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Weekend Special: 5000 रुपये के उधार से Airtel तक की कहानी, जानिए सुनील मित्तल का संघर्ष

सुनील मित्तल तरक्की की सीढ़ियां चढ़ रहे थे, लेकिन उनकी असली मंजिल का आना अभी बाकी था. 1992 में भारत सरकार ने पहली बार मोबाइल सेवाओं के लिए लाइसेंस बांटने का ऐलान किया.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 years ago

Weekend Special: सफलता का कोई शॉर्ट कट नहीं होता, ऐसे अनगिनत किस्से इस बात बात की गवाही देते हैं कि जीवन में कुछ कर गुजरने की शिद्दत हो तो मुश्किल कुछ भी नहीं. हम अपने वीकेंड स्पेशल में आपको ऐसी ही शख्सियतों से रूबरू कराते हैं, जिन्होंने अपनी जिद के आगे संघर्षों को बौना कर दिया. आज की कहानी है देश की सबसे बड़ी टेलीकॉम कंपनी चलाने वाले और समाजसेवी सुनील भारती मित्तल की. 

सुनील भारती मित्तल की कहानी

लक्ष्य का रास्ता कभी सीधा नहीं होता, ये तो आड़ी तिरछी पगडंडियों से होता हुआ गुजरता है. सुनील भारती मित्तल आज जिस मुकाम पर पहुंचे हैं, ये उनके अथक परिश्रम का नतीजा है. लुधियाना जिले के पंजाबी अग्रवाल परिवार में 1957 को उनका जन्म हुआ. घर परिवार से संपन्न थे. क्योंकि पिता सत पॉल मित्तल (Sat Paul Mittal) एक जाने माने राजनेता थे. दो बार लोकसभा और एक बार राज्यसभा से सांसद भी रह चुके थे. उनके दो भाई राकेश मित्तल और राजन मित्तल हैं. उनकी शुरुआती पढ़ाई लिखाई मसूरी के विनबर्ग एलन स्कूल और बाद में ग्वालियर के सिंधिया स्कूल से हुई. फिर पंजाब विश्वविद्यालय से वो ग्रेजुएट हुए. 

साइकिल के पुर्जे बेचने से शुरुआत की

एक प्रतिष्ठित राजनैतिक परिवार में पैदा हुए सुनील भारती मित्तल के लिये कुछ भी करना आसान था, लेकन उन्होंने पिता की परछाईं से बाहर निकलकर खुद के लिए अपनी मंजिल चुनी. लुधियाना शहर साइकिल और उसके पुर्जे बनाने के जाना जाता है. सुनील ने भी इसी कारोबार में उतरने का फैसला किया और लुधियाना से ही अपने बिजनेस करियर की शुरुआत कर दी. अपने इस साइकिल के कारोबार के लिए सुनील ने पिता से 20,000 रुपए लिए और अपने दोस्त साथ मिलकर साइकिल के पुर्जे बनाने का काम शुरू किया. ये काम करते हुए उनकी मुलाकात हीरो साइकिल के मालिक और संस्थापक बृज मोहन लाल मुंजाल से हुई. 

5000 रुपये उधार, बदल गई जिंदगी

सुनील भारती मित्तल अपने संघर्ष की कहानी सुनाते हुए कहते हैं कि एक वक्त जब उन्हें 5000 रुपये की जरूरत पड़ी. वो कहते हैं  कि अक्सर होता था कि हमारे बैंक अकाउंट में चेक लिए पैसे नहीं होते थे. ये वो दौर भी जब लोग आमतौर पर चेक के जरिये फंडिंग नहीं करते थे. वो आगे बताते हैं कि वो हीरो साइकिल के मालिक बृजमोहन लाल मित्तल के पास गए, उन्होंने कहा - अंकल मुझे 5000 रुपये का चेक चाहिये. उन्होंने बिल देखा और तुरंत दस्तखत करके दे दिए. लेकिन जैसे ही मैं निकल रहा थो तो अंकल ने पीछे से रोका और कहा - बेटा आदत मत डालना. ये मेरे लिए बहुत बड़ी सीख थी, इसके बाद मैंने कभी अपनी वित्तीय स्थिति को अपने ऊपर नहीं हावी होने दिया. 

