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अमेरिकी टैरिफ की धमकी से बढ़ सकता है भारत का क्रूड बिल, चालू खाता घाटा भी होगा दोगुना: CareEdge
रूसी तेल पर 100% टैरिफ लगा तो बढ़ेंगी भारत की मुश्किलें, कच्चा तेल 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचने का अनुमान
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 2 hours ago
रूस से कच्चा तेल खरीदने वाले देशों पर अमेरिका की ओर से 100 फीसदी टैरिफ लगाने की ताजा धमकी भारत के लिए आर्थिक मोर्चे पर नई चुनौतियां खड़ी कर सकती है. CareEdge Ratings के मुताबिक, अगर भारत को रूसी कच्चे तेल पर अपनी निर्भरता कम करनी पड़ती है और साथ ही स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में जारी व्यवधान लंबे समय तक बना रहता है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल के पार जा सकती है. ऐसी स्थिति में भारत का आयात बिल बढ़ने के साथ महंगाई और चालू खाता घाटे (CAD) पर भी दबाव बढ़ सकता है.
क्रूड 110-120 डॉलर तक पहुंचने का जोखिम
CareEdge Ratings के चीफ रेटिंग्स ऑफिसर सचिन गुप्ता ने कहा कि अगर रूसी तेल की आपूर्ति में कमी और वैश्विक शिपिंग में बाधाएं एक साथ बनी रहती हैं, तो कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल देखने को मिल सकता है. ऐसे हालात में क्रूड 100 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर सकता है, जबकि सबसे खराब स्थिति में इसकी कीमत 110-120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती है.
उन्होंने कहा कि कच्चे तेल की कीमतों में इतनी बड़ी वृद्धि से भारत का आयात बिल बढ़ेगा, बाहरी क्षेत्र के संतुलन पर दबाव पड़ेगा और घरेलू आर्थिक गतिविधियों के लिए भी अतिरिक्त चुनौतियां पैदा होंगी.
रूसी तेल पर भारत की निर्भरता बढ़ा सकती है जोखिम
गुप्ता के अनुसार, जुलाई में भारत के कुल कच्चे तेल आयात में रूसी क्रूड की हिस्सेदारी करीब 50 फीसदी रही. इससे पता चलता है कि देश के ऊर्जा मिश्रण में रूसी तेल की कितनी महत्वपूर्ण भूमिका है. यदि भारत को रूसी तेल की खरीद में बड़ी कटौती करनी पड़ती है, तो भारतीय रिफाइनरों को अन्य देशों से कच्चा तेल खरीदना होगा, जो अधिक कीमत पर मिल सकता है.
उन्होंने कहा कि यदि भारत और चीन रूसी तेल की खरीद में तेज कटौती या पूरी तरह रोक लगाते हैं और इसी दौरान स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में व्यवधान जारी रहता है, तो वैश्विक तेल आपूर्ति का करीब 30 फीसदी हिस्सा प्रभावित हो सकता है. इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों पर तेज बढ़ोतरी का दबाव बनेगा और बड़े तेल आयातक देशों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है.
महंगा क्रूड बढ़ाएगा चालू खाता घाटा
भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता बढ़ता हुआ क्रूड इंपोर्ट बिल हो सकता है. CareEdge के मुताबिक, यदि कच्चे तेल की कीमत 110-120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचती है, तो केवल महंगे तेल के प्रभाव से भारत का चालू खाता घाटा पिछले साल के स्तर से करीब दोगुना हो सकता है.
कच्चे तेल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी से देश के विदेशी भुगतान संतुलन पर दबाव बढ़ेगा. भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है, इसलिए वैश्विक तेल कीमतों में तेज वृद्धि का सीधा असर देश के आयात खर्च पर पड़ता है.
महंगे पेट्रोल-डीजल से बढ़ सकती है महंगाई
क्रूड की कीमतों में लंबे समय तक तेजी रहने पर महंगाई का दबाव भी बढ़ सकता है. महंगा तेल परिवहन और ऊर्जा पर निर्भर अन्य गतिविधियों की लागत बढ़ा सकता है, जिसका असर अर्थव्यवस्था के अलग-अलग हिस्सों में देखने को मिल सकता है.
सचिन गुप्ता के मुताबिक, सरकार 100-105 डॉलर प्रति बैरल के दायरे में कच्चे तेल की कीमतों को कुछ हद तक मैनेज कर सकती है, लेकिन कीमत 110 डॉलर से ऊपर जाने पर ऑयल मार्केटिंग कंपनियों पर दबाव काफी बढ़ सकता है. लंबे समय तक ऊंची कीमतें बनी रहने पर सरकारी वित्त और ईंधन खुदरा कंपनियों की लाभप्रदता दोनों प्रभावित हो सकती हैं.
भारत के पास सप्लाई के दूसरे विकल्प, लेकिन कीमत बड़ी चुनौती
हालांकि, CareEdge का मानना है कि भारत ने अलग-अलग देशों से कच्चा तेल खरीदने में काफी लचीलापन दिखाया है और आगे भी ऊर्जा सुरक्षा को प्राथमिकता देगा. ऐसे में भारत के लिए मुख्य समस्या वैकल्पिक स्रोतों से कच्चा तेल उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि उसे किस कीमत पर हासिल किया जा सकता है, यह होगी.
वैश्विक ऊर्जा बाजार पहले से ही ईरान संघर्ष और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में जारी व्यवधान के कारण अनिश्चितता के दौर से गुजर रहा है. ऐसे में रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर अमेरिका की नई टैरिफ धमकी ने भारत और चीन जैसे बड़े आयातकों के लिए जोखिम और बढ़ा दिया है.
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