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Weekend Special: बिग बाजार डूबा लेकिन डीमार्ट क्यों बन गया रिटेल किंग? जानिए वो 5 कारण

बिग बाजार और डीमार्ट दोनों ही रिटेल बिजनेस में हैं, लेकिन एक का बिजनेस मॉडल दूसरे के बिजनेस मॉडल से थोड़ा अलग है, और यही चीज दोनों के बीच बड़ा अंतर पैदा करती है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 years ago

कभी भारत के सैम वॉल्टन (Sam Walton) कहे जाने वाले फ्यूचर ग्रुप (Future Group) के फाउंडर किशोर बियानी (Kishore Biyani) जिन्होंने बिग बाजार के जरिये देश के कोने कोने में रिटेल स्टोर्स को पहुंचाया, कभी हर घर का सामान बिग बाजार से आता था, किशोर बियानी ने रिटेल साम्राज्य को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया, कई कंपनियों का अधिग्रहण किया.

डीमार्ट कामयाबी के घोड़े पर सवार

लेकिन बीते कुछ सालों में ऐसा क्या हुआ कि फ्यूचर ग्रुप बिकने की कगार पर आ गई जबकि दूसरी ओर राधा किशन दमानी की डीमार्ट बीते कुछ सालों में कामयाबी की नई ऊंचाइयां चढ़ने लगी. बिजनेस वही, ग्राहक वही और काम करने का तरीका भी वही, लेकिन क्यों बिग बाजार डूब गया और Avenue Supermarts यानी  डीमार्ट मार्केट कैप के हिसाब से देश की 11वीं सबसे वैल्यूएबल कंपनी बन गई. राधा किशन दमानी देश के तीसरे सबसे रईस व्यक्ति बन गए. 

आज हम समझेंगे कि बिग बाजार क्यों असफल हुई और डीमार्ट क्यों सफल हुई. आखिर डीमार्ट ने ऐसा क्या किया कि देश के दूसरे सुपरमार्ट तो मुनाफा कमाने को तरस रहे हैं लेकिन डीमार्ट पैसे छाप रहा है. देखिये किसी भी बिजनेस को सफल या असफल बनाने में कई कारक होते हैं, उनमें से एक है बिजनेस मॉडल. तो सबसे पहले इन दोनों रिटेल दिग्गजों के बिजनेस मॉडल को समझते हैं. 

बिग बाजार-डीमार्ट के बिजनेस मॉडल में क्या फर्क 
 
1. बिग बाजार और डीमार्ट दोनों ही रिटेल बिजनेस में हैं, लेकिन एक का बिजनेस मॉडल दूसरे के बिजनेस मॉडल से थोड़ा अलग है, और यही चीज दोनों के बीच बड़ा अंतर पैदा करती है. जैसे- बिग बाजार हमेशा बड़े बड़े मॉल्स में खोला जाता है, जहां का किराया बहुत ज्यादा होता है. आपकी बिक्री हो या न हो किराया तो जाना ही है. जबकि दूसरी तरफ डी मार्ट कभी भी शहर के बीचों बीच, पॉश इलाकों में या मॉल्स के अंदर अपने स्टोर्स नहीं खोलता है. डीमार्ट रेंट बेस्ड मॉडल की बजाय शहर से कुछ दूर जमीन को खरीदकर या फिर लीज पर लेकर वहां पर अपना स्टोर खोलता है. इससे हर महीने किराये की लागत बच जाती है. डीमार्ट के 80 परसेंट से ज्यादा स्टोर्स उसके खुद के हैं यानी उसने खरीदे हैं. हालांकि इसका एक नुकसान भी है, वो ये कि डीमार्ट को नया स्टोर खरीदने के लिए अपफ्रंट रकम बहुत ज्यादा होती है. यही वजह है कि साल 2002 में डीमार्ट बना था. 10 सालों तक डीमार्ट की ग्रोथ काफी कम रही, लेकिन समय के साथ इसमें तेजी आई. 

