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क्‍या वास्‍तव में कुत्‍तों के काटने से हुई 2 बच्‍चों की मौत या बेजुबान पर मढ़ दिया आरोप!

इस घटना की एक स्‍वयंसेवी संस्‍था ने जांच की है और उसके बाद उसने जो कुछ अपनी जांच में पाया वो सभी को सोचने पर मजबूर कर रही है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 years ago

  दिल्‍ली के रंगपुरी से पिछले दिनों जो खबर आई उसने सभी को सोचने पर मजबूर कर दिया. लेकिन उचित पुलिस और चिकित्सा जांच के बिना, वसंत कुंज के पास एक बस्ती में दो युवा लड़कों की दुखद मौत के संबंध में कोई भी बयान जारी करना गैर-जिम्मेदाराना है. यह गुरुग्राम के मामले की याद दिलाता है जहां एक छात्र को दूसरे छात्र ने मार डाला और उसके बाद पुलिस ने एक निर्दोष बस कंडक्टर पर दोष लगाया. ऐसा पशु संरक्षण का कार्य करने वाली संस्थी पीपुल फॉर एनिमल्स का कहना है।

 PFA ने की मामले की जांच  

पीएफए (PFA) की ओर से मिली जानकारी के मुताबकि उसके स्वयंसेवक रंगपुरी स्थल पर गए थे, पड़ोसियों, परिवार और रिश्तेदारों से मिले और अपनी रिपोर्ट दर्ज की. उसके बाद वो निम्नलिखित निष्कर्ष पर पहुंचे हैं.  

 यहां दो अलग-अलग तारीखों में हुई दो अलग-अलग घटनाओं में 5 और 7 साल के दो लड़के (भाई) मृत पाए गए हैं. पहली घटना शुक्रवार 10 मार्च को हुई जब 7 साल के लड़के को सुबह उसकी मौसी के यहां भेज दिया गया. दोपहर में मां ने फोन किया तो पाया कि बच्चा नहीं पहुंचा है. परिजन और पड़ोसी देखने गए. इसके बाद उन्होंने पुलिस को फोन किया, जिसने बाद में शव को जंगल में कहीं पाया. अगर लड़का सीधे मौसी के घर जा रहा होता तो कोई कारण नहीं था कि वह उस इलाके में क्यों जाता. 

शरीर पर गर्दन के पीछे कट के अलावा कोई निशान नहीं था. 

पीफएए के अनुसार उस दिन और अगले (शुक्रवार और शनिवार) को उनकी मौत में किसी कुत्ते के शामिल होने की बात बिल्कुल नहीं थी. पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया और धारा 302 के तहत हत्या का मामला दर्ज किया. बस्ती में एक छोटे बच्चे की रहस्यमय मौत के इस मामले में किसी भी मीडिया ने कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई. घटना का कोई तत्काल कवरेज नहीं था. दूसरी घटना रविवार 12 मार्च को हुई. बच्चा अपने मौसेरे भाई के साथ शौच के लिए गया था. चचेरे भाई ने कहा कि वह लड़के को अपने घर से सिर्फ 30 मीटर की दूरी पर दीवार के पीछे ले गया और हर कोई आसपास था. सुबह का समय था. किसी कारण से, चचेरा भाई आगे बढ़ गया और उसने कहा कि उसने देखा कि बच्चा उठकर दूसरी दिशा में वापस जाने के लिए एक अलग रास्ता ले रहा है. 

  जब चचेरा भाई लौटा तो वह लड़के को वापस नहीं लाया. कुछ देर बाद उसने मां से लड़के के बारे में पूछने का दावा किया. फिर उसने जाकर देखा तो वह लड़का घायल और अचेत अवस्था में यहीं पड़ा हुआ था. उसके मुताबिक बच्चे के पास कुछ कुत्ते बैठे थे. कई निवासियों ने कहा है कि किसी ने किसी कुत्ते को बच्चे को काटते हुए नहीं देखा. बस्ती वालों ने स्पष्ट रूप से कहा कि उन्होंने कभी किसी कुत्ते को बच्चे को काटते नहीं देखा. न कोई कुत्ता काटता नजर आया और न ही किसी के भौंकने या चीखने की आवाज सुनाई दी. केवल चचेरे भाई के इस शब्द के आधार पर कि आस-पास कुत्ते थे, यह कहा जाने लगा कि यह कुत्ते ही होंगे. बिना किसी चश्मदीद के, बिना किसी सबूत के और बिना पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट का इंतजार किए, कुत्तों को अचानक इस घटना के लिए ही नहीं बल्कि अब शुक्रवार के पिछले वाले के लिए भी दोषी ठहराया जाने लगा. दोनों उदाहरणों को विचित्र रूप से एक साथ जोड़ दिया गया और कुत्तों को दोनों के लिए दोषी ठहराया गया. 

