. फिर भी यह सरकारों को एक महत्वपूर्ण प्रश्न पूछने के लिए प्रेरित करता है कि क्या उनकी नीतियां लोगों को पहले की तुलना में अधिक खुश बना रही हैं. हमें ऐसे संकेतकों का विकास करना चाहिए जो इस प्रकार के कल्याण को माप सकें.

प्रश्न: उत्पादकता, लंबे कार्य घंटे और कार्य-जीवन संतुलन को लेकर बहस तेज हुई है. क्या भारत ऐसी स्थिति में पहुंच सकता है जहां आर्थिक उत्पादन बढ़े लेकिन व्यक्तिगत खुशहाली घट जाए?

मैं कड़ी मेहनत में विश्वास करता हूं. बिना मेहनत और प्रतिबद्धता के कोई भी देश विकसित नहीं हो सकता. लेकिन काम और निजी जीवन के बीच संतुलन भी आवश्यक है.

परिवार महत्वपूर्ण है. व्यक्तिगत खुशहाली भी महत्वपूर्ण है. जब लोग स्वयं की उपेक्षा करते हैं तो इसका प्रभाव उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता है. दिलचस्प बात यह है कि खुशहाली और उत्पादकता के बीच सीधा संबंध भी होता है. खुश व्यक्ति अधिक उत्पादक होते हैं और बेहतर प्रदर्शन करते हैं.

व्यवसायों और सरकारों को लोगों को केवल संसाधन या इनपुट के रूप में नहीं देखना चाहिए. मनुष्य अपनी आकांक्षाओं और भावनाओं के साथ एक व्यक्ति होता है. जब संस्थाएं अपने कर्मचारियों के समग्र विकास में निवेश करती हैं तो उन्हें बेहतर परिणाम, अधिक भागीदारी और उच्च उत्पादकता मिलती है.

प्रश्न: लगभग चार दशकों के प्रशासनिक अनुभव के आधार पर, यदि सरकारें GDP से आगे बढ़ें तो किन नीतिगत बदलावों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए?

शिक्षा मेरी सर्वोच्च प्राथमिकता होगी. भारत के पास जनसांख्यिकीय लाभ है, लेकिन हम इसे पूरी तरह जनसांख्यिकीय लाभांश में परिवर्तित नहीं कर पाए हैं. कई युवा बेरोजगार या अल्परोजगार की स्थिति में हैं. अक्सर लोगों को उनकी योग्यता और प्रशिक्षण के अनुरूप रोजगार नहीं मिल पाता, जिससे असंतोष पैदा होता है.

गुणवत्तापूर्ण शिक्षा बेहद महत्वपूर्ण है. समाज के एक छोटे विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग और बहुसंख्यक आबादी को मिलने वाली शिक्षा के बीच बड़ा अंतर मौजूद है. यह असमानता अवसरों की समानता को कमजोर करती है.

स्वास्थ्य सेवाएं भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं. शहरी क्षेत्रों में निजी अस्पताल और मेडिकल कॉलेज उपलब्ध हैं, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों को अभी भी गुणवत्तापूर्ण इलाज के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है. तकनीक, टेलीमेडिसिन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल कनेक्टिविटी इस अंतर को कम करने के अवसर प्रदान करती हैं.

यदि सरकारें जीवन की गुणवत्ता को प्रमुख लक्ष्य बना लें, तो नीति-निर्माण और उसके परिणाम दोनों काफी अलग दिखाई देंगे.

प्रश्न: 'बियॉन्ड GDP' में बताए गए व्यापक लक्ष्यों को आगे बढ़ाने में कॉर्पोरेट भारत की क्या भूमिका हो सकती है?

निश्चित रूप से लाभ कमाना आवश्यक है. कोई भी व्यवसाय लाभ के बिना नहीं चल सकता और मैं इससे असहमत नहीं हूं. लेकिन लाभ ही एकमात्र उद्देश्य नहीं होना चाहिए.

कॉर्पोरेट भारत को लोगों और पर्यावरण पर भी ध्यान देना चाहिए. पर्यावरणीय जिम्मेदारी और कर्मचारियों का कल्याण व्यापार रणनीति का अभिन्न हिस्सा होना चाहिए. कंपनियां समाज के भीतर कार्य करती हैं और उनकी सफलता भी उसी समाज से आती है. इसलिए उनका यह दायित्व है कि वे समाज को वापस भी कुछ दें.

आज ESG निवेश का महत्व बढ़ रहा है, जहां पर्यावरण, सामाजिक और प्रशासनिक मानकों के आधार पर निवेश निर्णय लिए जाते हैं. निवेशकों को उन कंपनियों को प्रोत्साहित करना चाहिए जो कर्मचारियों का ध्यान रखती हैं, समाज में सकारात्मक योगदान देती हैं और जिम्मेदारी के साथ काम करती हैं.

प्रश्न: राष्ट्रीय विकास और कॉर्पोरेट सफलता के लिए खुशहाली कितनी महत्वपूर्ण है?

खुशहाली मूलभूत है क्योंकि अंततः हर इंसान इसी की तलाश करता है.

हम खुश रहने के लिए काम करते हैं. हम बेहतर जीवन और खुशहाली के लिए धन कमाते हैं. हम ऐसे करियर और पेशे चुनते हैं जो हमें संतुष्टि प्रदान करें. सरकारों और व्यवसायों को ऐसा वातावरण तैयार करना चाहिए जहां लोग अपनी क्षमता को पहचान सकें और अपनी आकांक्षाओं को पूरा कर सकें.

जब लोग अपनी प्रतिभा का उपयोग कर पाते हैं, अपने सपनों को पूरा कर पाते हैं और अपने जीवन में उद्देश्य खोज लेते हैं, तो खुशहाली स्वाभाविक रूप से आती है.

दिलचस्प बात यह है कि कई अध्ययनों में पाया गया है कि अमेरिका और चीन जैसे देशों में भी, जहां दशकों तक मजबूत आर्थिक वृद्धि हुई, वहां खुशहाली के स्तर में गिरावट देखी गई है. यह दर्शाता है कि केवल आर्थिक वृद्धि ही अंतिम लक्ष्य नहीं हो सकती. विकास का वास्तविक उद्देश्य मानव कल्याण में सुधार होना चाहिए.

तरन्नुम मंजुल, BW रिपोर्टर्स

(तरन्नुम मंजुल, राजनीति, प्रशासन, जीवनशैली और अन्य विषयों पर दो दशकों से अधिक अनुभव रखने वाली भारतीय पत्रकार हैं.)
 


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