नया करने की चाह में आगे बढ़ते रहे

साइकिल के पुर्जे बनाने का काम उस समय अच्छा था, लेकिन इसमें सुनील मित्तल को ग्रोथ नहीं दिखाई दी. 1979 में सुनील ने तय कर लिया कि वो कितनी भी मेहनत कर लें वो इस कारोबार को ऊंचाइयों तक नहीं पहुंचा सकते. वो कुछ ऐसा करना चाहते थे, जो भविष्य में जाकर कुछ बड़ा बने, लेकिन वो क्या था, ये अबतक नहीं मालूम था. इसलिए कुछ और करने के मकसद से वो लुधियाना को छोड़कर मुंबई चले गए. यहां पर उन्होंने जापान से जेनरेटर इंपोर्ट करके भारत में बेचना शुरू कर दिया. इस बिजनेस ने सुनील मित्तल को थोड़ी उम्मीद दी, बिजनेस काफी अच्छा चल रहा था. मगर तभी उनकी जिंदगी में एक भूचाल आया. सरकार ने जेनरेटर के इंपोर्ट पर ही प्रतिबंध लगा दिया, सिर्फ दो घरेलू कंपनियों को ही जेनरेटर की मैन्यूफैक्चरिंग का लाइसेंस दिया. इससे सुनील भारती मित्तल के व्यवसाय को तगड़ा झटका लगा. उनको ये बिजनेस भी चौपट हो गया. 

इसी उधेड़बुन में कई साल गुजर गए. सुनील भारती मित्तल कुछ ऐसा करना चाहते थे, जो कभी किसी ने किया हो. भारत में उस समय टेलीफोन एक स्टेटस सिंबल था, ज्यादातर प्रभावशाली लोगों के पास फोन होता था, वो भी नंबर को घुमाघुमाकर डायल करने वाले फोन होते थे. सुनील मित्तल ने 1986 में ताइवान से पुश बटन वाले फोन इंपोर्ट करके भारत में बेचना शुरू किया. ये भारतीयों के लिए एक गजब चीज थी. मित्तल ने बीटल नाम से पुश बटन फोन की शुरुआत की. ये बिजनेस चल पड़ा, इसके बाद उन्होने 1990 के दशक तक पुश बटन फोन के साथ फैक्स मशीन और दूसरी कई टेलीकॉम डिवाइस को बेचने का काम भी शुरू कर दिया

ऐसे पड़ी Airtel की नींव 

सुनील मित्तल तरक्की की सीढ़ियां चढ़ रहे थे, लेकिन उनकी असली मंजिल का आना अभी बाकी था. 1992 में भारत सरकार ने पहली बार मोबाइल सेवाओं के लिए लाइसेंस बांटने का ऐलान किया. सरकार की शर्त थी कि लाइसेंस उसी को मिलेगा जिसके पास टेलीकॉम सेक्टर का कुछ अनुभव हो. सुनील इस मौके को हाथ से जाने नहीं देना चाहते थे, उन्होंने फांस की कंपनी विवेंडी के साथ मिलकर दिल्ली और आस-पास के इलाकों के सेल्युलर लाइसेंस प्राप्त हासिल कर लिया. इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा. 1995 में सुनील मित्तल ने सेल्युलर सेवाओं की पेशकश के लिए भारती सेल्युलर लिमिटेड की शुरुआत की, यहीं से एयरटेल जैसे ब्रांड की नींव पड़ी. 

अपने संघर्ष के दिनों में 5000 रुपये के लिए मिली सीख को आज सुनील मित्तल ने अरबों रुपये की टेलीकॉम कंपनी में बदल दिया. वो भारत के फोर्ब्स की रईसों की लिस्ट में भी हैं. ये सुनील मित्तल की जिद ही थी, जो उन्हें हमेशा आगे बढ़ाती रही. 


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