सबूतों के अभाव में 

 पीएफए की जांच कहती है कि कोई सबूत कुत्ते के हमले की पुष्टि नहीं करता है. यहां तक कि काटने के निशान, यदि मौजूद हैं, को मृत्यु के कारण का कोई संकेत नहीं माना जा सकता है क्योंकि मृत्यु के बाद उनके होने की समान संभावना है. इस बात का क्लीनिकल फोरेंसिक निर्धारण होना चाहिए कि कोई निशान मृत्यु से पहले के हैं या बाद के. 

 यहाँ मरने से पहले और मरने के बाद चिह्नों के बीच अंतर बताने के तरीके दिए गए हैं-    

1. मौत के बाद के घावों से कम खून बहेगा 

2. रक्त का रंग हल्का और पीला होगा—उज्ज्वल लाल नहीं। 

3. घावों का वितरण. पूर्व-मृत्यु के मामले में, घाव मुख्य रूप से सिर और गर्दन के क्षेत्र में होंगे और हाथ गंभीर रूप से घायल होंगे क्योंकि वे स्वाभाविक रूप से उन क्षेत्रों की कोशिश करने और उन्हें ढालने के लिए उपयोग किए जाएंगे. मौत के बाद हाथ-पांव पर घाव ज्यादा होंगे। 

4. मृत्यु से पहले के घाव वह दिखाएंगे जो चिकित्सा शर्तों में 'Vital force' के रूप में जाना जाता है जिसका मतलब है कि घायल क्षेत्र के चारों ओर लाली और सूजन होती है क्योंकि कोशिकाएं इसे बचाने के लिए दौड़ती हैं. मृत्यु के बाद के घावों में ऐसी कोई बात नहीं होती है. इसका अंतर एक प्रशिक्षित आंख ही बता सकती है.  पुलिस सतही तौर पर अंतर नहीं बता सकती. इसकी विशेषज्ञ जांच की जरूरत है. 

क्या कहते हैं स्थानीय चश्मदीद 

पीएफए का कहना है कि शवों को देखने वाले बस्ती के सदस्यों का कहना है कि चोटें चाकू के घाव की तरह लग रही थीं और ऐसा लगता है कि यह हत्या थी, शायद अंग चोरी का मामला भी. पारिवारिक दुश्मनी का मामला भी हो सकता है क्योंकि दो भाइयों को अलग-अलग निशाना बनाया गया था. संबंधित परिवार कुछ माह पूर्व ही क्षेत्र में आया है. मानसिक रूप से विक्षिप्त बताया जा रहा है कि पिता गांव में ही रहता है. समुदाय में उनके अन्य रिश्तेदार होने के कारण मां और उनके तीन बेटे यहां आ गए थे. 

अपने तीसरे बच्चे के बचाव के लिए, परिवार ने वास्तव में उसे दूर भेज दिया है. यह स्पष्ट है कि वे भी सोचते हैं कि यह उनके बच्चे हैं जिन्हें अलग किया जा रहा है- इसलिए वे भी यह नहीं मानते कि यह कुत्ते थे जिन्होंने बेतरतीब ढंग से या तो उनके दोनों बच्चों को नुकसान पहुँचाया.  

दोनों घटनाओं में किसी ने कुत्तों को काटते नहीं देखा. दूसरा बच्चा उस जगह के बहुत करीब पाया गया जहां रविवार की सुबह बहुत से लोग थे. कोई चीखने, चिल्लाने या भौंकने की आवाज नहीं सुनाई दी. शव देखने वाले का कहना है कि बच्चे के आसपास कुत्ते बैठे थे लेकिन उसने किसी कुत्ते को काटते नहीं देखा. 

  घटना को कैसे गलत बताया जा रहा है  

लेकिन पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट जारी होने से पहले ही मीडिया का एक वर्ग कुत्तों को दोष देकर सुर्खियां बटोर रहा है और नगर पालिका पहले से ही आ गई है और 'निरीक्षण' के लिए स्वस्थ बंध्याकृत अनुकूल कुत्तों को उठा लिया है. ऐसा लगता है कि कुत्ते हर अनसुलझे अपराध के लिए सुविधाजनक बलि का बकरा बनते जा रहे हैं. किसी अन्य उदाहरण में आधिकारिक निकाय इतनी तेजी से कार्रवाई नहीं करते हैं, ऐसा पीएफए के अधिकारियों का कहना है। 