2. अगर आप बिग बाजार और डीमार्ट के स्टोर्स में गये होंगे तो आपने एक चीज जरूर नोटिस की होगी. बिग बाजार अपने स्टोर्स में बहुत तामझाम रखता है. जबकि उसके उलट डी मार्ट के स्टोर्स बिल्कुल सीधे सादे, सिर्फ सामान बेचते हैं. आप देखेंगे कि डीमार्ट के स्टोर्स में सामान बहुत सलीके से सजाकर नहीं रखे मिलेंगे, आपकी मदद करने के लिए कोई हेल्पर भी नहीं होगा, बिलिंग काउंटर्स भी साधारण तरीके से काम करते हैं और लाइटिंग या डेकोरेशन भी बहुत खास नहीं होता है. इसका नतीजा ये होता है कि डीमार्ट इन सब पर अपने बहुत सारे खर्च बचा पाता है और अपने सामानों पर ज्यादा से ज्यादा डिस्काउंट ऑफर कर पाता है. दुनिया जानती है कि भारत के प्राइस सेंसिटिव मार्केट है, इसलिए आखिर में लोगों को सामान की कीमत ही मायने रखती.

3. बिग बाजार आमतौर पर बड़े बड़े शहरों में अपने स्टोर्स खोलता है, जहां पर दूसरे विकल्प भी मौजूद होते हैं. बड़े शहर के लोगों की खरीद क्षमता भी ज्यादा होती है, इसलिये वो दूसरे विकल्पों की तरफ मुड़ जाते हैं. जबकि डीमार्ट का फोकस टियर-2 और टियर-3 शहरों की तरफ ज्यादा होता है, क्योंकि यहां पर लोगों की खरीद क्षमता कम होती है और वो इसकी रिपीट कस्टमर या लॉयल कस्टमर बन जाते हैं. छोटे शहरों में बड़े बड़े रिटेल ब्रांड्स अपना स्टोर खोलने से बचते हैं, जिससे डीमार्ट को फायदा मिलता है. 

4. एक और बेहद खास चीज है जो कि डीमार्ट के पक्ष में जाती है. आमतौर पर जब बिग बाजार जैसे सुपरस्टोर्स अपने मैन्यूफैक्चरर्स से सामान खरीदते हैं तो वो उसका पेमेंट करने में 25-30 दिन का वक्त लगाते हैं, लेकिन डीमार्ट सिर्फ 4-7 दिन में मैन्यूफैक्चरर्स को पेमेंट कर देता है. जल्दी पेमेंट करने की वजह से मैन्यूफैक्चरर्स से डीमार्ट को कैश डिस्काउंट मिलता है. जिससे उसकी कॉस्ट कम हो जाती है. 

5. बिग बाजार में प्रोडक्ट्स की रेंज काफी ज्यादा होती है, लेकिन उनमें क्षेत्रीय उत्पादों नहीं के बराबर होते हैं. जैसे - गुजरात में वहां के फूड प्रोडक्ट्स, महाराष्ट्र में वहां की क्षेत्रीय चीजें मिलती है. जबकि बिग बाजार में वो ही प्रोडक्ट्स मिलते हैं जिसकी खपत आमतौर पर देश भर में होती है. दूसरी तरफ बिग बाजार में फल, सब्जियां और दूसरी तमाम खाने पीने की चीजें रखते हैं जिनकी एक तय शेल्फ लाइफ होती है, वो वक्त के साथ खराब हो जाती है, जबकि डीमार्ट ने ऐसा नहीं किया. जिससे उसकी लागत में कमी आई. 

अंत में एक और बात, जो कि बहुत मायने रखती है, राधा किशन दमानी एक निवेशक भी हैं, वो शेयर बाजार की समझ रखते हैं, इसलिए उन्हें पता है कि किसी सफल कंपनी में क्या होना चाहिये. इसलिये वो सभी जरूरी चीजें कर पाते हैं. इसीलिये जहां दूसरे सुपरमार्केट्स मुनाफा नहीं कमा पा रहे, एक निवेशक के तौर पर डीमार्ट के प्रमोटर्स जमकर मुनाफा कमा रहे हैं. 


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