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छठ पूजा की महिमा की गूंज 54 देशों में पहुंची, IPS की पहल पर फ्रेंच भाषा में हुआ प्रसार
आस्था के लोक महापर्व और छठी मैया के बारे में पहले केवल बिहार और पूर्वांचल के लोग ही जानते थे. लेकिन अब हाल के वर्षों में इसका प्रचार-प्रसार भारत के विभिन्न राज्यों में हो गया है.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 years ago
नई दिल्लीः आस्था के लोक महापर्व और छठी मैया के बारे में पहले केवल बिहार और पूर्वांचल के लोग ही जानते थे. लेकिन अब हाल के वर्षों में इसका प्रचार-प्रसार भारत के विभिन्न राज्यों में हो गया है. इतना ही नहीं देश के बाहर विदेशों में भी छठ पर्व की गूंज देखने को मिली है. खासतौर पर उन देशों में जहां फ्रेंच भाषा बोली और समझी जाती है. इसमें सबसे बड़ा योगदान बिहार कैडर के एक आईपीएस अधिकारी डॉ. कुमार आशीष का है, जिन्होंने 2006-2007 में 9000 किमी दूर फ्रांस में इसकी नींव रखी थी.
15 साल पहले गए थे स्टडी टूर पर
बिहार के जमुई जिला निवासी आईपीएस ऑफिसर डॉ कुमार आशीष के अनुसार 15 साल पहले जब वो फ्रांस में स्टडी टूर पर गए थे, तब वहां एक संगोष्ठी में कुछ फ्रेंच लोगों ने उनसे बिहार के बारे में कुछ रोचक और अनूठा बताने को कहा तो उन्होंने बिहार के महापर्व छठ के बारे में विस्तार से उनलोगों को समझाया. फ्रेंच लोग इससे काफी प्रभावित हुए और उन्होंने कहा कि इस विषय पर फ्रांस के साथ फ्रेंच बोलने-समझने वाले अन्य 54 देशों तक भी इस पर्व की महत्ता और पावन संदेश पहुंचाना चाहिए.
स्वदेश लौटने के बाद आशीष ने इस पर्व के बारे में और गहन अध्ययन एवं बारीकी से शोध कर छठ पर्व को पूर्णत: परिभाषित करनेवाला एक लेख "Chhath Pouja: l'adoration du Dieu Soleil" लिखा जो कि भारत सरकार के अंग ”भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद् दिल्ली” के द्वारा फ्रेंच भाषा में "rencontre avec l'Inde" नामक किताब में वर्ष 2013 में प्रकाशित हुई.
सूर्य की उपासना का चार दिनी पर्व
इस लेख में आशीष ने छठ पर्व के सभी पहलुओं का बारीकी से विश्लेषण कर फ्रांसीसी भाषा के लोगों के लिए इस महापर्व की जटिलताओं को समझने का एक नया आयाम दिया है. शुरुआत में वे बताते हैं कि छठ मूलत: सूर्य भगवान् की उपासना का पर्व है. चार दिनों तक चलनेवाले इस पर्व में धार्मिक, सामाजिक, शारीरिक, मानसिक एवं आचारिक-व्यावहरिक कठोर शुद्धता रखी जाती है.
समय के साथ वैश्विक हो गया है पर्व
सूर्योपासना का यह अनुपम लोकपर्व मुख्य रूप से पूर्वी भारत के बिहार, झारखण्ड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों में मनाया जाता है. आजकल इसका स्वरुप वैश्विक हो चला है, मुंबई, दिल्ली, भोपाल, बेंगलुरु, मॉरिशस, अमेरिका, कनाडा समेत कई स्थानों से इस पावन पर्व को मनाये जाने की सूचना विभिन्न सोशल मीडिया के माध्यमों से होती रहती है. प्रायः हिन्दुओं द्वारा मनाये जाने वाले इस पर्व को इस्लाम सहित अन्य धर्मावलम्बी भी मनाते देखे गये हैं. धीरे-धीरे यह त्योहार प्रवासी भारतीयों के साथ-साथ विश्वभर में प्रचलित हो गया है.