बलात्कार और हत्या, जाँच वर्षों तक धूल फांकती है. सभी मामलों में, कोई भी निष्कर्ष निकालने या प्रसारित करने से पहले साक्ष्य एकत्र किए जाते हैं और उनका विरोध किया जाता है. लेकिन यहां, जहां कोई चश्मदीद गवाह नहीं है और कोई सबूत नहीं है, कुत्ते एक सुविधाजनक लक्ष्य बनाते हैं. असली कातिल छूट जाएंगे, पुलिस पर अब एक और जुर्म का बोझ नहीं पड़ेगा, प्रेस के पास बेचने के लिए एक और सनसनीखेज कहानी होगी, कुत्तों को हटाने के लिए नगरपालिका को बहाना मिल जाएगा, और नफरत करने वालों को फिर से पीटा जाएगा , स्थानांतरित करना, अत्याचार करना और निर्दोष जानवरों को मारना.  

क्‍या है इस घटना का निष्कर्ष 

पीएफए अपने निष्कर्ष में कहता है कि यह उच्च समय है जब हम इस विच हंट को बंद कर दें और कारण और तर्क के कुछ अंश पर लौट आएं. जिन कुत्तों की नसबंदी की जाती है, अच्छी तरह से खिलाया जाता है, बस्ती के निवासियों द्वारा देखभाल और प्यार किया जाता है, वे सिर्फ एक दिन उठकर किसी को भी नुकसान नहीं पहुंचाते हैं, अकेले उन बच्चों को छोड़ दें जिन्हें वे जानते हैं और प्यार करते हैं. 

कुत्ते भले ही खुद के लिए बोलने में सक्षम न हों लेकिन उनकी प्रकृति के बारे में जाना जाता है और उनकी प्रतिक्रियाओं का अनुमान लगाया जा सकता है. इस मामले की परिस्थितियाँ उस सिद्धांत से मेल नहीं खातीं जिसे बनाया जा रहा है. कुत्तों को कुछ ऐसा कहना गलत और अनुचित है जिसे किसी ने नहीं देखा और समर्थन करने के लिए कोई सबूत नहीं है. गलत निष्कर्ष पर पहुंचना किसी के लिए भी गलत है. खासकर मीडिया. कृपया अफवाह और फेक न्यूज न फैलाएं. एक उचित जांच का आह्वान करें और आइए हम सभी इस भयानक त्रासदी के पीछे की सच्चाई जानें. 

  मीडिया का गैरजिम्मेदाराना रुख
पीएफए की ट्रस्ट्री अंबिका शुक्ला ने बिजनेसवर्ल्ड हिंदी से बात करते हुए कहा कि जिस तरह से इस खबर को पेश किया गया है, वो मीडिया की गैरजिम्मेदार रिपोर्टिंग को दर्शाता है। न को पुलिस ने कुत्तों पर कोई आरोप लगाया और न ही किसी और ने, पर मीडिया जो एक लड़के की मौत पर तो चुप थी, पर जैसी ही दूसरे लड़के की मौत हुई, मीडिया ने अपनी टीआरपी के चक्कर में जबर्दस्ती कुत्तों को मौत का जिम्मेदार बता दिया. मीडिया के एकतरफा कहानी का असर ये होता है कि समाज में कुत्तें के प्रति अनचाहा डर पैदा हो जाता है.  ऐसे में ये समस्या और बढ़ जाती है, लोग छड़ी या डंडे के साथ घर से निकलने लगते हैं और कुत्तों की ओर इन्हें दिखाते है, ऐसे में कुत्ते भी अपने सेल्फ डिफेंस के चलते रिएक्ट करते हैं। 

शुक्ला ने कहा कि हम शायद ये भूल गए हैं कि ये कुत्ते मनुष्य के सबसे वफादार साथी होते हैं।अभी हाल ही में टर्की में आए भूकंप में इन कुत्तों की मदद से कितना डेडबॉडी और घायल लोगों को ढूंढा जा सका था. वहां तो इमाम ने कुत्ते का पैर भी चूमा था.

पर मीडिया के एक प्रोग्राम में तो मैंने इन कुत्तों के बारे में आदमखोर, हैवान, आतकं जैसे शब्द सुने। वैसे कई बार जब हमने मीडिया को कुत्तों की मौत या उनसे संबंधित स्टोरी बताई तो मीडिया कहती है कि ये हमारे लिए खबर नहीं.  हिंसा चाहे इंसान के प्रति हो या जानवर के प्रति,, पूरे समाज को कमजोर करती है। इसलिए हम सबको  मिलकर एक अच्छी और दयालु दुनिया बनानी चाहिए.

 


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