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Sunday Special: खस्ताहाल टॉकीज से मल्टीप्लेक्स का सफर, जानिए PVR बनने की कहानी

पिता को अपने दिल की बात बोल तो दी लेकिन आगे करना क्या है, ये अब भी पता नहीं था. जानिए भारत में कैसे हुआ PVR का जन्म.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 years ago

नई दिल्ली: आज से कुछ साल पहले की ही बात है, जब हम अपने शहरों में फिल्म देखने के लिए टॉकीज जाते थे, तो अक्सर लंबी लाइन में खड़े होते थे. अपना हाथ एक छोटी सी खिड़की से अंदर डालते, अंदर से टिकट हमारे हाथ में ठूंस दिया जाता और हम भीड़ से ऐसे निकलते जैसे कौन-सा किला फतह कर लिया हो. पिक्चर अगर हाउसफुल हो तो अच्छी सीट पाने के लिए धक्का-मुक्की करनी पड़ती सो अलग. 

भारत में मल्टीप्लेक्स के जनक हैं अजय बिजली
सिनेमा देखने का ये अनुभव भी कमाल का था, लेकिन इस कमाल के अनुभव को और कमाल का बनाया मल्टीप्लेक्स कल्चर ने, जो अब छोटे-बड़े शहरों में खुल रहे हैं. अब आपको टिकट लेने के लिए धक्का-मुक्की नहीं करना, क्योंकि सबकुछ ऑनलाइन है. सीट की चिंता नहीं करनी, क्योंकि आप अपनी मनपसंद सीट खुद चुन सकते हैं. चमचमाती शानदार स्क्रीन, हाई क्वालिटी डिजिटल साउंड, आरामदायक सीट...सिनेमा देखने के अनुभव को इतना शानदार बनाने का अगर किसी को श्रेय जाता है तो वो हैं PVR के फाउंडर अजय बिजली.

अजय बिजली की कहानी भी पूरी फिल्मी
अजय बिजली का जन्म एक बिजनेसमैन परिवार में हुआ. उनके पिता ट्रांसपोर्ट का बिजनेस करते थे. अजय बिजली ने दिल्ली के हिंदू कॉलेज से BA ऑनर्स की डिग्री  हासिल की, फिर इसके बाद वो हार्वर्ड बिजनेस स्कूल पढ़ने चले गए. जब वो वहां से अपनी पढ़ाई पूरी करके लौटे तो जैसा कि अक्सर होता है, उन्होंने सिर्फ 22 साल की उम्र में यानी 1988 में ही ट्रांसपोर्ट बिजनेस में आकर पिता का साथ देना शुरू कर दिया, लेकिन लाख कोशिशों के बावजूद वो इस फैमिली बिजनेस में अपना मन नहीं लगा पाए. वो समझ गये कि वो इसके लिए नहीं बने हैं, उन्हें तो कुछ और करना है, लेकिन क्या, तबतक ये भी नहीं पता था. उनके सामने अब ये समस्या थी कि वे पिता जी से ये कैसे कहें कि वो इस फैमिली बिजनेस को नहीं करना चाहते, इसलिए चुप ही रहे, लेकिन एक दिन उन्होंने हिम्मत करके ये बात पिता जी को बोल दी कि उन्हें इस ट्रांसपोर्ट बिजनेस को नहीं करना है.

पिता को अपने दिल की बात बोल तो दी लेकिन आगे करना क्या है, ये अब भी पता नहीं था. अजय बिजली के पिता का दिल्ली के वसंत विहार में एक सिनेमाहॉल भी था, प्रिया सिनेमा के नाम से, जिसे उन्होंने 1978 में खरीदा था, लेकिन उसकी हालत ज्यादा अच्छी नहीं थी. अजय बिजली ने सोचा कि क्यों न मैं इस पर ही अपना काम करूं. बस ये उनका पहला कदम था, जिसने भारत में सिनेमा इंडस्ट्री की किस्मत पलटकर रख दी.

