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Air Pollution से निपटने के लिए डेटा-आधारित नीतियों पर काम करने की जरूरत

डेटा और प्रौद्योगिकी का उपयोग करते हुए नीतियों को डिजाइन और लागू करके, भारत साफ हवा प्राप्त करने और सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठा सकता है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 year ago

हवा, वह तत्व जो जीवन को बनाए रखता है और ये प्रकृति का ऐसा संसाधन है, जो सभी के लिए  है, जो सामाजिक-आर्थिक बाधाओं और सीमाओं से परे है, फिर भी इसे वह समानता नहीं दी जाती, जिसकी यह हकदार है. हम एक शहर या देश के विभिन्न हिस्सों में रहते हैं, लेकिन वायु प्रदूषण हम सभी को विभिन्न स्तरों पर प्रभावित करता है, चाहे हमारा सामाजिक दर्जा कुछ भी हो. यह चुनौती विशेष रूप से दिल्ली जैसे शहरों में स्पष्ट रूप से देखी जाती है, जो अक्सर दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों की सूची में शामिल हो जाता है और जहां वायु गुणवत्ता सूचकांक अक्सर स्वीकार्य सीमाओं को पार कर जाता है. इसका परिणाम एक सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट के रूप में सामने आता है, जो लाखों लोगों को प्रतिदिन प्रभावित करता है. इसका एक ताजा उदाहरण हाल की दिल्ली हाफ मैराथन के दौरान देखा गया, जहां कई प्रतिभागियों को सांस लेने में कठिनाई का सामना करना पड़ा, जो यह दर्शाता है कि खराब वायु गुणवत्ता के कारण नियमित शारीरिक गतिविधियां भी चुनौतीपूर्ण बन जाती हैं.

सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट
वायु प्रदूषण वैश्विक स्तर पर शीघ्र मृत्यु का एक प्रमुख कारण है. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, प्रदूषित हवा के संपर्क में आने से हर साल 7 मिलियन से अधिक शीघ्र मौतें होती हैं, जिनका सबसे अधिक प्रभाव निम्न और मध्य-आय वाले देशों पर पड़ता है. वायुजनित और हृदयवाहिकीय बीमारियाँ, कैंसर, और मानसिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव इन प्रदूषकों जैसे कि कण पदार्थ (PM2.5), नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (NO2), सल्फर डाइऑक्साइड (SO2), और ग्राउंड-लेवल ओजोन के कारण होते हैं. भारत के आंकड़े इस कड़ी वास्तविकता को दर्शाते हैं: https://www.bmj.com/content/383/bmj-2023-077784 के अनुसार, वायु प्रदूषण भारत में हर साल 20 लाख से अधिक मौतों का कारण बनता है. क्रोनिक श्वसन और हृदयविकार संबंधी विकार बढ़ते जा रहे हैं, जिससे स्वास्थ्य प्रणाली पर अरबों डॉलर का खर्च हो रहा है.

छिपी हुई लागत की गणना
वायु प्रदूषण केवल स्वास्थ्य पर ही नहीं, बल्कि आर्थिक दृष्टिकोण से भी गहरा प्रभाव डालता है. ग्रीनपीस और ऊर्जा और स्वच्छ हवा पर शोध केंद्र (CREA) द्वारा 2021 में किए गए एक विश्लेषण के अनुसार, वायु प्रदूषण भारत को हर साल लगभग $36.8 बिलियन का खर्च कराता है, जो उसके GDP का 1.36 प्रतिशत है. इसके कारणों में कर्मचारियों द्वारा लिए गए बीमार दिनों, स्वास्थ्य खर्च में वृद्धि, और कृषि उत्पादकता में गिरावट शामिल है. Environmental Research पत्रिका में प्रकाशित एक रिसर्च के अनुसार वायु प्रदूषण में मामूली गिरावट भी अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक प्रभाव डाल सकती है. उदाहरण के लिए अगर दिल्ली में PM2.5 स्तर को 10 µg/m³ तक कम किया जाए, तो यह चिकित्सा खर्चों में लाखों डॉलर की बचत कर सकता है और श्रमिकों की उत्पादकता में 7 प्रतिशत की वृद्धि कर सकता है.

