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वो सर्दियों का लुत्फ अब आता ही कहां है, अब जाड़ा पड़ता ही कहां है 

दीवाली के 7-10 दिन पहले सारे गर्म कपड़ों को अलमारी-संदूक से बाहर निकाल कर धूप लगाने का काम शुरू हो जाता था.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 years ago

  • अजय गुप्ता, फाउंडर 'बचपन प्ले स्कूल' और 'अकादमिक हाइट्स पब्लिक स्कूल'

जाड़े ने मेरी बालकनी पर दस्तक दे दी है, ये मुझे कैसे पता चला? हां मैंने दिसंबर के आखिरी सप्ताह को Calender में देखकर ये तय कर लिया कि चलो आज बालकनी में बैठा जाए, अब तो जाड़ा आ ही गया होगा. मुझे अच्छे से याद है जब मैं 6-7 साल का था तो मेरे दादा जी मुझे अपनी रजाई में दुपका लेते थे, कभी प्यार से, कभी कहानी सुना कर, कभी घुड़की देकर लेकिन सारी-सारी रात मुझे रजाई से बहार नहीं निकलने देते थे. सिर पर बादाम रोगन की मालिश और गले में देसी घी से तो जैसे जाड़ा भी डरता था. 

...वो अलमारी से गर्म कपड़े निकालना
दिवाली के 7-10 दिन पहले सारे गर्म कपड़ों को डाट से, अलमारी से संदूक से और कोलकी से बाहर निकाल कर धूप लगाने का काम शुरू हो जाता था.  पता नहीं चलता था कि मेरे गर्म कपड़े कैसे हर साल छोटे हो जाते थे. तब के गर्म कपड़ों पर उंगलिया फहराना जैसे अंदर तक गुदगुदा देता था.  अब जाड़ा पड़ता ही कहां है, मेरी तरह शायद अब जाड़ा भी बूढ़ा हो गया है. दिवाली से लेकर लगभग होली तक गरम कपड़ों की जरूरत पड़ती थी, अलमारी में गर्म कपड़ों को रखने की जगह को लेकर हम भाई बहनो में तो नोकझोंक भी हो जाती थी. घर में सभी के पास अपनी - अपनी शॉल होती थी. जिसे बिस्तर पर तकिए के नीचे रख कर सोना जैसे कम्पल्शन थी, लेकिन अब तो सर्दी/जाड़े की शादियों में ही जैसे उन शॉलों को इस्तेमाल करने का चलन रह गया है, ठीक भी है अब पहले जैसा जाड़ा पड़ता भी कहां है.

हलवे और बाजरे की खिचड़ी का स्वाद
जाड़े में मिलने वाले हलवे और बाजरे की खिचड़ी को याद करके इस उम्र में भी कभी-कभी मुंह में पानी आ जाता है. जवानी तक भी जाड़े की धूप, मुंगफली, गुड़ की पट्टी और संतरों की महक को समझ नहीं पाया था, लेकिन अब तो जैसे सबके बिना जाड़े का कोई मतलब ही नहीं है. 
गर्म चाय के कांच के गिलास को चारों ओर से हाथों में पकड़कर उसकी गर्माहट महसूस करने की कोशिश कर रहा हूं, जबकि पहले इसी तरह से एक चाय की प्याली से गालों की और आंखों की जैसे पूरी सिकाई कर लिया करता था.

ऐसे भाग जाता था जाड़ा
गर्म पानी की बाल्टी में थोड़ा सा नमक और 2 टोबे सरसों का तेल डालकर पैरो की सिकाई का मतलब नहीं पता था, लेकिन कसम से मजा बहुत आता था. दादी भी कहती थी इससे सारा जाड़ा भाग जाएगा और हां भाग भी जाता था. अब तो बच्चों ने मेरे बिस्तर पर मेरी चादर के नीचे Electric Hot Blanket लगा दिया है, लेकिन पिछले साल तो मुझे उसको एक बार भी चलाना नहीं पड़ा या यूं भी कह सकते है कि अब जाड़ा पड़ता ही कहां है.

दिसंबर और गर्म कपड़े
मुझे हर जाड़े में उस एक ऋषि कपूर वाले स्वेटर की याद आ ही जाती है जो मुझे मेरी पत्नी ने हमारी पहली वर्षगांठ पर दिया था. मैंने भी उसके अगले साल बिल्कुल शर्मीला टैगोर वाली शॉल दी थी, दिसंबर में वर्षगांठ होने पर ये गर्म कपड़ों का सिलसिला बहुत साल तक चलता रहा. लेकिन अब तो जाड़ा जैसे पड़ता ही कहां है. लेकिन तभी श्रीमती जी ने आकर गर्म जुराब, मफलर, शॉल और टोपी सब हाथ में थमा दिया और कहने लगीं ये सब पहन लो, जाड़ा आ चला है, ध्यान नहीं रखोगे तो पिछले साल की तरह बीमार पड़ जाओगे, जल्दी-जल्दी करो तब तक मैं तुम्हारे लिए सर्दी से बचने के लिए काढ़ा बनाकर लाती हूं और मैं जैसे मन ही मन अब भी ये कहता रहा कि श्रीमती जी जाड़ा पड़ता ही कहां है.


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