प्रिया सिनेमा से मल्टीप्लेक्स की सोच
प्रिया सिनेमा को फिर से शुरू करना एक बड़ी चुनौती थी, क्योंकि दूसरे सिनेमा काफी अच्छा काम कर रहे थे. एक के एक कई प्रयोग अजय बिजली ने किये. मार्केट को समझने के बाद अजय बिजली ने हॉलीवुड फिल्मों को दिखाने की सोची. इसके लिए उन्होंने कई हॉलीवुड कंपनियों से बातचीत भी कि लेकिन शर्त यही थी कि पहले सिनेमाहॉल ही हालत सुधारो. अजय बिजली ने प्रिया सिनेमा की सीट, टॉयलेट, साउंड सिस्टम, लॉबी, लाइटिंग सबकुछ बदल डाला. अपने कर्मचारियों को स्मार्ट यूनिफॉर्म दिये. उनकी मेहनत रंग लाई और सिनेमाहॉल चल पड़ा. 

मल्टीप्लेक्स का कॉन्सेप्ट कहां से आया
अजय बिजली यहीं नहीं रुके. एक बार वे जब अमेरिका गए थे, तो वहां के मल्टीप्लेक्स भी गए. वो ये देखकर काफी प्रभावित हुए कि वहां के सिनेमाघर कितने आलीशान हैं. साउंड क्वालिटी, पिक्चर क्वालिटी, बैठने के लिए सीट, एयर कंडीशन की सुविधा कमाल की थी. एक साथ एक ही जगह कई फिल्में दिखाई जा रही थीं. ऐसी सुविधाएं भारत के किसी भी सिनेमाहॉल में नहीं हैं. उन्होंने ठान लिया कि वो बिल्कुल ऐसे ही मल्टीप्लेक्स मॉडल की भारत में शुरुआत करेंगे. दरअसल, उस वक्त तक भारत में सिर्फ सिंगल स्क्रीन सिनेमा ही थे. यानी एक बार में सिर्फ एक ही फिल्म चलती. अजय बिजली भारत वापस लौटे और उन्होंने मल्टीप्लेक्स मॉडल पर काम करना शुरू कर दिया, जिसके जरिये वो एक साथ कई फिल्में दिखा सकते हैं, लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये था कि वो मल्टीप्लेक्स बनाएंगे कैसे, क्योंकि उस वक्त तक भारत में ऐसी कोई कंपनी नहीं थी जो मल्टीप्लेक्स बनाती हो.

प्रिया सिनेमा से PVR का सफर 
तमाम छानबीन और रिसर्च के बाद उन्हें ऑस्ट्रेलिया की एक मीडिया कंपनी 'Village Roadshow' के बारे में पता चला. ये कंपनी दुनिया भर में थीम पार्क और मल्टीप्लेक्स बनाने का काम करती है. अजय बिजली ने बिना एक पल भी गंवाए उस कंपनी के मैनेजिंग डायरेक्टर जॉन क्रॉफर्ड से मिलने की ठानी. दोनों ने मुलाकात की. इन दोनों की मुलाकात के बीच अच्छी बात ये थी कि दोनों ही भारत में मल्टीप्लेक्स मॉडल की शुरुआत करना चाहते थे. दोनों ने हाथ मिलाया और एक नई कंपनी बनाई जिसे नाम दिया गया 'Priya Village Roadshow' यानी PVR. इस कंपनी में 60 परसेंट हिस्सेदारी अजय बिजली और 40 परसेंट Village Roadshow का था. दोनों ने मिलकर साकेत में अनुपम सिनेमा को लीज पर लिया और 1997 में चार स्क्रीन के साथ भारत का पहला मल्टीप्लेक्स PVR अनुपम लॉन्च किया. 

2003 में अजय बिजली को लगा झटका
2003 में अजय बिजली को तब झटका लगा, जब Village Roadshow ने इस करार से निकलने का फैसला किया. Village Roadshow के 40 परसेंट हिस्से को खरीदने के लिए अजय बिजली को पैसे का इंतजाम करना था. बाद में इस हिस्से को ICICI Ventures ने खरीद लिया. उसके बाद देश में PVR की तरह कई और मल्टीप्लेक्स खुल गए- Big Cinemas, Carnival और INOX. हालांकि आज की तारीख में PVR-Inox का मर्जर हो चुका है. देश भर में 9500 स्क्रीन हैं, जिसमें से PVR-Inox के पास 1500 स्क्रीन हैं और अकेले PVR के पास 73 शहरों में 872 स्क्रीन हैं. INOX के पास 675 स्क्रीन हैं.  

तो अगली बार जब आप किसी मल्टीप्लेक्स में फिल्म देखने जाएं तो ये कहानी जरूर याद रखिएगा, जो अपने आप में किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं.

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