इनको है समर्पित
छठ पूजा सूर्य और उनकी बहन छठी मइया को समर्पित है ताकि उन्हें पृथ्वी पर जीवन की देवतायों को बहाल करने के लिए धन्यवाद और कुछ शुभकामनाएं देने का अनुरोध किया जाए. प्रारम्भ में छठ में कोई मूर्तिपूजा शामिल नहीं थी, कालांतर में सूर्यदेव तथा छठी मैय्या की मूर्तियों का प्रचलन भी शुरू हो चुका है.
चार दिवसीय पर्व की नहाय खाय से होती है शुरुआत
छठ पूजा चार दिवसीय उत्सव है. इसकी शुरुआत कार्तिक शुक्ल चतुर्थी को तथा समाप्ति कार्तिक शुक्ल सप्तमी को होती है. इस दौरान व्रतधारी लगातार 36 घंटे का व्रत रखते हैं. इस दौरान वे पानी भी ग्रहण नहीं करते. आइये इसके विभिन्न चरणों को जानते हैं:
नहाय खाय
पहला दिन कार्तिक शुक्ल चतुर्थी ‘नहाय-खाय’ के रूप में मनाया जाता है. सबसे पहले घर की सफाई कर उसे पवित्र किया जाता है. इसके पश्चात छठव्रती स्नान कर पवित्र तरीके से बने शुद्ध शाकाहारी भोजन ग्रहण कर व्रत की शुरुआत करते हैं. घर के सभी सदस्य व्रति के भोजनोपरांत ही भोजन ग्रहण करते हैं. भोजन के रूप में कद्दू-दाल और चावल ग्रहण किया जाता है. यह दाल चने की होती है. भोजन बनाने के लिए प्राय: सेंधा नमक और अन्य सात्विक चीजों का प्रयोग किया जाता है.
लोहंडा और खरना
दूसरे दिन कार्तिक शुक्ल पंचमी को व्रतधारी दिनभर का उपवास रखने के बाद शाम को भोजन करते हैं. इसे ‘खरना’ कहा जाता है. खरना का प्रसाद लेने के लिए आस-पास के सभी लोगों को निमंत्रित किया जाता है. प्रसाद के रूप में गन्ने के रस में बने हुए चावल की खीर के साथ दूध, चावल का पिट्ठा और घी चुपड़ी रोटी बनाई जाती है. इसमें नमक या चीनी का उपयोग नहीं किया जाता है. इस दौरान पूरे घर की स्वच्छता का विशेष ध्यान रखा जाता है. इस भोजन के उपरान्त व्रती का 36 घंटों का निर्जला उपवास शुरू हो जाता है.
संध्या अर्घ्य
अनुष्ठान के तीसरे दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को दिन में छठ का प्रसाद बनाया जाता है. प्रसाद के रूप में ठेकुआ, पीसे हुए चावल के लड़ुआ, कचमनिया इत्यादि बनाते हैं. इसके अलावा चढ़ावा के रूप में लाया गया चीनी का बना हुआ सांचा और विभिन्न प्रकार के स्थानीय फल भी छठ प्रसाद के रूप में शामिल होता है. शाम को पूरी तैयारी और व्यवस्था कर बांस की टोकरी में अर्घ्य का सूप सजाया जाता है और व्रती के साथ परिवार तथा पड़ोस के सारे लोग अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देने घाट की ओर चल पड़ते हैं. सभी छठव्रती एक नियत तालाब या नदी किनारे इकट्ठा होकर सामूहिक रूप से अर्घ्य दान संपन्न करते हैं. सूर्य को जल और दूध का अर्घ्य दिया जाता है तथा छठी मैया की प्रसाद भरे सूप से पूजा की जाती है, इस दौरान कुछ घंटे के लिए मेले जैसा दृश्य बन जाता है.
प्रात:कालीन अर्घ्य
चौथे दिन कार्तिक शुक्ल सप्तमी की सुबह उदियमान सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है. व्रती वहीं पुनः इकट्ठा होते हैं जहां उन्होंने पूर्व संध्या को अर्घ्य दिया था. पुनः पिछले शाम की प्रक्रिया की पुनरावृत्ति होती है। सभी व्रती तथा श्रद्धालु घर वापस आते हैं, व्रती घर वापस आकर गांव के पीपल के पेड़ जिसको ब्रह्म बाबा कहते हैं वहां जाकर पूजा करते हैं. पूजा के पश्चात् व्रती कच्चे दूध का शरबत पीकर तथा थोड़ा प्रसाद खाकर व्रत पूर्ण करते हैं जिसे पारण या परना कहते हैं.
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