वर्तमान प्रतिक्रियाएं और उपाय
भारत ने वायु प्रदूषण से निपटने के लिए महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं, जिनमें वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM), ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान (GRAP), और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) की पहलें शामिल हैं. ये फ्रेमवर्क खासकर राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) में प्रदूषण को कम करने के लिए संरचित प्रतिक्रियाओं का उद्देश्य रखते हैं, उदाहरण के लिए, जब वायु गुणवत्ता सूचकांक अत्यधिक खराब होता है, तो GRAP औद्योगिक गतिविधियों को प्रतिबंधित करता है और डीजल जनरेटर पर प्रतिबंध लगाता है, जोकि प्रदूषण के स्तर के आधार पर कदम उठाता है. 2019 में शुरू किए गए भारत के राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम के तहत 2024 तक 131 शहरों में कण पदार्थ (PM) में 20-30 प्रतिशत की कमी लाने का लक्ष्य रखा गया है. इसके अलावा कड़े उत्सर्जन मानक लागू और विद्युत वाहनों को बढ़ावा देता है और 1,400 निगरानी स्टेशनों के नेटवर्क के माध्यम से वास्तविक समय डेटा के आधार पर हस्तक्षेप करता है. इसके अतिरिक्त, अत्यधिक प्रदूषण के दौरों में आपातकालीन उपायों का उपयोग किया जाता है, जैसे कि फसल अवशेषों के जलने पर प्रतिबंध और जुर्माना, और दिल्ली का विषम-सम कार प्रणाली, जो अस्थायी रूप से सड़क पर गाड़ियों की संख्या को सीमित करता है. हालांकि, ये उपाय अक्सर सीमित समय तक ही प्रभावी होते हैं और दीर्घकालिक प्रभाव के लिए निरंतर कार्यान्वयन की आवश्यकता होती है. बिना व्यापक और डेटा-आधारित समाधानों के ये उपाय केवल अस्थायी सुधार होते हैं, जबकि वास्तविक समाधान की आवश्यकता होती है.

स्वच्छ भविष्य के लिए डेटा-आधारित नीतियां
1. वायु प्रदूषण को संबोधित करने के लिए हमें शॉर्ट-टर्म समाधानों से डेटा-आधारित, स्थायी नीतियों की ओर बढ़ने की आवश्यकता है. डेटा-आधारित नीतियों को अपनाकर, हम प्रदूषण के स्रोतों, कारणों, और प्रभावों को बेहतर समझ सकते हैं और हस्तक्षेपों को इस आधार पर अनुकूलित कर सकते हैं.

2. दिल्ली में सेंसर नेटवर्क का उपयोग यह दिखाता है कि कैसे वास्तविक समय निगरानी और पूर्वानुमान विश्लेषण अधिकारियों को प्रदूषण के हॉटस्पॉट्स की पहचान करने और वायु गुणवत्ता बिगड़ने से पहले कार्रवाई करने में सक्षम बनाता है. भविष्यवाणी मॉडल के द्वारा उच्च प्रदूषण जोखिम वाले समय की भविष्यवाणी की जा सकती है, जिससे फसल अवशेष जलाने जैसी निवारक कार्रवाइयाँ की जा सकती हैं.

3. स्थानीयकृत डेटा भी अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह शहरों को विशिष्ट नियंत्रण लागू करने की अनुमति देता है, जैसे कि उत्सर्जन की सीमा और यातायात प्रतिबंध, जो प्रदूषण-प्रधान क्षेत्रों के लिए अनुकूलित होते हैं. यूरोप के कुछ शहरों, जैसे पेरिस और एम्सटर्डम, ने इस सिद्धांत पर आधारित "लो एमिशन जोन" अपनाए हैं, जो उच्च उत्सर्जन वाहनों के लिए प्रवेश प्रतिबंधित करते हैं.

4. सरकारें पर्यावरणीय संकेतकों को सार्वजनिक स्वास्थ्य डेटा के साथ जोड़कर नीतियों की प्रभावशीलता का मूल्यांकन कर सकती हैं और आवश्यक समायोजन कर सकती हैं. "समीयर" जैसे ऐप्स, जो केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा बनाए गए हैं, उपयोगकर्ताओं को स्वास्थ्य सलाह और वास्तविक समय में वायु गुणवत्ता स्तरों को ट्रैक करने की सुविधा प्रदान करते हैं. इन ऐप्स का डेटा सरकार को सामुदायिक स्वास्थ्य के पैटर्न के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान कर सकता है, जिससे वे संसाधनों और प्रयासों को सबसे अधिक आवश्यकता वाले क्षेत्रों में केंद्रित कर सकते हैं.

5. वायु प्रदूषण से लड़ना एक जटिल लेकिन साध्य लक्ष्य है। डेटा-आधारित नीतियाँ बदलाव की नींव प्रदान कर सकती हैं, जहाँ पारंपरिक दृष्टिकोणों में अक्सर स्थायी परिणामों के लिए आवश्यक सटीकता और लचीलापन की कमी होती है. एआई में हुए विकास जैसे आर्टिफिशियल न्यूरल नेटवर्क्स (ANN) अब वास्तविक समय वायु गुणवत्ता निगरानी, पूर्वानुमान मॉडलिंग और यातायात और प्रदूषक संकेंद्रण प्रणालियों से डेटा एकत्र करने में सक्षम बनाते हैं। एआई और बिग डेटा का एकीकरण वायु गुणवत्ता प्रबंधन को भी बदल रहा है, जिससे नीति निर्धारकों को स्वस्थ शहरों के लिए सक्रिय और स्थायी रूप से कार्य करने में मदद मिल रही है. डेटा और प्रौद्योगिकी का उपयोग करते हुए नीतियाँ डिजाइन और लागू करके, भारत स्वच्छ हवा प्राप्त करने और सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठा सकता है.

लेखिका-मुस्कान गुप्ता, छात्रा 11वीं कक्षा, स्पेप बॉय स्टेप  स्कूल नोएडा व तान्या गुप्ता, पॉलिसी एसोसिएट, डिजिटल इंडिया फाउंडेशन


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